घाटशिला उपचुनाव: अस्मिता, गठबंधन और “घर का दर्द” के बीच सियासी जंग अंतिम दौर में
महागठबंधन में कांग्रेस की नाराजगी, प्रदीप बलमुचु की अलग राह और झामुमो की बी-टीम की गुप्त सक्रियता यह सब भाजपा और खासकर चंपई सोरेन के लिए संजीवनी बूटी साबित हो रही है
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर/घाटशिलाः घाटशिला विधानसभा उपचुनाव अब राजनीतिक दलों के लिए अस्मिता की लड़ाई बन चुका है। चुनाव प्रचार अपने अंतिम दौर में है और मुकाबला न केवल सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है, बल्कि दोनों दलों को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए आंतरिक विद्रोह और गठबंधन की बेचैनी जैसे “घर के दर्द” से भी जूझना पड़ रहा है।
झामुमो और इंडिया गठबंधन की स्थिति

झामुमो ने इस उपचुनाव में दिवंगत मंत्री रामदास सोरेन के पुत्र सोमेश चंद्र सोरेन पर दांव लगाया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन की सभाएँ “अबुआ सरकार” की उपलब्धियों और भावनात्मक अपील पर केंद्रित हैं। वहीं, भाजपा ने भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य व्यवस्था की नाकामी, चाईबासा एचआईवी संक्रमित रक्त कांड और ठगुवा सरकार जैसे तीखे आरोपों के माध्यम से सत्ता विरोधी लहर पैदा करने की कोशिश की है।
गठबंधन की बेचैनी भी कम नहीं है। कांग्रेस नेताओं की बयानबाजी ने सहयोगी दलों के बीच समन्वय की कमी उजागर कर दी है। स्थिति कुछ ऐसी बन गई है मानो “दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गया हो”, जिससे भाजपा को हमलावर होने का मौका मिल गया है।
भाजपा और एनडीए की रणनीति
भाजपा ने इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के पुत्र बाबूलाल सोरेन को फिर से मैदान में उतारा है। प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी के आक्रामक प्रचार और “घुसपैठ” व “डेमोग्राफी बदलने की साजिश” जैसे आरोपों ने ध्रुवीकरण और अस्मिता के मुद्दों को हवा दी है।
दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने झामुमो में अपने पुराने साथियों और स्थानीय नेटवर्क की मदद से एक समानांतर मॉनिटरिंग सेल तैयार की है, जो उनकी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुकी है। चुनावी दौरे को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मैदान में बाबूलाल नहीं, बल्कि खुद चंपई सोरेन ही चुनाव लड़ रहे हैं।
*भीतरी विद्रोह बनी सबसे बड़ी चुनौती*
इस उपचुनाव में दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भीतरी विद्रोह है।
भाजपा में विरोधियों से अधिक दर्द अपने ही नेताओं से मिल रहा है। कई जिलाध्यक्षों और मंडल अध्यक्षों को निष्कासित भी किया गया है।
वहीं, झामुमो के अंदर भी नाराजगी कम नहीं है — कहीं मंच पर न बुलाए जाने का गम है, तो कहीं प्रचारकों की सूची से नाम हटाने का रोष।
अंतिम समीकरण: जादूगर बनाम बाज़ीगर
कुल मिलाकर घाटशिला का यह उपचुनाव गठबंधन की ताकत (झामुमो) बनाम व्यक्तिगत करिश्मे (चंपई सोरेन) की लड़ाई बन चुका है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह मुकाबला “जादूगर और बाज़ीगर” के बीच का संघर्ष है, जहाँ जीत उस पक्ष की होगी जो अपने घर के दर्द को कम कर सके और अंतिम क्षणों में मतदाताओं को भावनात्मक रूप से अपने पक्ष में लामबंद कर पाए।
11नवंबर को होने वाला मतदान यह तय करेगा कि घाटशिला की जनता “अबुआ सरकार” की नीतियों पर मुहर लगाएगी या फिर “ठगुवा सरकार” के आरोपों के बीच चंपई सोरेन का करिश्मा रंग लाएगा।
हालाँकि संकेत यही हैं कि इस बार भीतरघात और असंतोष दोनों दलों के लिए बराबर की चुनौती बन चुके हैं।
महागठबंधन में कांग्रेस की नाराजगी, प्रदीप बलमुचु की अलग राह और झामुमो की बी-टीम की गुप्त सक्रियता यह सब भाजपा और खासकर चंपई सोरेन के लिए संजीवनी बूटी साबित हो रही है।

