उस घर में रहती है वो
अकेले, गुमसुम, स्मृतियों के सहारे
जो था कभी गुलजार
बच्चों की किलकारियों से
पति से इकरार
इनकार के बीच
पगती थी जहां मोहब्बत
अब वो है
और हैं उसकी यादें
जब वह बन गई थी किसी की बहू
किसी की भाभी
किसी की चाची
और किसी अपने की बड़ी बहन
और बेस्ट फ्रेंड
बच्चे आते हैं
पति आता है
नीड़ में फिर मच जाता है कलरव
चंद दिनों का यह कलरव
तब बियाबान शांति में हो जाता है तब्दील
जब बच्चे निकल जाते हैं
जब पति चला जाता है
दिवाली, होली, दशहरे में
गुलज़ार रहता है उसका नीड़
फिर उसकी कंदरा में
गूंजती है उसकी ही आवाज
कभी ॐ नमः शिवाय
कभी जय बजरंग बली
पति नौकरी करे:निर्विघ्न
बच्चे पढ़ें:बेहिचक
इसके लिए वह करती है त्याग!
वह वेदनाओं को पी जाती है
खुशियों का गला घोंट देती है
संवेदनाओं को रोक लेती है
भावनाओं को आंसुओं में बहा देती है
वह मांस के लोथड़े से
खुद को बदल देती पाषाण में
वह शांत है
वह तपस्विनी है
वह कभी पार्वती-सी है
जो महादेव के तप को
तोड़ती नहीं
वह इंतजार करती है
वह इंतजार कर रही है
हां, वह इंतजार कर रही है
अपने पति का
अपने बच्चों का
यह इंतजार ही उसका जीवन है!!
आनंद सिंह

