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    Home » भारत की पारंपरिक चिकित्सा की रोशनी में विश्व-स्वास्थ्य
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    भारत की पारंपरिक चिकित्सा की रोशनी में विश्व-स्वास्थ्य

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीDecember 24, 2025No Comments7 Mins Read
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    ललित गर्ग

    आज की दुनिया गहन और बहुआयामी स्वास्थ्य संकटों से गुजर रही है। एक ओर जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ, मानसिक तनाव, अवसाद, चिंता और असंतुलन तेजी से बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर संक्रामक रोग, महामारी और पर्यावरणीय विषमताएँ मानव जीवन को निरंतर चुनौती दे रही हैं। इन परिस्थितियों के बीच यह स्पष्ट होता जा रहा है कि केवल आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा के सहारे वैश्विक स्वास्थ्य समस्याओं का संपूर्ण समाधान संभव नहीं है। यही कारण है कि विश्व समुदाय का ध्यान पुनः भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की ओर आकर्षित हो रहा है, जिनमें आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी और प्राकृतिक चिकित्सा जैसी पद्धतियाँ शामिल हैं। जिन्हें ‘आयुष’ के नाम से जाना जाता है; ये प्रणालियाँ समग्र स्वास्थ्य, प्राकृतिक उपचार और शरीर-मन संतुलन पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जिनमें आयुर्वेद सबसे प्राचीन और सुव्यवस्थित प्रणालियों में से एक है, जो अपने दार्शनिक आधार और विविध उपचार विधियों के लिए प्रसिद्ध है। इन चिकित्सा प्रणालियों का आधार केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के समन्वय के माध्यम से संपूर्ण स्वास्थ्य की अवधारणा है।

     

    आयुर्वेद शरीर के तीन दोषों (वात, पित्त, कफ) के संतुलन पर केंद्रित; आहार, जीवनशैली, जड़ी-बूटी और पंचकर्म (शुद्धिकरण) जैसी तकनीकों का उपयोग करती है। अष्टांग आयुर्वेद अर्थात कायचिकित्सा (आंतरिक चिकित्सा), शल्य (सर्जरी), कौमारभृत्य (बाल चिकित्सा), भूतविद्या (मनोविज्ञान), अगद तंत्र (विष विज्ञान), रसायन (जराचिकित्सा), वाजीकरण (प्रजनन) और शालक्य (नेत्र/कान/नाक) में विभाजित है। आयुर्वेद की ही भांति योग भी एक पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली है जो शारीरिक आसन (आसन), प्राणायाम (सांस लेने के व्यायाम), ध्यान (मेडिटेशन) और नैतिक सिद्धांतों के माध्यम से मन-शरीर के समन्वय पर केंद्रित है। इसी तरह प्राकृतिक चिकित्सा में मिट्टी, पानी, धूप और आहार जैसी प्राकृतिक तरीकों से शरीर की स्व-उपचार क्षमता को बढ़ावा देती है। यूनानी चिकित्सा प्रणाली भी भारत में प्रचलित है, यूनान से आई यह प्रणाली शरीर के चार हमर (रक्त, बलगम, पीला पित्त, काला पित्त) के संतुलन पर जोर देती है और पर्यावरण के प्रभाव को मानती है। सिद्ध चिकित्सा प्रणाली मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है, जिसमें जड़ी-बूटियों और धातुओं से बनी दवाओं का उपयोग और योग व ध्यान पर जोर दिया जाता है। सोवा-रिग्पा पहाड़ों की चिकित्सा प्रणाली है, हिमालयी क्षेत्रों (जैसे लद्दाख, सिक्किम) में प्रचलित है, जिसे ‘तिब्बती चिकित्सा’ के रूप में भी जाना जाता है। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय राष्ट्रीय आयुष मिशन के माध्यम से इन प्रणालियों के विकास, अनुसंधान और मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवा में एकीकरण को बढ़ावा देता है। ये प्रणालियाँ प्राचीन भारतीय ज्ञान पर आधारित हैं और अब वैश्विक स्वास्थ्य मंच पर भी अपनी पहचान बना रही हैं।

     

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की इन पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई है। उन्होंने इसे केवल सांस्कृतिक धरोहर के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की एक प्रभावी, सुलभ और टिकाऊ स्वास्थ्य व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके नेतृत्व में आयुष मंत्रालय की स्थापना, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत, विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ पारंपरिक चिकित्सा को लेकर साझेदारी और वैश्विक सम्मेलनों का आयोजन इस दिशा में ठोस कदम हैं। हाल ही में नई दिल्ली में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि भारत अब इस क्षेत्र में केवल सहभागी नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री की ओमान यात्रा के दौरान आयुष और हर्बल उत्पादों के निर्यात में हुई वृद्धि इस परिवर्तनशील परिदृश्य को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। 61.1 मिलियन डॉलर से बढ़कर 65.1 मिलियन डॉलर तक पहुँचना केवल आर्थिक आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक विश्वास का संकेत है। दुनिया के अनेक देश यह समझने लगे हैं कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियाँ न केवल सस्ती और सुलभ हैं, बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करती हैं। यह तथ्य और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब विश्व की लगभग एक चौथाई आबादी आर्थिक कारणों से बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। ऐसे में पारंपरिक चिकित्सा एक व्यवहारिक विकल्प के रूप में उभरती है।

