देवानंद सिंह
बिहार की राजधानी पटना से लगभग सौ किलोमीटर दूर स्थित मोकामा का टाल क्षेत्र एक बार फिर खूनी रंजिश का गवाह बना है। चुनावी मौसम में जब हर गली-मोहल्ला राजनीतिक नारों से गूंज रहा था, उसी दौरान इस इलाके से ऐसी वारदात सामने आई जिसने पूरे बिहार की राजनीति को झकझोर कर रख दिया। घोसवारी थाने के तारतर गांव में दुलारचंद यादव की निर्मम हत्या ने न केवल मोकामा के राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है, बल्कि इसने एक बार फिर यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या बिहार की राजनीति वास्तव में बाहुबल और बदले की छाया से कभी मुक्त हो पाएगी?
दुलारचंद यादव का नाम मोकामा की लोकल राजनीति में दशकों से गूंजता रहा है। 80 और 90 के दशक में उनकी गिनती इलाके के दबंग और प्रभावशाली चेहरों में होती थी। वे सिर्फ पहलवानी के लिए ही नहीं, बल्कि अपने लोकल गायन शौक और देसी अंदाज़ के लिए भी जाने जाते थे। यह वही दौर था जब बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का सितारा बुलंदियों पर था। दुलारचंद उस समय लालू यादव के नज़दीकियों में गिने जाते थे और उन्होंने मोकामा से चुनाव भी लड़ा, हालांकि जीत नहीं सके।
चुनाव हारने के बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक दिशा कई बार बदली, कभी राजद के साथ, कभी निर्दलीय नेताओं के साथ, तो कभी स्वतंत्र राजनीतिक धारा में सक्रिय रहे, लेकिन उनका असली प्रभाव उस टाल बेल्ट में था, जो बाढ़ और घोसवारी के बीच फैला हुआ है, जहां राजनीति, अपराध और जातीय समीकरण एक-दूसरे में गहराई से उलझे हुए हैं। दुलारचंद यादव की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि वे कभी मोकामा के बाहुबली और पूर्व विधायक अनंत सिंह के बेहद करीबी माने जाते थे। मोकामा की राजनीति में अनंत सिंह एक ऐसा नाम है जिसने डर, करिश्मा और सत्ता तीनों को समान रूप से साधा, लेकिन वक्त के साथ यह समीकरण बदल गया।
हाल के वर्षों में दुलारचंद यादव ने अनंत सिंह के खिलाफ खुलेआम बयान देने शुरू कर दिए थे। सोशल मीडिया पर वे लगातार अनंत सिंह पर निशाना साध रहे थे, उन्हें लोकल तानाशाह कहकर संबोधित करते थे और मोकामा की राजनीति में नए विकल्प की बात करते थे। 2025 के विधानसभा चुनाव में जब प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ पार्टी ने मोकामा से पीयूष प्रियदर्शी को उम्मीदवार घोषित किया, तो दुलारचंद यादव खुलकर उनके समर्थन में उतर आए। उन्होंने न केवल प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाई, बल्कि जन सुराज के प्रत्याशी के लिए एक प्रचार गीत भी खुद गाया और रिकॉर्ड करवाया। इस गीत में स्थानीय रंग के साथ-साथ अनंत सिंह पर अप्रत्यक्ष चोटें भी थीं। यही बात शायद उन्हें मोकामा के गैंगवार की नई सियासत का निशाना बना गई।
घटना की रात दुलारचंद यादव जन सुराज के प्रचार काफिले के साथ घोसवारी इलाके में मौजूद थे। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, कुछ अज्ञात हमलावरों ने पहले उन्हें रोककर लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटा और फिर गोली मार दी। ये हमला किसी सामान्य झगड़े का परिणाम नहीं था, यह योजनाबद्ध प्रतीत होता है।
जन सुराज प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी ने सीधा आरोप लगाया है कि यह हमला अनंत सिंह के समर्थकों ने किया। उनका कहना है कि दुलारचंद की लोकप्रियता और उनके खुलकर दिए गए बयान कुछ लोगों को रास नहीं आ रहे थे। चुनावी माहौल में यह हत्या, किसी उम्मीदवार के प्रचारक की हत्या मात्र नहीं है, बल्कि यह मोकामा की सियासत में संदेश देने वाली घटना मानी जा रही है कि कौन किस क्षेत्र में बोल सकता है और कौन नहीं। मोकामा का टाल इलाका अपने आप में एक अलग दुनिया है। विशाल खेत, गंगा से जुड़े जलमार्ग, और गहराई तक फैले राजनीतिक-जातीय प्रभाव, इस क्षेत्र को बिहार की राजनीति में एक मिनी-लैब बनाते हैं। यहां सत्ता के समीकरण सिर्फ दलों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रभाव और वफादारियों से तय होते हैं।
