आरएलएम में फूटा असंतोष बिहार की राजनीति में एक नए दौर का संकेत
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति हमेशा से नेतृत्व की अस्पष्टता, गठबंधन राजनीति के उतार-चढ़ाव और जातीय आधार की जटिल संरचना के लिए जानी जाती रही है, लेकिन इस बार उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) में फूटा असंतोष केवल एक छोटे संगठन की आंतरिक खलबली नहीं है, बल्कि उस व्यापक समस्या का प्रतीक है, जिससे भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा लगातार जूझता रहा है, यानी वंशवाद, नेतृत्व का अविश्वास और राजनीतिक अवसरवाद का चक्र। आरएलएम के सात नेताओं का एक साथ इस्तीफ़ा देना, जिसमें पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर महासचिव और जिलाध्यक्ष तक शामिल हैं, एक ऐसे असंतोष की परिणति है जो वर्षों से बढ़ रहा था, लेकिन जिसे दबाकर आगे बढ़ने का प्रयास किया जा रहा था। जैसे ही, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नई कैबिनेट में उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को पंचायती राज मंत्री के तौर पर शपथ दिलाई गई, असंतोष की चिंगारी लपटों में बदल गई।
यह निर्णय कई कारणों से विवाद का केंद्र बना। पहला तो यह कि दीपक प्रकाश न तो विधायक थे और न ही विधान परिषद के सदस्य, जबकि आरएलएम के चार विधायक हाल ही में चुनाव जीतकर सदन में पहुंचे थे, और स्वाभाविक रूप से मंत्री पद के दावेदार माने जा रहे थे। दूसरा यह कि पार्टी का ढांचा उस समय तक पहले ही कमज़ोर था, जिसमें अनुभवी नेताओं के भरोसे और मेहनत पर पार्टी खड़ी थी। तीसरा यह कि कुशवाहा पिछले कई वर्षों से खुद को समाजवादी मूल्यों और नैतिक राजनीति का प्रवक्ता बताते रहे हैं। ऐसे में, अपने बेटे को मंत्री बनवाना उन मूल्यों के विपरीत माना गया, जिन्हें वे सार्वजनिक मंचों पर बार-बार उद्धृत करते रहे हैं। जब पार्टी अध्यक्ष महेंद्र कुशवाहा और उपाध्यक्ष जितेंद्र नाथ जैसे नेता खुले तौर पर यह कहने लगें कि उपेंद्र कुशवाहा ने वंशवाद को बढ़ावा दिया है, और परिवार को संगठन से ऊपर रखा है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी के भीतर गहरा अविश्वास बन चुका है।
कुशवाहा ने अपने फैसले का बचाव किया और कहा कि उनका बेटा योग्य इंजीनियर है, उसने कड़ी मेहनत की है और उसे खुद को साबित करने का मौका देना चाहिए, पर राजनीति में योग्यता की परिभाषा किसी डिग्री या पेशे से नहीं तय होती, वह तय होती है जमीन पर काम करने की क्षमता से, जनाधार से, संघर्ष करने की तैयारी और संगठन के साथ बने रहने की निष्ठा से। यही वह बिंदु है, जहां पार्टी के नेता और कार्यकर्ता अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उम्र, अनुभव और राजनीतिक लड़ाई के बजाय परिवारिक संबंधों का तराजू भारी पड़ गया, यही असंतोष का मूल है।
