बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बीच हिंसा और मर्यादा पर सवाल
देवानंद सिंह
पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणामों के बाद पैदा हुई राजनीतिक परिस्थितियों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या लोकतंत्र केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम बनकर रह गया है, या फिर उसकी मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों का भी कोई महत्व है। एक ओर सत्ता परिवर्तन के बाद हिंसा, हत्या, सड़क जाम और राजनीतिक टकराव की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री पद को लेकर जारी बयानबाजी लोकतांत्रिक परंपराओं पर बहस छेड़ रही है।
भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथ रथ की हत्या ने राजनीतिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है। अस्पताल के बाहर भाजपा कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन, टीएमसी पर लगाए गए आरोप और हावड़ा समेत कई इलाकों में हुए हंगामे ने आम जनता के भीतर भय और असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है। चुनाव के बाद यदि सड़कों पर खून-खराबा और प्रतिशोध की राजनीति दिखाई दे, तो यह लोकतंत्र पर सबसे बड़ा दाग माना जाएगा।

इसी बीच कवि और वक्ता कुमार विश्वास की टिप्पणी ने पूरे घटनाक्रम को वैचारिक आयाम दे दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल हार-जीत का खेल नहीं, बल्कि मर्यादा, परंपरा और संवैधानिक प्रक्रिया का भी नाम है। उनका यह बयान उस समय आया, जब ममता बनर्जी ने चुनावी पराजय के बावजूद मुख्यमंत्री पद छोड़ने से इनकार किया। कुमार विश्वास ने यह भी माना कि ममता बनर्जी ने संघर्ष के बल पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई, लेकिन समय के साथ राजनीति में विचारधारा की जगह सत्ता का गणित हावी होता गया।
बंगाल की जनता ने बदलाव का संकेत दिया है, लेकिन नई सत्ता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह केवल सरकार बदलने तक सीमित न रहे, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में भी बदलाव लाए। यदि अवसरवादी राजनीति और हिंसा का दौर जारी रहता है, तो लोकतंत्र कमजोर होगा और जनता का विश्वास भी टूटेगा।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन हिंसा का नहीं। हार और जीत दोनों को गरिमा के साथ स्वीकार करना ही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है। आज बंगाल को राजनीतिक प्रतिशोध नहीं, बल्कि शांति, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक मर्यादा की आवश्यकता है। क्योंकि अंततः सत्ता बदल सकती है, लेकिन लोकतंत्र की गरिमा बनी रहनी चाहिए।

