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    28 साल से पुनर्वास की राह ताकता चाटीकोचा, रेडिएशन के साये में जीने को मजबूर ग्रामीण

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarFebruary 20, 2026No Comments3 Mins Read
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    28 साल से पुनर्वास की राह ताकता चाटीकोचा, रेडिएशन के साये में जीने को मजबूर ग्रामीण

    राष्ट्र संवाद संवाददाता

    जादूगोड़ा: जादूगोड़ा प्रखंड का चाटीकोचा गांव पिछले 28 वर्षों से पुनर्वास के वादों के सहारे जी रहा है। विस्थापन की पीड़ा झेल रहे ग्रामीणों के लिए हर नया प्रशासनिक दौरा उम्मीद जगाता है, लेकिन अब तक समाधान शून्य ही रहा है।

    पिछले 10 वर्षों में तीन अलग-अलग उपायुक्त गांव का दौरा कर चुके हैं। वर्तमान उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी ने भी चाटीकोचा पहुंचकर हालात का जायजा लिया था। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इस बार ठोस पहल होगी, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।

    तीन जगह जमीन चिन्हित, फिर भी नहीं बसा गांव

    चाटीकोचा के पुनर्वास के लिए घोबानी, माटिन और बेनाशोल में जमीन चिन्हित की गई, लेकिन स्थानीय विरोध और कागजी प्रक्रियाओं के कारण मामला अटक गया। नतीजतन, ग्रामीण आज भी उसी स्थान पर रहने को मजबूर हैं, जहां टेलिंग पॉन्ड से उड़ने वाली रेडियोधर्मी धूल उनके जीवन पर कहर बरपा रही है।

    ग्राम प्रधान मेघराव सोरेन के अनुसार, यूसिल प्रबंधन द्वारा अब तक 700 से अधिक बैठकें की जा चुकी हैं, लेकिन किसी भी बैठक में ठोस निर्णय नहीं लिया गया। वरिष्ठ ग्रामीण कुंवर मांझरी कहते हैं, “1997 से हमें सिर्फ आश्वासन मिल रहा है। मेरा परिवार आज भी विस्थापित हालात में जी रहा है।”

    हवा के साथ घरों में घुसता जहर

    गर्मी के मौसम में जब पश्चिमी हवा चलती है, तो टेलिंग पॉन्ड से उठने वाली रेडियोधर्मी अयस्क की धूल गांव तक पहुंच जाती है। एक महिला मजदूर ने बताया, “कई बार बना हुआ खाना फेंकना पड़ता है, क्योंकि उसमें धूल गिर जाती है। लेकिन हम खुलकर विरोध भी नहीं कर सकते, क्योंकि हम यूसिल में ही काम करते हैं।”

    ग्रामीणों का कहना है कि आसपास के नदी-नाले भी पूरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं, जिससे जल संकट और स्वास्थ्य खतरे और बढ़ गए हैं।

    स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव

    पाम प्रधान सलूका हेम्ब्रम का कहना है कि चाटीकोचा पूरी तरह रेडिएशन की चपेट में है। गांव में न स्वास्थ्य केंद्र है, न स्कूल और न ही स्वच्छ पेयजल की सुविधा। बच्चों की पढ़ाई बाधित हो चुकी है और युवाओं के सामने रोजगार का संकट है।

    विस्थापित परिवारों के सलाहकार पिथौ मांझी ने चेतावनी दी कि टेलिंग पॉन्ड का बांध वर्ष 1978 में टूट चुका है। यदि दोबारा ऐसी घटना हुई तो पांच किलोमीटर क्षेत्र में भारी तबाही हो सकती है।

    डूब गया पारंपरिक पूजा स्थल

    टेलिंग पॉन्ड के निर्माण के कारण गांव का पारंपरिक आदिवासी पूजा स्थल भी डूब चुका है। इससे ग्रामीणों की धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था को गहरी ठेस पहुंची है।

    चाटीकोचा विस्थापित समिति के सचिव भीमचंद्र हांसदा न्याय की आस में ही इस दुनिया से विदा हो गए। विधानसभा की ध्यान आकर्षण समिति ने भी गांव का दौरा किया था, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।

    आंदोलन की चेतावनी

    रविवार को ग्रामीणों ने बैठक कर आंदोलन की रणनीति बनाई। उनका कहना है कि यदि इस बार पुनर्वास की ठोस पहल नहीं हुई, तो वे टेलिंग पॉन्ड का काम बंद कराने को बाध्य होंगे।

    पोटका विधायक संजीव सरदार ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए उपायुक्त को शीघ्र पुनर्वास सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।

    लगातार आश्वासनों और बैठकों के बावजूद चाटीकोचा के ग्रामीण आज भी सुरक्षित पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक यह गांव रेडिएशन के साये में जीने को मजबूर रहेगा?

    28 साल से पुनर्वास की राह ताकता चाटीकोचा रेडिएशन के साये में जीने को मजबूर ग्रामीण
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