एक दिलचस्प, लेकिन कड़वी टिप्पणी एक करीबी सहयोगी ने की कि उपेंद्र जी को अपने परिवार के सिवा किसी पर भरोसा नहीं है, बल्कि कई बार खुद पर भी नहीं। उनके फैसले अक्सर बदल जाते हैं। यह टिप्पणी केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सजीव राजनीतिक अवलोकन है। पिछले 15 वर्षों में उपेंद्र कुशवाहा ने जितनी बार राजनीतिक घर बदले हैं, शायद ही बिहार में किसी और क्षेत्रीय नेता ने किए हों। 2009 में जेडीयू छोड़ना, फिर एनसीपी में जाना, फिर अलग पार्टी बनाना, 2014 में बीजेपी के साथ जाना, मंत्री बनना, 2018 में फिर एनडीए छोड़ना, 2021 में अपनी पार्टी को जेडीयू में विलय कर देना, 2023 में जेडीयू से दोबारा अलग हो जाना, यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें स्थिरता का कोई ठिकाना नहीं दिखता। यह अस्थिरता उनके व्यक्तिगत राजनीतिक जोखिमों का हिस्सा हो सकती है, लेकिन इससे संगठन का ढांचा बार-बार टूटता रहा है, और नेताओं का भरोसा क्षीण होता गया है।
राजनीतिक विश्लेषक लगातार कहते आए हैं कि कुशवाहा की दिक्कतें विचारधारा से ज्यादा पोज़िशनिंग की राजनीति में उलझी रहती हैं। अवसर देखना और गठबंधन बदलना उनकी शैली का हिस्सा बन चुका है, पर यह शैली तभी तक कारगर रहती है, जब तक नेता की विश्वसनीयता अक्षुण्ण रहे। जैसे ही विश्वसनीयता का संकट गहराता है, अवसरवाद बोझ बन जाता है। आरएलएम के नेताओं का इस्तीफा इसी बोझ की परिणति है।
यह विवाद बिहार की उस राजनीतिक धरातल से भी जुड़ा है, जिसे लव-कुश समीकरण कहा जाता है। कुर्मी और कोइरी समुदायों का मिलाजुला आधार दशकों से बिहार की राजनीति में निर्णायक रहा है। नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा इसी सामाजिक संरचना के प्रमुख राजनीतिक चेहरे रहे हैं। यही कारण है कि चाहे राजनीतिक मतभेद कितने भी बढ़ जाएँ, नीतीश कुमार बार-बार कुशवाहा को अपने खेमे में वापस लाने की कोशिश करते रहे, क्योंकि यह गठजोड़ उनकी सत्ता की रीढ़ माना जाता है। 2020 के चुनाव में जब जेडीयू 71 से 43 सीटों पर सिमट गई, तो इसका एक बड़ा कारण यही था कि कुशवाहा की पार्टी ने 30 सीटों पर 5,000 से 39,000 तक वोट काटे, जिससे जेडीयू को एक दर्जन सीटों का सीधा नुकसान हुआ। यह तथ्य बताता है कि भले ही कुशवाहा की पार्टी कितनी ही छोटी क्यों न हो, उसका वोट बैंक सीमांत पर निर्णायक भूमिका निभाता है। इसी वजह से जेडीयू ने उन्हें लगातार महत्व दिया, और उन्हीं कारणों से बीजेपी भी उन्हें गठबंधन का उपयोगी हिस्सा मानती रही है।
लेकिन अब जैसा कि आरएलएम में उठे असंतोष से स्पष्ट होता है, कुशवाहा का व्यक्तिगत प्रभाव तो बना हुआ है पर संगठनात्मक प्रभाव बेहद कमजोर पड़ चुका है। पार्टी का ढांचा लगभग परिवार केंद्रित बन चुका है और इसके खिलाफ आवाज उठाने वाले नेता अब बाहर जा चुके हैं। यह सवाल केवल एक छोटे दल के भविष्य का नहीं है बल्कि यह भी है कि क्या बिहार की राजनीति में वह सामाजिक आधार, जिसे लव-कुश कहा जाता है, अब भी उतना सुदृढ़ है या उसमें नई दरारें उभर रही हैं।
उपेंद्र कुशवाहा ने एक्स पर नीतीश कुमार की वह पुरानी सलाह उद्धृत की—खाना खाते वक्त मक्खियां भिनभिनाएंगी, बाएं हाथ से भगाते रहिए, दाएं हाथ से खाते रहिए, और संकेत दिया कि आलोचना से उन्हें फर्क नहीं पड़ता, लेकिन राजनीति में आलोचना को केवल मक्खी समझना अक्सर नेतृत्व को वास्तविकता से दूर ले जाता है। जो आवाजें आज बाहर निकल रही हैं, वे सिर्फ शोर नहीं बल्कि पार्टी के लिए चेतावनी थीं, जिन्हें अनसुना कर दिया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे