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    नये साल में अर्जुन मुंडा की वापसी: क्या झारखंड भाजपा में बदल रहा है राजनीतिक संतुलन?

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarJanuary 7, 2026No Comments6 Mins Read
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    नये साल में अर्जुन मुंडा की वापसी: क्या झारखंड भाजपा में बदल रहा है राजनीतिक संतुलन?

    आनंद कुमार

    पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा इन दिनों काफी एक्टिव दिख रहे हैं। तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा लोकसभा चुनाव हार के बाद से चर्चा और विवादों से दूर चल रहे थे। उनकी पत्नी मीरा मुंडा को भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में पोटका से प्रत्याशी बनाया था, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिल सकी। उसके बाद से अर्जुन मुंडा थोड़े किनारे-किनारे चल रहे थे। वैसे भी मुंडा उन नेताओं में नहीं है, जो बिना सोचे-समझे कहीं भी कुछ बोल देते हैं। बहुत सधे अंदाज में बोलते हैं। जहां जरूरी होता है, वहीं बोलते हैं। विवादों में नहीं रहते। काफी समय से मुंडा चुप थे। हालांकि राज्य भर में घूमते रहे। लोगों से मिलते-जुलते रहे। लेकिन पार्टी और संगठन में ज्यादा सक्रिय नहीं दिख रहे थे। एक तरफ जहां चंपाई सोरेन और रघुवर दास सरीखे नेता लगातार हेमंत सोरेन सरकार पर किसी न किसी मुद्दे को लेकर लगातार हमलावर बने रहे, मुंडा ऐसा कुछ करते नहीं दिखे। पार्टी ने भी उन्हें एक तरह उपेक्षित ही रखा है। लेकिन हाल के दिनों में मुंडा मुखर हुए हैं। पेसा नियमावली को लेकर उन्होंने हेमंत सरकार को घेरा। प्रदेश कार्यालय में प्रेस कांफ्रेंस की और कहा कि वर्तमान राज्य सरकार का रवैया जनजातियों और आदिवासियों के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील है। संविधान, पांचवीं अनुसूची और पेसा एक्ट 1996 की भावना को नज़रअंदाज़ कर सरकार ऐसे निर्णय ले रही है, जो आदिवासी समाज के अधिकार, स्वशासन और सम्मान पर सीधा प्रहार हैं। मुंडा ने सीधे-सीधे आरोप लगाया कि सरकार ने पेसा एक्ट का ‘कोल्ड ब्लडेड मर्डर’ कर दिया है। इसके अलावा जमशेदपुर में हिरासत में लिए गये एक युवक की मौत पर भी मुंडा ने कहा कि बीमार रहते हुए भी उसे एक मोबाइल चोर द्वारा दिये बयान के आधार पर पुलिस पकड़कर ले गई और टॉर्चर किया. उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस ने अजित महतो की पिटाई की, जिससे उसकी मौत हो गई। उन्होंने मांग की कि केंद्रीय एजेंसी को मामले की जांच का जिम्मा दिया जाना चाहिए। अगर लोगों को न्याय नहीं मिलेगा तो झारखंड को राज्य बनाने का कोई औचित्य नहीं है।

    इसके बाद अर्जुन मुंडा ने पूंजी निवेश को लेकर सीएम के प्रस्तावित दावोस और लंदन दौरे को लेकर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि अगर सरकार निवेश के लिए कहीं जा रही है तो जनता को बताना उनकी जिम्मेदारी होनी चाहिए. मुंडा ने कहा कि अगर पूंजी निवेश के लिए राज्य के मुख्यमंत्री विदेश दौरे पर जा रहे हैं, तो इसका लाभ राज्य की जनता को मिलना चाहिए. उन्होंने कहा कि ऐसा न हो कि राज्य के कोष से मुख्यमंत्री सिर्फ विदेश दौरा कर खाली हाथ वापस लौट आएं। उन्होंने कहा कि राज्य में पुराने और बंद पड़े उद्योग धंधों को भी पुनर्जीवित करने पर सरकार को सकारात्मक रूप से विचार करना चाहिए।

    लेकिन नये साल में अर्जुन मुंडा जिस तरह मुखर हुए हैं, उससे कई संकेत जा रहे हैं। क्या उन्हें पार्टी कोई भूमिका मिलने जा रही है। या मुंडा ने अपनी राजनीति का तरीका बदला है।

    झारखंड की राजनीति में अर्जुन मुंडा ऐसे नेता माने जाते रहे हैं जिनके शुभचिंतक सभी दलों में हैं। गठबंधन सरकार चलाने और विपरीत ध्रुवों को साधने में उन्हें महारत हासिल है।

