भाजपा से सवाल करने लगा मीडिया, क्या यह बदलाव है या सत्ता की नई रणनीति?
देवानंद सिंह
भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को सदैव सत्ता का प्रतिपक्ष माना गया है। वह सत्ता जो निर्वाचित होती है, और वह मीडिया जो निर्वाचित नहीं होता, परंतु जनता की ओर से सवाल पूछने का नैतिक अधिकार रखता है। यही कारण है कि जब मीडिया सत्ता से सवाल करता है, तो लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन जब मीडिया सत्ता का विस्तार बन जाए, तो लोकतंत्र खोखला होने लगता है। पिछले एक दशक में भारत में यही दृश्य अधिक मुखर होकर सामने आया, जहां मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार का आलोचक नहीं, उसका प्रवक्ता दिखाई देने लगा। ऐसे में, जब अचानक वही मीडिया या उसका एक वर्ग भारतीय जनता पार्टी और सरकार से सवाल पूछता दिखाई देता है, तो यह घटना नहीं, बल्कि एक प्रश्न बन जाती है। सवाल यह नहीं कि मीडिया सवाल क्यों कर रहा है, बल्कि यह कि अब क्यों कर रहा है, किस सीमा तक कर रहा है, और किस उद्देश्य से कर रहा है।
हाल के महीनों में दर्शकों और पाठकों ने महसूस किया कि कुछ टेलीविज़न चैनलों, अख़बारों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर सरकार से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षाकृत तीखे स्वर उभरने लगे हैं। महंगाई, बेरोज़गारी, प्रशासनिक विफलताएं, बुनियादी ढांचे की दुर्घटनाएं, आंतरिक सुरक्षा, सीमा विवाद, चुनावी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता, ऐसे विषय जिन पर पहले या तो चुप्पी रहती थी या उन्हें विपक्षी साज़िश बताकर खारिज कर दिया जाता था, अब उन्हीं पर प्रश्न पूछे जा रहे हैं। पहली नज़र में यह दृश्य आश्वस्त करता है। ऐसा लगता है कि मानो मीडिया ने अपनी आत्मा वापस पा ली हो, लेकिन लोकतंत्र में सबसे ख़तरनाक भ्रम वही होता है जो उम्मीद के रूप में सामने आता है। दरअसल, यह समझना आवश्यक है कि मीडिया का सवाल पूछना और मीडिया का स्वतंत्र होना, ये दोनों एक जैसे नहीं हैं। सवाल पूछना स्वतंत्रता का लक्षण हो सकता है, परंतु हमेशा नहीं। कई बार सवाल सत्ता की अनुमति से पूछे जाते हैं, तय सीमा में पूछे जाते हैं और तय दिशा में मोड़े जाते हैं। यही कारण है कि आज का सवालिया मीडिया देखने में भले बदला हुआ लगे, लेकिन उसके भीतर की संरचना, स्वामित्व, निर्भरता और भय, सब पहले जैसे ही बने हुए हैं।
बीते दस वर्षों में मीडिया और सत्ता के रिश्ते में एक मौलिक परिवर्तन आया है। पहले सरकारें मीडिया से संवाद करती थीं, आलोचना सहती थीं और कभी-कभी दबाव भी बनाती थीं, लेकिन अब स्थिति यह है कि संवाद का स्थान निर्देश ने ले लिया है। संपादकीय स्वतंत्रता धीरे-धीरे प्रबंधन के हाथों में चली गई, और प्रबंधन सीधे सत्ता के साथ खड़ा हो गया। परिणाम यह हुआ कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के नैरेटिव को ही राष्ट्रहित, आलोचना को राष्ट्रविरोध और सवाल को षड्यंत्र बताने लगा। ऐसे माहौल में, अगर आज वही मीडिया सवाल पूछता दिखे, तो स्वाभाविक है कि संदेह पैदा हो। क्या यह आत्ममंथन का परिणाम है? क्या पत्रकारों में अचानक नैतिक साहस लौट आया है? या फिर यह सत्ता की बदली हुई ज़रूरतों का प्रतिबिंब है? आज की राजनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है। वह छवि प्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और संस्थागत वैधता से भी जुड़ी है। भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, लेकिन जब वैश्विक मंचों पर मीडिया स्वतंत्रता, संस्थाओं की स्वायत्तता और असहमति के दमन को लेकर सवाल उठते हैं, तो सत्ता के लिए यह असुविधाजनक स्थिति बन जाती है। ऐसे में, एक पूरी तरह आज्ञाकारी मीडिया सरकार के लिए सहायक नहीं, बल्कि बाधक बन सकता है। लोकतंत्र का दावा तभी विश्वसनीय लगता है जब उसमें असहमति दिखाई दे।