विवाद का राजनीतिक असर क्या होगा। पहली संभावना यह है कि आरएलएम लगभग खाली हो चुकी है और बिना किसी मजबूत नेतृत्व ढांचे के आगे शायद ही कोई स्वतंत्र भूमिका निभा पाएगी। इस स्थिति से जेडीयू को लाभ मिल सकता है यदि असंतुष्ट नेता सीधे या परोक्ष रूप से नीतीश कुमार के खेमे में शरण लें। दूसरी संभावना यह है कि यह विवाद एनडीए के अंदर भी हलचल पैदा करे क्योंकि गठबंधन में छोटे दलों की भूमिका केवल सजावट की नहीं होती, बल्कि चुनाव के समय वे महत्त्वपूर्ण सामाजिक संकेत देते हैं। यदि, आरएलएम कमजोर हो जाती है, तो आज नहीं तो कल बीजेपी और जेडीयू दोनों को इस समीकरण की भरपाई किसी और तरीके से करनी पड़ेगी। तीसरी संभावना, जो राजनीतिक रूप से अभी कमजोर दिखती है पर असंभव नहीं, यह है कि उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश करें, लेकिन इसके लिए केवल परिवार पर निर्भर रहने की रणनीति नहीं चलने वाली। उन्हें जमीन पर उतरकर फिर से संगठन का ढांचा खड़ा करना होगा।
दीपक प्रकाश की मंत्री के रूप में ताजपोशी का भविष्य क्या होगा, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। राजनीति में यह तथ्य सर्वविदित है कि मंत्री पद किसी व्यक्ति की चमक बढ़ा जरूर देता है, लेकिन जमीन पर पकड़ और संगठन में स्वीकार्यता ही असली राजनीतिक पूंजी होती है। यदि, दीपक प्रकाश उस कसौटी पर खरे उतरते हैं, तो उपेंद्र कुशवाहा का यह विवादित दांव आगे चलकर सफल भी हो सकता है, लेकिन यदि वे केवल परिवारिक विशेषाधिकार की छवि से बाहर नहीं निकल पाते, तो यह कुशवाहा की राजनीतिक यात्रा में एक निर्णायक गिरावट भी बन सकता है।
सच तो यह है कि अभी जो परिस्थिति बनी है, वह केवल वंशवाद की बहस तक सीमित नहीं है। यह नेतृत्व की विश्वसनीयता, राजनीतिक स्थिरता, संगठनात्मक ताकत और सामाजिक आधार की परतों से जुड़ा एक बहुआयामी प्रश्न है। बिहार की राजनीति हमेशा से जटिल रही है, लेकिन इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वहाँ अब छोटे दलों के भीतर भी नेतृत्व की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
उपेंद्र कुशवाहा के लिए यह समय आत्ममंथन का है। यदि वे इसे केवल एक ‘मक्खी’ मानकर उड़ाते रहे, तो शायद आने वाले वर्षों में वे केवल बिहार की राजनीति के फुटनोट के रूप में ही बचे रह जाएं, लेकिन यदि वे इसे संकेत मानकर अपने संगठन, कार्यकर्ताओं और नेतृत्व शैली को नए सिरे से गढ़ने की दिशा में कदम उठाते हैं, तो वे अब भी वह भूमिका निभा सकते हैं, जिसकी क्षमता उनके भीतर है और जिसका सामाजिक आधार आज भी बिहार के कई क्षेत्रों में मौजूद है।
राजनीति में फैसलों का मूल्य केवल आज से नहीं, आने वाले समय से तय होता है। दीपक प्रकाश की ताजपोशी यदि पार्टी को कमजोर करती है, तो यह निर्णय विष साबित होगा जैसा कि स्वयं कुशवाहा ने समुद्र मंथन का उदाहरण देते हुए कहा, लेकिन यदि यह कोई नई दिशा खोलता है, तो यही निर्णय आने वाले वर्षों में अमृत भी बन सकता है। अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि किसका पलड़ा भारी होगा, असंतोष का या नई शुरुआत का, लेकिन इतना तय है कि यह प्रकरण बिहार की राजनीति में एक नए दौर के संकेत के रूप में दर्ज हो चुका है।

