बिखरती राजनीति का परिणाम रहा महागठबंधन की हार का कारण
देवानंद सिंह
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 भारतीय चुनावी इतिहास की उन दुर्लभ घटनाओं में शामिल हो गया है, जिसे केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक गहन सामाजिक-राजनीतिक प्रयोग के रूप में भी देखा जा सकता है। यह ऐसा चुनाव था जिसमें न कोई एक विचारधारा निर्णायक रूप से जीती और न कोई एक चेहरा। असल जीत उस जटिल चुनावी गणित की हुई जिसने बिहार की राजनीति की बुनियादी संरचना को नए सिरे से परिभाषित किया। चुनाव परिणाम जिस अनुपात में सामने आए, उन्होंने न केवल विपक्ष को चौंकाया, बल्कि स्वयं एनडीए खेमे में भी आश्चर्य और अविश्वास का माहौल पैदा कर दिया।
एनडीए को 243 में से 202 सीटों की अभूतपूर्व जीत मिली, जबकि महागठबंधन 35 सीटों तक सिमट गया। दिलचस्प बात यह है कि वोट शेयर में दोनों खेमों के बीच अंतर उतना गहरा नहीं था जितना सीटों में दिखा, लेकिन यही तो भारतीय चुनावी राजनीति की रहस्यमयता है, जब बहुमत केवल वोट प्रतिशत से नहीं, बल्कि उस वोट के वितरण और उसके भूगोल से तय होता है।
कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल का यह बयान कि किसी भी पार्टी का 90% स्ट्राइक रेट होना अविश्वसनीय है, इस चुनाव के चौंकाने वाले चरित्र को सही शब्दों में अभिव्यक्त करता है, लेकिन इस असंतुलित दिखाई देने वाले चुनावी परिणाम के पीछे एक लंबी राजनीतिक कहानी छुपी है। एक कहानी तीसरे और चौथे मोर्चों के उभार की, वोटों के सूक्ष्म बिखराव की, और संगठित बनाम बिखरे वोटों की।
बिहार का यह चुनाव दो गठबंधनों की पारंपरिक लड़ाई नहीं था। यह चुनाव तीन, चार और पांच कोणों की लड़ाई का था, जहां हर तीसरा खिलाड़ी सत्ता के खेल में अप्रत्यक्ष रूप से निर्णायक साबित हुआ। महागठबंधन का संयुक्त वोट भले ही 23–24% के आसपास रहा, लेकिन सीटों में उसकी कोई छाप नहीं दिखी। इसके विपरीत, बीजेपी और जेडीयू का लगभग 20–20% वोट शेयर मिलकर तीन गुना से अधिक सीटें ले आया, यह विरोधाभास ही इस चुनाव का मूल संदेश है। यह असमानता केवल वोट प्रतिशत का मामला नहीं था, यह उन वोटों के फैलाव का, बूथ दर बूथ उनकी एकाग्रता का, और हर सीट पर विपक्षी वोटों के बंटने का था।
एनडीए का वोट एकजुट था, लेकिन महागठबंधन का बिखरा हुआ, और राजनीति में बिखराव हमेशा हार की शुरुआत बनता है।
सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की रही, वह था प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी जन सुराज पार्टी। पहली बार चुनाव लड़ने आई इस पार्टी ने सीटें भले न जीतीं, लेकिन चुनावी समीकरणों को हिलाकर रख दिया। 3.4% वोट शेयर और 238 सीटों पर मौजूदगी ने जन सुराज को एक वोट असरकारक शक्ति बना दिया। आंकड़े बताते हैं कि जन सुराज का प्रभाव महज़ सांकेतिक नहीं था, बल्कि निर्णायक था। 1 सीट पर यह पार्टी दूसरे स्थान पर रही,
129 सीटों पर तीसरे और 73 सीटों पर चौथे और दर्जनों सीटों पर इसका वोट शेयर इतने ज्यादा रहा कि उसने पूरा गणित बदल दिया। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि 33 सीटों पर जन सुराज के वोट जीत के अंतर से अधिक थे। इनमें से 18 सीटें एनडीए ने जीतीं और 13 महागठबंधन ने। इसका स्पष्ट अर्थ है कि जन सुराज ने वोट कटाव दोनों तरफ किया, परंतु अंतिम लाभ एनडीए को कहीं अधिक मिला। प्रशांत किशोर का युवा-उन्मुख, अभियान आधारित मॉडल एक नए राजनीतिक वर्ग को आकर्षित कर रहा था, ऐसे युवा जिन्हें न नीतीश की राजनीति आकर्षित करती थी, न तेजस्वी की, लेकिन यह नया वर्ग एकजुट नहीं था, वह विकल्प की तलाश में था, और यह बिखराव विपक्ष के लिए घातक साबित हुआ।
वहीं, बीएसपी अक्सर बिहार में परफॉर्म नहीं करती, लेकिन असर जरूर डालती है। इस बार भी मायावती की पार्टी ने 181 सीटों पर कैंडिडेट उतारे। एक सीट जीतना उसकी व्यापकता को नहीं दिखाता, लेकिन उसके वोट का असर चुनावी हार-जीत पर गहरा था। आंकड़े कहते हैं कि 20 सीटों पर बीएसपी का वोट जीत के अंतर से अधिक था, इनमें से 18 सीटें एनडीए के खाते में गईं, सिर्फ 2 महागठबंधन को मिलीं। यही वजह है कि विपक्ष बीएसपी को बी-टीम कहकर निशाना बनाता रहा, हालांकि यह राजनीति का बयान है, पर इस चुनाव में आकंड़ों ने इसे आंशिक रूप से सही साबित किया।