दुलारचंद यादव इसी सत्ता-संरचना के एक सशक्त किरदार थे। उन्हें टाल का बादशाह कहा जाता था, न सिर्फ उनके दबदबे की वजह से, बल्कि उनके स्थानीय नेटवर्क और जनता से सीधी पहुंच के कारण भी। वे गांवों में बिना सुरक्षा के घूमते, लोगों से सीधे बात करते, और कई बार प्रशासन को खुलेआम चुनौती देते दिखाई देते थे। उनकी हत्या इस मायने में प्रतीकात्मक है कि यह एक ऐसी पुरानी पीढ़ी के अंत का संकेत देती है, जो राजनीति को सिर्फ विचारधारा से नहीं, बल्कि इलाकाई प्रभाव से चलाती थी।
प्रशांत किशोर की जन सुराज ने बिहार की राजनीति में एक नई शैली पेश करने का दावा किया है, स्वच्छ राजनीति, विकास केंद्रित दृष्टिकोण और लोक भागीदारी। लेकिन मोकामा जैसे इलाकों में यह नई राजनीति पुरानी व्यवस्था से टकरा रही है, जिसमें प्रभाव, डर और बदले की राजनीति रची-बसी है। दुलारचंद यादव का जन सुराज के प्रति समर्थन इस टकराव का प्रतीक बन गया था। उन्होंने खुले मंच से कहा था कि अब टाल में बंदूक नहीं, विकास की बात होगी। शायद यह वाक्य कुछ लोगों को असहज कर गया। बिहार में जहां जातीय वफादारी और बाहुबल चुनावी जीत का प्रमुख आधार रहे हैं, वहां जन सुराज की स्वच्छ छवि का प्रयोग पुराने नेटवर्क के लिए सीधी चुनौती बन रहा है, और दुलारचंद जैसे लोग, जो इस पुराने-नए के बीच पुल बनने की कोशिश कर रहे थे, वे सबसे पहले निशाने पर आ गए।
बिहार की राजनीति और अपराध का रिश्ता कोई नया नहीं है। मोकामा, बाढ़, जहानाबाद, और सीवान जैसे क्षेत्रों में पिछले चार दशकों से यह रिश्ता चुनाव दर चुनाव और गहरा होता गया है। 1990 के दशक में जब लालू यादव ने अति पिछड़ों और दलितों की राजनीति को सामाजिक न्याय के रूप में पुनर्परिभाषित किया, तब भी कई इलाकों में यह न्याय बाहुबल के सहारे ही टिक पाया। अनंत सिंह, सुरेंद्र यादव, मोहम्मद शहाबुद्दीन, इन नामों ने बिहार की सियासत में एक ऐसा अध्याय लिखा, जिसमें अपराध और राजनीति की सीमाएं लगभग मिट गईं। दुलारचंद यादव इसी संस्कृति के उत्पाद थे, और अंततः उसी संस्कृति का शिकार बन गए।
हत्या के बाद पटना ग्रामीण पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। लेकिन मोकामा और घोसवारी के स्थानीय लोगों के बीच सवाल गूंज रहा है, क्या इस जांच का भी वही हश्र होगा, जो पिछली कई राजनीतिक हत्याओं का हुआ था? बिहार में राजनीतिक हत्याएं अक्सर लोकल रंजिश या गैंगवार के रूप में दर्ज की जाती हैं, लेकिन इनके पीछे का राजनीतिक नेटवर्क शायद ही कभी उजागर हो पाता है।
जन सुराज नेताओं ने मांग की है कि इस हत्याकांड की जांच सीबीआई या किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए। वहीं, जेडीयू खेमे ने इन आरोपों को राजनीतिक नौटंकी बताया है, पर इस बयानबाजी के बीच मोकामा की आम जनता में डर का माहौल है। गांवों में शाम के बाद सन्नाटा छा जाता है, लोग घरों में जल्दी लौट जाते हैं। मोकामा का यह हत्याकांड सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि एक पूरे राजनीतिक मॉडल की विफलता का आईना है। बिहार में जहां सरकार सुशासन का दावा करती है, वहीं टाल जैसे इलाकों में आज भी कानून की बजाय दबंगई चलती दिखती है।
यह सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि मोकामा बिहार का वह क्षेत्र है, जहां से हर बार सत्ता और अपराध के समीकरण बदलते रहे हैं। यहां जो ताकतवर होता है, वही राजनीतिक दिशा तय करता है। अब जब दुलारचंद यादव जैसे पुराने किरदार मारे जा रहे हैं, तो सवाल उठता है कि क्या यह सत्ता के पुराने ढांचे का पुनर्संयोजन है, या किसी नए दौर की शुरुआत?
दुलारचंद यादव की हत्या हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि बिहार में राजनीति अभी भी विचारों की नहीं, बल्कि प्रभाव की जंग है। चाहे जन सुराज जैसी नई पार्टी हो या पुराने दल, जब तक राजनीति स्थानीय हिंसा, जातीय निष्ठा और व्यक्तिगत प्रभाव से ऊपर नहीं उठेगी, तब तक बिहार का लोकतंत्र अधूरा रहेगा। मोकामा का टाल आज सिर्फ एक भौगोलिक इलाका नहीं रहा, यह बिहार की राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक बन गया है, जहां हर चुनाव के साथ खून की स्याही से लोकतंत्र का नया अध्याय लिखा जाता है। दुलारचंद यादव की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि परिवर्तन की बात करने वालों को सबसे पहले उसी व्यवस्था की हिंसा का सामना करना पड़ता है जिसे वे बदलना चाहते हैं। उनकी मौत मोकामा की राजनीति में सिर्फ एक व्यक्ति का अंत नहीं है, यह उस उम्मीद की हत्या है कि शायद इस बार राजनीति बंदूक से नहीं, विचार से जीती जाएगी।