    2003 से 2014 तक झारखंड भाजपा में अर्जुन मुंडा ही सबसे ताकतवर नेता हुआ करते थे। इस दौरान वे तीन सरकारों के मुखिया भी रहे। लेकिन 2014 में वे विधानसभा का चुनाव हार गये और रघुवर दास मुख्यमंत्री बन गये, उसके बाद मुंडा को पांच साल तक हाशिये पर रहना पड़ा और झारखंड भाजपा में उनकी ताकत कमजोर होती चली गयी। सरकार के साथ-साथ पार्टी में भी रघुवर दास का दबदबा कायम हो गया। तब कहा गया कि अटल-आडवाणी, राजनाथ सिंह से करीबी का मुकसान उन्हें उठाना पड़ा है। मुख्यमंत्री पद पर रहते केस मुकदमों में फंसे भाजपा के एक नेता जो बाद में पार्टी के कर्णधारों में शामिल हुए, उनको नाराज करने का खामियाजा उन्हें उठाना पड़ा, ऐसी भी चर्चाएं चलीं।

    फिर 2019 का लोकसभा चुनाव आया। अर्जुन मुंडा बहुत कम अंतर से ही सही चुनाव जीते और मोदी 2.0 सरकार में उन्हें जनजातीय मामलों का कैबिनेट मंत्री बनाया गया और कार्यकाल के आखिरी कुछ महीनों में वे केंद्रीय कृषि मंत्री के प्रभार में भी रहे, लेकिन केंद्र में मंत्री बनने के वावजूद मुंडा ने झारखंड की राजनीति से दूरी बनाये रखी। उनकी ज्यादातर सक्रियता उनके लोसकभा क्षेत्र खूंटी और जमशेदपुर तक ही रही।

    लेकिन 2024 का चुनाव हारने और फिर पत्नी की विधानसभा चुनाव में हार के बाद उनकी चुप्पी को देखते हुए कई बार सवाल भी उठते थे कि क्या अर्जुन मुंडा की राजनीति में रुचि कम हो गयी है। बाबूलाल मरांडी के पास प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष की दोहरी जिम्मेदारी है। चंपाई सोरेन अपने स्तर से काफी मुखर हैं। रघुवर दास भी मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद राज्यपाल बनाये गये। ये बात अलग है कि उन्होंने 14 महीने बाद ही इस्तीफा दे दिया और सक्रिय राजनीति में हाथ आजमाने की कोशिश में लग गये। राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक के उमीदवारों में उनकी चर्चा होती रहती है। लेकिन अर्जुन मुंडा को न तो संगठन में कोई दायित्व दिया गया और न झारखंड की राजनीति में उनकी कोई भूमिका तय की गयी।

    लेकिन अर्जुन मुंडा के पास असीम धैर्य है। उन्होंने न कभी बागी तेवर दिखाये और न ऐसा कुछ किया जिससे लगे कि उन्हें किसी पद की लालसा है। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। उनके खाते में कई उपलब्धियां भी दर्ज हैं। साल 2000 में झारखंड बनने से लेकर 2019 तक झारखंड में विधानसभा का पांच कार्यकाल रहा और चार चुनाव हुए। इन सभी कार्यकाल में भाजपा ने सरकार बनायी। पांच बार भाजपा का मुख्यमंत्री रहा और एक बार शिबू सोरेन की सरकार में वह सहयोगी की भूमिका में रही।

    लेकिन पिछले दो चुनावों से झारखंड में विधानसभा चुनावों में भाजपा न सिर्फ सत्ता से बाहर है बल्कि लगातार उसका ग्राफ गिर रहा है। फिलहाल 81 सदस्यों वाली झारखंड विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 21 विधायक हैं। आदिवासियों के लिए आरक्षित 28 सीटों में उसके पास सिर्फ एक सीट है और वह भी चंपाई सोरेन के भाजपा में आने के कारण मिली है।

    फिलहाल झारखंड में भाजपा के संगठन और नेतृत्व को लेकर काफी बातें हो रही हैं। पेसा नियमावली ने भाजपा को आदिवासियों के बीच जाने और उनकी सहानुभूति वापस हासिल करने का एक मौका दिया है। नगर निकायों के चुनाव भी सिर पर हैं।

    ऐसे में अर्जुन मुंडा की सक्रियता और मुखरता कई संकेत दे रही है। भाजपा के पास पांच पूर्व मुख्यमंत्री हैं। इनमें मधु कोड़ा फिलहाल कानूनी पचड़ों के कारण चुनावी राजनीति से दूर हैं। बाकी चार पूर्व सीएम में अर्जुन मुंडा ही सबसे कम उम्र के हैं। तीन बार सीएम और एक बार कैबिनेट मंत्री रहे अर्जुन मुंडा के पास अनुभव अथाह है और वे अभी महज 57-58 साल के हैं। ऐसे में उनके पास समय भी है और सब्र भी। नये साल में उनको सक्रिय देखना सुखद है, भाजपा के लिए भी और झारखंड के लिए भी।

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