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    ईरान-इजरायल युद्ध: भारत के लिए शांति क्यों है जरूरी?

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 15, 2026Updated:March 15, 2026No Comments7 Mins Read
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    ईरान-इजरायल युद्ध
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    ईरान-इजरायल युद्ध: भारत के लिए शांति क्यों है जरूरी?

    निशिकांत ठाकुर

    ईरान के सुप्रीम लीडर अली हुसैनी खामेनेई की हत्या के बाद इजरायल ने दावा किया है कि ईरान ने अपना सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई को चुन लिया है। इजरायल के इस दावे पर ईरान की ओर से पुष्टि कर दी गई है । बता दें कि 28 फरवरी, 2026 को अमेरिकी-इजरायल के एक संयुक्त हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की तेहरान में हत्या कर दी गई थी। यह हमला उनके परिसर पर केंद्रित था, जिसमें 30 से अधिक बम का इस्तेमाल किया गया, जिससे उनका निवास स्थान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। यह एक सुनियोजित और तेज हवाई ऑपरेशन था, जो दिन के उजाले में किया गया था। अमेरिका ने इसके लिए स्थान की सटीक जानकारी साझा की थी, जिससे हमलों का समय तय हुआ। उपग्रह चित्रों से पुष्टि हुई कि तेहरान में खामेनेई के कार्यालय ‘लीडरशिप हाउस कंपाउंड’ को गंभीर नुकसान हुआ। इस हमले में खामेनेई के परिवार के कुछ करीबी सदस्य भी मारे गए। ईरानी मीडिया और सरकार ने इस घटना की पुष्टि करते हुए 40 दिनों के राजकीय शोक की घोषणा की है। फॉक्स न्यूज़ के एक कार्यक्रम के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बनाए जाने से ‘खुश नहीं’ हैं कहा । फॉक्स न्यूज़ के एंकर ब्रायन किल्मीड की मानें तो नए सुप्रीम लीडर की घोषणा के बाद उसने राष्ट्रपति ट्रंप से बात की, तो ट्रंप ने कहा, ‘मैं खुश नहीं हूं।’

    ईरान और इजराइल के युद्ध का कारणों में एक कारण यह भी कहा गया है कि इजराइल, ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। इजराइल ने ईरान पर नरसंहार की मंशा रखने का आरोप लगाया है, जबकि ईरान ने इजराइल पर गाजा में नरसंहार करने का आरोप लगाया है। परिणामस्वरूप, इजराइल ने ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए उसके खिलाफ प्रतिबंध और सैन्य कार्रवाई की मांग की। द्विपक्षीय संबंध 1948 में यहूदी मातृभूमि की स्थापना के प्रति सहानुभूति और समर्थन की प्रारंभिक अमेरिकी नीति से विकसित होकर एक ऐसी साझेदारी में तब्दील हो गए है जो संयुक्त राज्य अमेरिका-मध्य पूर्व में प्रतिस्पर्धी हितों को संतुलित करने की कोशिश कर रही एक महाशक्ति को इजराइल से जोड़ती है, जो एक छोटा लेकिन सैन्य रूप से शक्तिशाली राष्ट्र है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस जंग की निंदा करते हुए दोनों पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील भी की है। दोनों पक्ष दावा कर रहे हैं कि वे सही हैं, लेकिन यह तय करने के लिए कि ईरान पर हुए शुरुआती हमले कानूनी थे या नहीं, हमें इसके पीछे झांकना होगा। हमें अंतरराष्ट्रीय कानून के उन मानकों को फिर से देखना होगा, जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध की भयावह घटनाओं के बाद बनाया गया था और जिन पर ज्यादातर देशों ने सहमति जताई थी।

    28 फरवरी को जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर बमबारी शुरू की, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर आरोप लगाया कि वह ऐसे परमाणु हथियार बना रहा है, जो अमेरिकी सहयोगियों के लिए खतरा है और ‘जल्द ही अमेरिका तक पहुंच सकते हैं।’ मार्च 2026 के हालिया संघर्ष के दौरान, ईरान ने अपनी ‘ट्रूथफुल प्रॉमिस 4’  सैन्य कार्रवाई के तहत मुख्य रूप से इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात , कतर, कुवैत, बहरीन, जॉर्डन और सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य ठिकानों व संपत्तियों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान और इराक में भी ईरानी हमले की खबरें सामने आई हैं। ईरान ने इजराइल के खिलाफ बड़े पैमाने पर मिसाइलें दागीं। पाकिस्तान तथा बलूचिस्तान सीमा के पास जैश-उल-अदल समूह के ठिकानों पर हमला किया गया। अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। इन हमलों का मुख्य उद्देश्य अमेरिका और इजराइल द्वारा किए जा रहे जवाबी सैन्य अभियानों का विरोध करना था। ईरान ने मध्य-पूर्व के मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डों को निशाना बनाया। ईरान का पड़ोसी इस्‍लामी देशों पर हमले करने का क्या मकसद हो सकता है, इसे समझना आसान नहीं है? लेकिन, मिसाइल हमलों ने दुबई की सुरक्षित पनाहगाह वाली छवि को भी चकनाचूर कर दिया।

