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    Home » हनुमान जयंती 2026: अपने भीतर के हनुमान को जगाने का पर्व
    धर्म मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय संपादकीय

    हनुमान जयंती 2026: अपने भीतर के हनुमान को जगाने का पर्व

    Devanand SinghBy Devanand SinghApril 2, 2026No Comments7 Mins Read
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    पश्चिम बंगाल अराजकता
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    हनुमान जयंती (2 अप्रैल 2026) विशेष अपने भीतर के हनुमान को जगाने का पर्व

    -ललित गर्ग-
    हनुमान जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव जीवन के चरित्र-निर्माण, आत्मबल, संयम, सेवा और समर्पण की प्रेरणा देने वाला महान दिवस है। यह दिन हमें मंदिरों में दीप जलाने से अधिक अपने भीतर के अंधकार को दूर करने का संदेश देता है। हनुमान केवल शक्ति के प्रतीक नहीं हैं, वे शक्ति के सदुपयोग, ज्ञान की विनम्रता, भक्ति की पराकाष्ठा और सेवा की परंपरा के प्रतीक हैं। इसलिए हनुमान जयंती मनाने का वास्तविक अर्थ है-अपने भीतर के हनुमान को जगाना। हनुमान जी को मंगलकर्ता और विघ्नहर्ता कहा गया है। लेकिन वे विघ्न केवल बाहरी नहीं हटाते, वे मनुष्य के भीतर के विघ्न-अहंकार, भय, आलस्य, क्रोध, लोभ, मोह, इन सबका भी नाश करते हैं। आज का मनुष्य बाहरी समस्याओं से कम और आंतरिक कमजोरियों से अधिक परेशान है। इसलिए आज हनुमान की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक है।
    हनुमान शक्ति के प्रतीक हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कभी अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने अपनी शक्ति को सेवा में लगाया। आज का युग शक्ति प्रदर्शन का युग बन गया है-धन का प्रदर्शन, पद का प्रदर्शन, ज्ञान का प्रदर्शन, शक्ति का प्रदर्शन। लेकिन हनुमान हमें सिखाते हैं कि शक्ति और ज्ञान का प्रदर्शन नहीं, उसका संरक्षण और सदुपयोग ही महानता है। सर्वशक्तिमान होकर भी उन्होंने स्वयं को “राम का दास” कहा। इससे बड़ी विनम्रता और क्या हो सकती है? हनुमान हमें यह भी सिखाते हैं कि शक्ति और ज्ञान का अहंकार नहीं होना चाहिए। ज्ञान यदि विनम्रता नहीं देता, तो वह अज्ञान है। शक्ति यदि सेवा में नहीं लगती, तो वह विनाश का कारण बनती है। इसलिए हनुमान शक्ति और ज्ञान के साथ-साथ विनम्रता और सेवा के भी प्रतीक हैं।

