साहब! मेहनत हम बेच रहे हैं, आप बस ‘गुलामी’ खरीद रहे हैं।
राष्ट्र संवाद संवाददाता
मुंबई (इंद्र यादव) आज के दौर में अगर आप किसी दफ्तर, फैक्ट्री या निर्माण स्थल पर जाकर देखें, तो आपको लोग पसीने में तर-बतर जी-तोड़ मेहनत करते दिखेंगे। अक्सर बड़े-बड़े मंचों से भाषण दिया जाता है कि “मेहनत ही सफलता की कुंजी है।” लेकिन हकीकत के धरातल पर खड़े होकर एक कड़वा सवाल पूछना जरूरी हो गया है: क्या वाकई लोगों को उनकी मेहनत के बदले वाजिब हक मिल रहा है!
सवाल यह नहीं है कि लोग आलसी हैं; सवाल यह है कि क्या उनकी रगों से निचोड़े गए खून-पसीने की कीमत चंद सिक्कों में तौलकर उनका अपमान नहीं किया जा रहा!
मेहनत और मुआवजे के बीच बढ़ती खाई
आंकड़े और हकीकत दोनों गवाह हैं कि पिछले कुछ दशकों में ‘उत्पादकता’ तो बढ़ी है, लेकिन ‘वेतन’ वहीं का वहीं खड़ा है। एक कर्मचारी पहले से ज्यादा घंटे काम कर रहा है, तकनीक के कारण उसका आउटपुट दोगुना हो गया है, लेकिन जब महीने के अंत में सैलरी स्लिप हाथ में आती है, तो वह महंगाई के सामने बौनी नजर आती है।
कॉरपोरेट मुनाफा बनाम कर्मचारी की थाली: कंपनियां रिकॉर्ड मुनाफा दर्ज कर रही हैं, लेकिन जब बारी कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाने की आती है, तो ‘मार्केट मंदी’ का बहाना थमा दिया जाता है।
महंगाई का दानव: जिस रफ्तार से दूध, पेट्रोल और मकान का किराया बढ़ा है, क्या उस अनुपात में एक आम मेहनतकश की आय बढ़ी? जवाब हम सबको पता है—बिल्कुल नहीं।
‘कोल्हू का बैल’ बनकर रह गया है इंसान
आज ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ा रहा है। आठ घंटे की शिफ्ट अब कागजों तक सीमित है; हकीकत में 10 से 12 घंटे काम करना एक मजबूरी बन गई है। ऊपर से ‘टारगेट’ का मानसिक दबाव अलग। विडंबना देखिए, जो व्यक्ति आलीशान इमारतें बना रहा है, उसके पास खुद के लिए एक छत नहीं है। जो दिन-रात अनाज ढो रहा है, उसका अपना बच्चा रात को शायद आधा पेट सोता है।
कड़वा सच: मेहनत कोई नहीं चुराता, लेकिन मेहनत का “फल” जरूर चुराया जा रहा है। इसे ‘स्मार्ट वर्क’ या ‘कॉस्ट कटिंग’ जैसे चमकीले शब्दों के पीछे छिपाया नहीं जा सकता।
अब जागने का समय है
सिर्फ जी-तोड़ मेहनत करना गौरव की बात नहीं है, अगर वह मेहनत आपको एक सम्मानजनक जीवन न दे सके। एक समाज के तौर पर हमें यह समझना होगा कि.
न्यूनतम मजदूरी सम्मानजनक होनी चाहिए, न कि सिर्फ जिंदा रहने लायक।
मेहनत का शोषण ‘अनुशासन’ नहीं है।
समान काम के लिए समान वेतन सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि अधिकार होना चाहिए।
परिणाम:अगर किसी देश का मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग अपनी मेहनत के बावजूद कर्ज के दलदल में फंसा है, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था में खोट है। मेहनत की पूजा तब सार्थक होगी, जब मेहनत करने वाले के घर में भी उजाला होगा। यह समय चुपचाप खटने का नहीं, बल्कि अपनी मेहनत का सही मोल मांगने का है।
क्योंकि पसीना बहाना हमारा कर्तव्य है, तो उसका सही दाम पाना हमारा हक!