    मिडिल ईस्ट में मौजूदा संघर्ष के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेषकर तेल आपूर्ति और व्यापार पर भारी असर पड़ रहा है। ईरान को अरबों डॉलर का नुकसान और इजरायल को भी बड़ी आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ रहा है, जबकि अमेरिका पर सैन्य भंडार घटने और आर्थिक संकट का दबाव है। भारत को अपने नागरिकों की सुरक्षा और ऊर्जा (तेल) आपूर्ति में नुकसान हो सकता है। इस महायुद्ध में देशों को होने वाला संभावित नुकसान विभिन्न देशों में इस प्रकार होने का अनुमान है। ईरान के रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान को 24 से 35 अरब डॉलर (लगभग 2-3 लाख करोड़ रुपये) का भारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नुकसान हो सकता है। तेल डिपो पर हमले और बुनियादी ढांचे को क्षति पहुंच रही है। ईरान के साथ सीधे संघर्ष में इजरायल को भी बड़ी आर्थिक क्षति (अनुमानित 11.5 अरब डॉलर से 17.8 अरब डॉलर तक) का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही, नागरिकों के हताहत होने की भी रिपोर्ट है। वहीं, पेंटागन का रक्षा भंडार (जैसे पैट्रियट मिसाइलें) तेजी से घट रहा है, प्रत्येक इंटरसेप्टर की कीमत 40 लाख डॉलर से अधिक है। युद्ध लंबा खिंचने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा बोझ पड़ने का खतरा है। अमेरिका की ओर से मिडिल ईस्ट और वेनेजुएला में कार्रवाइयों के बाद चीन को रणनीतिक और आर्थिक नुकसान हो सकता है, जिससे उसे भारत और रूस के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। भारत सीधे तौर पर युद्ध में नहीं है, लेकिन उसे कई तरह से नुकसान हो रहा है। खाड़ी देशों में काम कर रहे करीब 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा खतरे में है। ऊर्जा की जरूरतें प्रभावित हो सकती हैं और वहां से आने वाला ‘रेमिटेंस’ (धन) भी खतरे में पड़ सकता है। यदि यह युद्ध लंबा चला, तो सबसे बड़ा नुकसान उनकी अर्थव्यवस्था को ही होगा, क्योंकि वे तेल निर्यातक हैं।

    ईरान-इजरायल या मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष (महायुद्ध) का भारत पर गंभीर आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। इससे कच्चे तेल के दाम बढ़ने से पेट्रोल-डीजल और महंगाई में उछाल, रेमिटेंस (विदेशी कमाई) में कमी, और आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने से आयात-निर्यात पर नकारात्मक असर पड़ने का खतरा है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से परिवहन, खाना पकाने वाली गैस के साथ दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती है। रेटिंग एजेंसी मूडीज के अनुसार, युद्ध लंबा चलने पर भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और रुपया कमजोर हो सकता है। मध्य-पूर्व के साथ व्यापार बाधित होने का जोखिम है, जिससे भारत का 56% से अधिक वस्तु निर्यात प्रभावित हो सकता है। खाड़ी देशों में कार्यरत लगभग एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा चिंता का विषय है और वहां संघर्ष से 51 बिलियन अमेरिकी डॉलर की रेमिटेंस (भेजी जाने वाली आय) प्रभावित हो सकती है। भारत के लिए एक संतुलित रुख अपनाना चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि दोनों देश (ईरान और इजरायल) भारत के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। संक्षेप में, यह युद्ध भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका साबित हो सकता है जो महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित करेगा। इस तरह विश्व में कोई देश जंग लड़े यह किसी भी समस्या का समाधान नहीं करता । जहां तक भारत की बात है  वह किसी भी युद्ध को प्रश्रय नहीं दे सकता ; क्योंकि भारत अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी का देश है।लेकिन, इससे इतर यदि भारत युद्ध में कूदता है तो फिर क्या होगा इसे बताने की आवश्यकता नहीं है।

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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