    हनुमान जयंती
    हनुमान को ज्ञानियों में अग्रगण्य कहा गया है-“ज्ञानिनामग्रगण्यम”। वे केवल बलवान नहीं थे, वे महान विद्वान, व्याकरणाचार्य, तर्कशास्त्री, संगीतज्ञ और नीतिज्ञ भी थे। लेकिन इतनी विद्या होने पर भी उनमें अहंकार नहीं था। वे सरलता, सादगी और सेवा के प्रतीक बने रहे। आज शिक्षा बढ़ रही है, लेकिन विनम्रता घट रही है। डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन चरित्र घट रहा है। ऐसे समय में हनुमान का चरित्र हमें ज्ञान के साथ विनम्रता का संतुलन सिखाता है। हनुमानजी को हिन्दू देवताआंे में सबसे शक्तिशाली माना गया है, वे रामायण जैसे महाग्रंथ के सह पात्र थे। वे भगवान शिव के ग्यारवंे रूद्र अवतार थे जो श्रीराम की सेवा करने और उनका साथ देने त्रेता युग में अवतरित हुए थे। उनको बजरंग बलि, मारुतिनंदन, पवनपुत्र, केशरीनंदन आदि अनेकों नामों से पुकारा जाता है। उनका एक नाम वायुपुत्र भी है, उन्हें वातात्मज भी कहा गया है अर्थात् वायु से उत्पन्न होने वाला। इन्हें सात चिरंजीवियो में से एक माना जाता है। वे सभी कलाओं में सिद्धहस्त एवं माहिर थे। वीरो में वीर, बुद्धिजीवियांे में सबसे विद्वान। इन्होंने अपने पराक्रम और विद्या से अनेकों कार्य चुटकीभर समय में पूर्ण कर दिए है। वे शौर्य, साहस और नेतृत्व के भी प्रतीक हैं। समर्पण एवं भक्ति उनका सर्वाधिक लोकप्रिय गुण है। रामभक्त हनुमान बल, बुद्धि और विद्या के सागर तो थे ही, अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता और ज्योतिष के भी प्रकांड विद्वान थे।
    हनुमान के जीवन में तीन महान तत्व दिखाई देते हैं-ज्ञान, भक्ति और कर्म। ज्ञान उन्हें दिशा देता है, भक्ति उन्हें प्रेरणा देती है और कर्म उन्हें महान बनाता है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में ज्ञान है पर कर्म नहीं, तो वह अधूरा है। यदि कर्म है पर भक्ति नहीं, तो उसमें संवेदना नहीं होगी। यदि भक्ति है पर ज्ञान नहीं, तो वह अंधविश्वास बन सकती है। इन तीनों का समन्वय यदि किसी चरित्र में दिखाई देता है, तो वह हनुमान का चरित्र है। हनुमान का जीवन संयम का जीवन था। वे बलशाली थे, पर ब्रह्मचारी थे। वे विद्वान थे, पर विनम्र थे। वे वीर थे, पर शांत थे। वे शक्तिशाली थे, पर सेवक थे। यह संतुलन ही उन्हें महान बनाता है। आज मनुष्य के पास साधन हैं, पर संयम नहीं। ज्ञान है, पर दिशा नहीं। शक्ति है, पर सेवा नहीं। इसलिए समाज में अशांति बढ़ रही है। हनुमान का जीवन हमें संयम और संतुलन का संदेश देता है।
    हनुमान के बाल स्वरूप की कथा भी अत्यंत प्रेरणादायक है। बालक हनुमान ने सूर्य को फल समझकर पकड़ने का प्रयास किया। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि एक महान संदेश है। यह बालकों की असीम जिज्ञासा, उत्साह और ऊर्जा का प्रतीक है। यह कथा समाज को संदेश देती है कि बच्चों की जिज्ञासा को दबाया नहीं जाना चाहिए, उसे सही दिशा देनी चाहिए। यदि बालकों को सही मार्गदर्शन मिले, तो उनमें से हर बालक हनुमान बन सकता है-ऊर्जावान, जिज्ञासु, साहसी और रचनात्मक। आज के माता-पिता और समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों में हनुमान जैसे गुण विकसित करें-साहस, जिज्ञासा, अनुशासन, सेवा, विनम्रता और भक्ति। यदि बचपन में ही यह संस्कार मिल जाएं, तो समाज का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। हनुमान भक्ति का वास्तविक अर्थ भी समझना जरूरी है। हनुमान भक्ति केवल चालीसा पढ़ना नहीं है, बल्कि हनुमान के गुणों को जीवन में उतारना है।
    हनुमान भक्ति का अर्थ है- अहंकार छोड़ना, सेवा करना, सत्य का साथ देना, संयम रखना, कर्तव्य निभाना और अपने जीवन को किसी महान उद्देश्य से जोड़ना। जब तक भक्ति केवल मंदिर तक सीमित रहेगी, तब तक भगवान अलग रहेंगे और भक्त अलग रहेगा। जब भक्ति जीवन बन जाती है, तब भगवान और भक्त अलग नहीं रहते। हनुमान की भक्ति प्रदर्शन नहीं, आत्मपरिवर्तन की प्रक्रिया है। यह भक्ति व्यक्ति को भीतर से बदल देती है-अहंकार की जगह विनम्रता, क्रोध की जगह क्षमा, भय की जगह साहस और निराशा की जगह आशा भर देती है। आज समाज में सबसे बड़ी समस्या शक्ति की नहीं, चरित्र की है; ज्ञान की नहीं, दिशा की है; साधनों की नहीं, संयम की है। इसलिए आज समाज को हनुमान की जरूरत है-मंदिरों में नहीं, जीवन में; मूर्तियों में नहीं, व्यक्तित्व में। हर व्यक्ति के भीतर एक हनुमान सोया हुआ है- किसी में साहस का हनुमान, किसी में सेवा का हनुमान, किसी में ज्ञान का हनुमान, किसी में भक्ति का हनुमान। जरूरत केवल उसे जगाने की है।
    अपने भीतर के हनुमान को जगाने का अर्थ है- अपने भीतर के भय को हराना, अपने भीतर के अहंकार को मिटाना, अपने भीतर की शक्ति को सेवा में लगाना, अपने ज्ञान को समाज के काम में लगाना, अपने जीवन को किसी महान उद्देश्य से जोड़ना। यदि हनुमान जयंती पर हम केवल पूजा करें और जीवन न बदलें, तो यह पर्व अधूरा है। यदि हम अपने जीवन में साहस, सेवा, संयम, विनम्रता और भक्ति का एक भी गुण उतार लें, तो हनुमान जयंती सार्थक हो जाएगी। आज आवश्यकता मंदिरों में हनुमान खोजने की नहीं, अपने भीतर हनुमान जगाने की है। जब व्यक्ति के भीतर हनुमान जागेगा, तब उसका भय समाप्त होगा। जब समाज के भीतर हनुमान जागेगा, तब अन्याय समाप्त होगा। जब राष्ट्र के भीतर हनुमान जागेगा, तब कमजोरी समाप्त होगी।
    हनुमान जयंती हमें यही संदेश देती है कि महानता शक्ति में नहीं, शक्ति के सदुपयोग में है; ज्ञान में नहीं, ज्ञान की विनम्रता में है; भक्ति में नहीं, भक्ति के समर्पण में है। इस हनुमान जयंती पर हमें संकल्प लेना चाहिए- हम शक्ति का प्रदर्शन नहीं, संरक्षण करेंगे। हम ज्ञान का अहंकार नहीं, विनम्रता रखेंगे। हम भक्ति का प्रदर्शन नहीं, जीवन में समर्पण लाएंगे। हम अपने भीतर के हनुमान को जगाएंगे। यदि हर व्यक्ति अपने भीतर के हनुमान को जगा ले, तो परिवार सुधर जाएगा, समाज सुधर जाएगा, राष्ट्र सुधर जाएगा और मानवता का भविष्य उज्ज्वल हो जाएगा। यही हनुमान जयंती का वास्तविक संदेश है- अपने भीतर के हनुमान को जगाइए, जीवन को शक्ति, ज्ञान, भक्ति और सेवा का संगम बनाइए।

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