     

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज भी दुनिया के लगभग 170 देशों में 40 से 90 प्रतिशत आबादी किसी-न-किसी रूप में पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग करती है। यह आँकड़ा इस धारणा को तोड़ता है कि पारंपरिक चिकित्सा केवल विकासशील देशों तक सीमित है। वास्तव में विकसित देशों में भी योग, आयुर्वेदिक उपचार, हर्बल औषधियाँ और प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है। इसका एक बड़ा कारण आधुनिक चिकित्सा से जुड़े दुष्प्रभाव, अत्यधिक दवाओं पर निर्भरता और महँगी उपचार प्रक्रियाएँ हैं। एलोपैथिक चिकित्सा ने जहाँ त्वरित राहत और शल्य चिकित्सा में अद्भुत प्रगति की है, वहीं इसके साथ दवाओं के साइड इफेक्ट, एंटीबायोटिक प्रतिरोध और दीर्घकालिक जटिलताएँ भी जुड़ी हैं। इसके विपरीत भारतीय पारंपरिक चिकित्सा रोग की जड़ तक पहुँचने का प्रयास करती है। आयुर्वेद शरीर की प्रकृति, दोषों के संतुलन और जीवनशैली के सुधार पर बल देता है। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक शांति, एकाग्रता और आत्मिक संतुलन का मार्ग है। इन पद्धतियों का उद्देश्य रोग को दबाना नहीं, बल्कि शरीर की स्वाभाविक उपचार क्षमता को जाग्रत करना है। यही कारण है कि इन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित, कम दुष्प्रभाव वाली और दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना जाता है।

     

    पारंपरिक चिकित्सा के दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन में भारत ने इस दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से दुनिया के सामने रखा। ब्राज़ील, संयुक्त अरब अमीरात, मलेशिया, मेक्सिको, नेपाल, श्रीलंका सहित 16 देशों के साथ द्विपक्षीय बैठकों ने यह स्पष्ट कर दिया कि पारंपरिक चिकित्सा अब कूटनीति और वैश्विक सहयोग का भी एक सशक्त माध्यम बन चुकी है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जारी किया गया ‘आयुष मार्क’ एक ऐतिहासिक पहल है, जो आयुष उत्पादों और सेवाओं के लिए गुणवत्ता का वैश्विक मानक स्थापित करेगा। इससे न केवल उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ेगा, बल्कि भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी मजबूत होगी। हालाँकि यह भी सत्य है कि पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ चुनौतियाँ मौजूद हैं। गुणवत्ता नियंत्रण, मानकीकरण, वैज्ञानिक शोध और प्रमाणिकता के प्रश्न लंबे समय से उठते रहे हैं। कई बार अप्रमाणित दावे और मिलावटी उत्पाद इस पूरी प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। किंतु ‘आयुष मार्क’ जैसी पहलों और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देकर इन चुनौतियों से निपटा जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु बनाया जाए, ताकि दोनों की श्रेष्ठताओं का समन्वय हो सके।
    आज जब वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा, लगभग 4.6 अरब लोग, पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं, तब भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियाँ आशा की किरण बन सकती हैं। ये प्रणालियाँ न केवल रोगों के उपचार में सहायक हैं, बल्कि रोकथाम और स्वास्थ्य संवर्धन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संतुलित आहार, नियमित योगाभ्यास, प्राकृतिक औषधियों और मानसिक अनुशासन के माध्यम से अनेक बीमारियों को प्रारंभिक स्तर पर ही नियंत्रित किया जा सकता है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण दूरदर्शी कहा जा सकता है। उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा को अतीत की विरासत के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता के रूप में देखा है। वैश्विक मंचों पर भारत की इस चिकित्सा परंपरा को स्थापित करने के उनके प्रयास यह संकेत देते हैं कि आने वाले वर्षों में विश्व स्वास्थ्य व्यवस्था में भारत की भूमिका और भी सशक्त होगी। जब आधुनिक चिकित्सा की सीमाएँ स्पष्ट हो रही हैं और विश्व एक समग्र, सुलभ और मानवीय स्वास्थ्य मॉडल की तलाश में है, तब भारतीय पारंपरिक चिकित्सा न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभर रही है। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि और भविष्य की सबसे बड़ी संभावना है।

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