बीएसपी का वोट आधार दलित-बहुजन समाज के उन हिस्सों में है, जो महागठबंधन के संभावित वोटर माने जाते थे। लेकिन जब ये वोट अलग हो गए, विपक्ष की कोर इंटीग्रिटी टूट गई, और एनडीए ने इसका लाभ उठाया।
असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने सीमांचल में फिर से अपनी पकड़ साबित की। पांच सीटें जीतकर उसने 2020 की सफलता को लगभग दोहराया। एक सीट पर एआईएमआईएम दूसरे स्थान पर रही, 9 सीटों पर उसके वोट जीत के अंतर से अधिक थे, इन 9 सीटों में 67% एनडीए ने जीतीं, 33% महागठबंधन ने जीतीं। इसका मतलब स्पष्ट है कि एआईएमआईएम की उपस्थिति विपक्ष के वोट ट्रांसफर को अवरुद्ध करती है और मुस्लिम-यादव समीकरण को कमजोर करती है।
महागठबंधन की सबसे बड़ी ताकत एम-वाई समाज का टूटना महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया।
बिहार चुनाव 2025 की सबसे बड़ी सीख यह है कि यह चुनाव विचारधारा का नहीं, बल्कि निर्मम वोट गणित का चुनाव था। महागठबंधन की रणनीति विचारों पर टिकी थी, और एनडीए की रणनीति समीकरणों पर।
विपक्ष तीन ओर से चोट खाता रहा। पहला, जन सुराज जैसे नवोदित विकल्पों से, दूसरा बीएसपी जैसी निर्णायक उपस्थिति से, तीसरा, एआईएमआईएम की क्षेत्रीय मजबूती से। उधर, एनडीए ने सफलता पाई संगठित वोट ट्रांसफर की कला में। यही वह कला है, जो भारतीय राजनीति में किसी भी गठबंधन को सीट के रूप में अधिक ताकत देती है, भले वोट प्रतिशत कम हों।
एनडीए ने एक बार फिर लालू यादव के पुराने शासनकाल को मुद्दा बनाकर युवा मतदाताओं में भय और संशय का माहौल बनाया। तेजस्वी यादव इसका प्रभावी जवाब नहीं दे पाए। तेजस्वी लोकप्रिय हैं, लेकिन पूरे गठबंधन को एकजुट करने वाला, स्पष्ट रोडमैप पेश करने वाला नेतृत्व महागठबंधन के पास नहीं दिखा। कांग्रेस और वाम दल मैदान में सुस्त दिखे। कई सीटों पर टिकट वितरण में असंतोष फैला। असंतुष्ट नेताओं ने भीतरघात किया या निर्दलीय उतरकर पूरा समीकरण बिगाड़ दिया।
बीएसपी, जन सुराज और बीजेपी—तीनों ने अलग-अलग क्षेत्रों में दलित-बहुजन मतदाताओं में सेंध लगाई।
सबसे निर्णायक कारक यही रहा कि महागठबंधन का वोट विभिन्न दिशाओं में बिखर गया, जबकि एनडीए का वोट एक टुकड़े में सिमटा रहा।
एनडीए की जीत के पीछे केवल विरोधियों की विफलता नहीं थी, यह सुव्यवस्थित संगठन और रणनीति का परिणाम भी था। पीसी स्तर से लेकर बूथ स्तर तक भाजपा की मशीनरी सक्रिय रही। माइक्रो-मैनेजमेंट और कैडर शक्ति ने सीटों को सुरक्षित किया। नीतीश कुमार के महिला वोट बैंक, अति पिछड़ा वर्ग, और ग्रामीण भरोसा इस चुनाव में निर्णायक रहा। एलजेपी और आरएलएसपी जैसे घटकों ने एनडीए के सामाजिक गठजोड़ को व्यापक बनाया। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता ग्रामीण क्षेत्रों में भी पूरी तरह प्रभावी रही। केंद्र–राज्य की संयुक्त योजनाओं का असर वोटिंग पैटर्न में दिखा। इस चुनाव की एक और महत्वपूर्ण सीख यह रही कि राजनीतिक शक्ति केवल सीट जीतने से नहीं आती, कई बार सीटें न जीतकर भी एक पार्टी पूरे समीकरण को प्रभावित कर सकती है। जन सुराज ने ‘विकल्प की तलाश’ को राजनीतिक रूप दिया,
बीएसपी ने विपक्ष की हार को गहरा किया और एआईएमआईएम ने सीमांचल को त्रिकोणीय संघर्ष का मैदान बनाया। यह तीनों मिलकर उन 40–45 सीटों में निर्णायक साबित हुए, जहां छोटी सी स्विंग भी परिणाम बदल सकती थी।
17-11-2025-Page 1-Rashtrasamvad https://epaper.rashtrasamvad.com/publication/daily/17-11-2025?page=1
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव अब केवल बड़े दलों के सामर्थ्य से नहीं जीते जाते, बल्कि वोटों के सूक्ष्म वितरण, रणनीतिक तालमेल और सामाजिक-राजनीतिक रुझानों की सही समझ से जीते जाते हैं। एनडीए की जीत जहां अनुशासित संगठन और सटीक रणनीति की कहानी है, वहीं महागठबंधन की हार एक बिखरती विपक्षी राजनीति का परिणाम। बिहार की राजनीति अब स्थिर नहीं रहेगी, यह छोटे दलों की निर्णायक भूमिकाओं और त्रिकोणीय मुकाबलों के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, और इस नए दौर में इतिहास लिखने की शक्ति केवल बड़े दलों के पास नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे वोटों के पास भी है, जो किसी भी चुनावी गणित को रातोंरात बदल सकते हैं।

