शौर्य पर सियासत नहीं, जनभावनाओं को समझने की जरूरत
भारत न भूलता है, न माफ करता है
अमन शांडिल्य
ऑपरेशन सिंदूर की बरसी पर जहां भाजपा और उसके समर्थकों ने सोशल मीडिया के माध्यम से सेना के शौर्य, बलिदान और राष्ट्र गौरव को प्रमुखता से सामने रखा, वहीं विपक्ष की ओर से इस विषय पर लगभग चुप्पी दिखाई दी। कई विपक्षी नेताओं ने इसे केवल “सरकार का ऑपरेशन” कहकर अपनी प्रतिक्रिया सीमित कर दी। यही वह राजनीतिक दूरी है, जो धीरे-धीरे विपक्ष और आम जनभावनाओं के बीच खाई पैदा कर रही है।
देश की सेना किसी दल या सरकार की नहीं होती, वह पूरे राष्ट्र की अस्मिता और सुरक्षा की प्रतीक होती है। किसी सैन्य अभियान की सफलता पर देश का गर्व स्वाभाविक है। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन सेना के साहस और बलिदान के प्रति सम्मान व्यक्त करना राष्ट्रीय संवेदना का हिस्सा है। जब जनता सैनिकों के पराक्रम पर गर्व महसूस कर रही हो, तब विपक्ष की चुप्पी उसे जनता की भावनाओं से कटा हुआ दर्शाती है।
यह सच है कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की आलोचना विपक्ष का अधिकार और दायित्व दोनों है। लेकिन हर राष्ट्रीय मुद्दे को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना भी उचित नहीं माना जा सकता। जनता यह देखती है कि कौन उसके गर्व, उसकी भावनाओं और उसके राष्ट्रबोध के साथ खड़ा है। यही कारण है कि कई बार विपक्ष मुद्दों के बावजूद जनसमर्थन हासिल नहीं कर पाता।
विपक्ष को यह समझना होगा कि राजनीति केवल विरोध का नाम नहीं है। जनता उन दलों से जुड़ती है जो संवेदनाओं को समझते हैं, राष्ट्रीय गौरव के क्षणों में साथ खड़े दिखाई देते हैं और सकारात्मक संदेश देते हैं। यदि विपक्ष हर विषय में केवल राजनीतिक लाभ-हानि का गणित देखेगा, तो उसके लिए जनता का विश्वास जीतना कठिन होता जाएगा।
सत्ता पाने का सपना केवल सरकार की आलोचना से पूरा नहीं होता। इसके लिए जनता के मन, उसकी भावनाओं और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ना पड़ता है। लोकतंत्र में वही दल मजबूत होता है, जो विरोध के साथ-साथ राष्ट्रहित और जनभावनाओं का सम्मान करना भी जानता हो।

