‘पश्चिम एशिया संघर्ष’ पर पीएम मोदी के संसद में दिए गए वक्तव्य, कूटनीति, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय एकजुटता पर देवानंद सिंह का सटीक विश्लेषणात्मक आलेख पढ़ें।
देवानंद सिंह
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसद में दिया गया वक्तव्य केवल एक सरकारी प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके बयान में तीन स्पष्ट आयाम उभरकर सामने आते हैं कूटनीति पर जोर, आंतरिक तैयारियों का भरोसा और राष्ट्रीय एकजुटता का आह्वान।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री ने साफ किया कि इस संकट का समाधान सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि कूटनीति और संवाद से ही संभव है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और व्यावसायिक जहाजों पर हमलों को “अस्वीकार्य” बताते हुए उन्होंने भारत की उस पारंपरिक विदेश नीति को दोहराया, जिसमें शांति, स्थिरता और संतुलन को प्राथमिकता दी जाती है। यह संदेश वैश्विक मंच पर भारत की जिम्मेदार भूमिका को रेखांकित करता है।
दूसरा बड़ा संकेत सरकार की तैयारियों को लेकर है। ऊर्जा सुरक्षा, खाद्यान्न भंडार, वैकल्पिक ईंधन और अक्षय ऊर्जा क्षमता का उल्लेख यह दर्शाता है कि सरकार संभावित दीर्घकालिक संकट को ध्यान में रखकर रणनीति बना रही है। 53 लाख मीट्रिक टन से अधिक कच्चे तेल का भंडार और बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता भारत को इस अस्थिर समय में कुछ हद तक सुरक्षित आधार प्रदान करती है। हालांकि, वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता को देखते हुए चुनौतियां पूरी तरह टल नहीं सकतीं।
तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू है राष्ट्रीय एकजुटता का आह्वान। प्रधानमंत्री ने कोरोना काल का उदाहरण देते हुए यह स्पष्ट किया कि ऐसे संकट केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक धैर्य और अनुशासन से ही झेले जा सकते हैं। साथ ही, कालाबाजारी और जमाखोरी के खिलाफ चेतावनी यह दर्शाती है कि सरकार आंतरिक अव्यवस्था को भी गंभीरता से ले रही है।
प्रधानमंत्री द्वारा पश्चिम एशिया के नेताओं से सीधे संवाद और लाखों भारतीयों की सुरक्षित वापसी का उल्लेख यह बताता है that भारत न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति सजग है, बल्कि वैश्विक स्तर पर सक्रिय कूटनीतिक भूमिका भी निभा रहा है।
हालांकि, इस पूरे परिदृश्य में यह भी जरूरी है कि सरकार केवल आश्वासन तक सीमित न रहे, बल्कि तेल कीमतों, महंगाई और रोजगार पर संभावित प्रभाव को लेकर स्पष्ट रोडमैप भी प्रस्तुत करे। क्योंकि यह संकट केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन से सीधे जुड़ा हुआ है।
प्रधानमंत्री का संदेश एक संतुलित दृष्टिकोण को सामने लाता है जहां कूटनीति के माध्यम से शांति की वकालत है, वहीं देश के भीतर मजबूत तैयारी और सामाजिक एकता पर भी समान जोर है। आने वाले समय में यही संतुलन भारत की सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकता है।

