सरायकेला-खरसावां में दर्दनाक हादसा • 2 की मौत, 3 गंभीर,ग्रामीणों का फूटा गुस्सा—“जिम्मेदार कौन?”
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जिले के चांडिल वन क्षेत्र में जंगली हाथियों के उत्पात ने एक बार फिर दो जिंदगियां निगल लीं। ईचागढ़ थाना क्षेत्र के सोड़ो पंचायत स्थित हाड़ात गांव में शुक्रवार देर रात हाथियों के झुंड ने एक कच्चे मकान को तोड़कर अंदर सो रहे परिवार पर हमला कर दिया। इस दर्दनाक घटना में मां-बेटी की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीन अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हैं।
आधी रात टूटा कहर
ग्रामीणों के अनुसार, रात करीब 1 बजे 8-10 हाथियों का झुंड गांव में घुस आया। हाथियों ने महतो परिवार के घर को निशाना बनाते हुए दीवार तोड़ दी। अचानक हुए हमले में परिवार के लोग संभल नहीं पाए और हाथियों की चपेट में आ गए।
मां-बेटी की मौके पर मौत
हमले में चाइना देवी और उनकी बेटी अमिता कुमारी की मौके पर ही मौत हो गई। वहीं कमलचंद महतो, मोहन महतो और सतुला देवी गंभीर रूप से घायल हो गए। शोर सुनकर पहुंचे ग्रामीणों ने मशाल जलाकर किसी तरह हाथियों को खदेड़ा।
घायलों को तुरंत जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां एक की हालत नाजुक बनी हुई है।
6 घंटे बाद पहुंचा वन विभाग
घटना के बाद ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। आरोप है कि सूचना देने के बावजूद वन विभाग की टीम करीब 6 घंटे की देरी से मौके पर पहुंची। इसे लेकर प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।वन विभाग ने मृतकों के परिजनों को तत्काल 25-25 हजार रुपये की सहायता दी है। नियमानुसार 4-4 लाख रुपये मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। घायलों के इलाज का खर्च भी विभाग उठाएगा।
अवैध खनन बना बड़ी वजह?
स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में चल रहे अवैध बालू खनन ने हाथियों के प्राकृतिक रास्ते (कॉरिडोर) को बुरी तरह प्रभावित किया है। सुवर्णरेखा नदी के घाटों पर रातभर जेसीबी, हाइवा और ट्रैक्टरों की आवाजाही से हाथी भटक कर गांवों की ओर आ रहे हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि बालू माफिया, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है, जिसका खामियाजा आम लोग भुगत रहे हैं।
दहशत में गांव,जान माल की क्षति
पिछले एक सप्ताह से हाथियों का झुंड इलाके में घूम रहा है। पहले फसलों को नुकसान पहुंचा रहा था, अब जानलेवा हमले हो रहे हैं। गांव में भय का माहौल है—शाम होते ही लोग घरों में कैद हो जाते हैं।
तिल-तिल मरने से अच्छा
घटना के बाद ग्रामीणों का आक्रोश चरम पर है। उनका कहना है,
“हर रात मौत का डर बना रहता है। अगर यही हाल रहा तो तिल-तिल मरने से अच्छा है सरकार एक बार में ही मार दे।”