यहीं से ‘सवालिया मीडिया’ की भूमिका समझ में आती है। सत्ता को अब ऐसे मीडिया की आवश्यकता है, जो यह प्रदर्शित कर सके कि लोकतंत्र जीवित है, सवाल पूछे जा रहे हैं, बहस हो रही है, लेकिन यह प्रदर्शन वास्तविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अलग होता है। इसमें सवाल पूछे जाते हैं, पर जवाबदेही तय नहीं होती। मुद्दे उठते हैं, पर जड़ों तक नहीं जाते। बहस होती है, पर निष्कर्ष सत्ता के पक्ष में ही निकलता है। आज यदि रेल दुर्घटनाओं पर बहस हो रही है, तो तकनीकी खामियों की बात होगी, लेकिन नीति-निर्माण की ज़िम्मेदारी तय नहीं होगी। यदि, बेरोज़गारी पर चर्चा है, तो आंकड़ों की बाज़ीगरी होगी, पर आर्थिक मॉडल पर गंभीर सवाल नहीं होंगे। यदि, चुनावी प्रक्रिया पर बहस है, तो आरोप-प्रत्यारोप होंगे, लेकिन संस्थागत सुधार की मांग नहीं उठेगी। यह सवाल पूछने का सुरक्षित संस्करण है, जिससे सत्ता की बुनियाद नहीं हिलती।
यह भी गौर करने योग्य है कि आज का मीडिया किन विषयों पर अब भी चुप है। कॉरपोरेट और सत्ता के रिश्ते, मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण, सरकारी विज्ञापन का दबाव, जांच एजेंसियों का राजनीतिक उपयोग, असहमति को अपराध में बदलने की प्रवृत्ति, ये वे विषय हैं जिन पर अब भी व्यापक चुप्पी है। अगर, मीडिया सचमुच स्वतंत्र होता, तो सबसे पहले इन्हीं मुद्दों पर हमला होता।
वास्तव में आज का मीडिया एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ उसे जनता की विश्वसनीयता भी चाहिए और सत्ता की कृपा भी। लंबे समय तक सत्ता के साथ खड़े रहने के कारण मीडिया ने जनता का भरोसा खोया है। टीआरपी और सर्कुलेशन गिर रहे हैं, सोशल मीडिया ने विकल्प खड़े कर दिए हैं, और दर्शक अब हर बात को बिना सवाल स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में, मीडिया के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह खुद को फिर से प्रासंगिक साबित करे। सवाल पूछना इसी रणनीति का हिस्सा है।
लेकिन यह रणनीति तभी सफल होती है जब दर्शक सतही संतोष में उलझ जाए। यदि दर्शक सिर्फ़ इतना देखकर खुश हो जाए कि “आज तो चैनल ने सरकार को घेरा”, तो खेल पूरा हो जाता है। लेकिन यदि दर्शक यह पूछने लगे कि उस घेरने का परिणाम क्या निकला, कौन ज़िम्मेदार ठहरा, क्या बदला, तो यह नियंत्रित असहमति असफल हो जाएगी। लोकतंत्र में असली परीक्षा सवाल पूछने की नहीं, बल्कि सत्ता को जवाब देने के लिए मजबूर करने की होती है। जब तक सवाल सत्ता के लिए केवल एक टीवी बहस या अख़बार की सुर्ख़ी बने रहेंगे, और नीति में कोई बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक उन्हें लोकतांत्रिक विजय नहीं कहा जा सकता।
इतिहास बताता है कि सत्ता जब भी दबाव में आती है, वह असहमति को सीमित जगह देती है। यह भाप निकालने की प्रक्रिया होती है, जिससे व्यवस्था सुरक्षित रहती है। यह नया नहीं है। नया सिर्फ़ माध्यम है, मंच है और प्रस्तुति है। आज की असहमति ज़्यादा आकर्षक, ज़्यादा नाटकीय और ज़्यादा नियंत्रित है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका नागरिक की है। मीडिया को देखकर निष्कर्ष निकालने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि कौन-सा सवाल पूछा जा रहा है और कौन-सा नहीं। किस बिंदु पर बहस रोक दी जाती है। कौन-से चेहरे बार-बार बुलाए जाते हैं और कौन-से कभी नहीं। लोकतंत्र सिर्फ़ मीडिया की स्वतंत्रता से नहीं, नागरिक की सजगता से चलता है।
अंततः यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि मीडिया बदल रहा है। बेहतर यह होगा कि कहा जाए—मीडिया को बदला हुआ दिखाया जा रहा है। यह बदलाव वास्तविक भी हो सकता है, लेकिन उसकी परीक्षा समय करेगा। यदि यह सवाल सत्ता की जड़ों तक पहुंचते हैं, तो इसे बदलाव कहा जाएगा। और यदि ये सवाल केवल छवि प्रबंधन का हिस्सा बने रहते हैं, तो यह भी उसी लंबे खेल का हिस्सा होगा, जिसमें लोकतंत्र दिखाई तो देता है, लेकिन चलता नहीं।
लोकतंत्र में सवाल पूछना शुरुआत है। सवालों से डर पैदा होना असली संकेत है, और जवाबदेही तय होना, वही बदलाव की पहचान। जब तक यह अंतिम चरण नहीं आता, तब तक सवाल करता मीडिया भी सवालों के घेरे में ही रहेगा।

