देवानंद सिंह
राजनीति अक्सर आग में जलती लकड़ी की तरह होती है, जिसे झोंक दो, तो लौ बढ़ती है, हवा बदलो, तो स्वरूप भी बदल जाता है। बिहार की राजनीति में ऐसी ही एक लपट इन दिनों परबत्ता से उठकर पटना तक पहुंच गई है। इस लपट का नाम है डॉ. संजीव कुमार। एक चिकित्सक से विधायक बने युवा नेता, जिन्होंने तीन अक्टूबर को जनता दल (यूनाइटेड) छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का दामन थाम लिया। यह कदम महज़ एक पार्टी परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार की राजनीतिक ट्यूनिंग में आई नई ताल है, जहां जातीय समीकरण, स्थानीय हित और सत्ता की रणनीति, सब मिलकर एक नया नक्शा खींच रहे हैं।
पहली नज़र में डॉ. संजीव का परिचय साधारण प्रतीत होता है। वह 2020 में परबत्ता से विधायक चुने गए, पेशे से डॉक्टर, और चार बार के विधायक व पूर्व मंत्री रामानंद प्रसाद सिंह के पुत्र हैं। पर इस साधारण जीवनी के पीछे एक असाधारण राजनीतिक कहानी छिपी है। अपने पिता की विरासत के साथ-साथ डॉ. संजीव को स्थानीय प्रभाव, महत्वाकांक्षा और सत्ताधारी ढांचे से टकराने की प्रवृत्ति भी विरासत में मिली। यही टकराव बार-बार उन्हें पार्टी लाइन से बाहर खड़ा करता रहा और अंततः एक नए राजनीतिक घर की ओर धकेल गया।
संजीव कुमार का राजनीतिक सफर उन चुनिंदा नेताओं में गिना जा सकता है, जो अपने शुरुआती कार्यकाल में ही बाग़ी छवि अर्जित कर लेते हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान जब उन्होंने खुलेआम कहा कि गरीबों और मजदूरों के नाम सूची से गायब कर दिए जा रहे हैं, तो यह महज़ प्रशासनिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि पार्टी नेतृत्व की संवेदनशीलता पर भी प्रश्न था। इस बयान ने सत्ता पक्ष की असहजता को बढ़ा दिया और संजीव को उस पंक्ति में खड़ा कर दिया, जहां पार्टी अनुशासन और लोकतांत्रिक असहमति के बीच की रेखा धुंधली पड़ जाती है, लेकिन असल मोड़ तब आया जब फरवरी 2024 के फ्लोर-टेस्ट के दौरान उन पर आरोप लगे कि वे जदयू विधायकों को विपक्षी पाले में लाने की कोशिश कर रहे थे। इस आरोप ने उनके राजनीतिक करियर में एक स्थायी छाया डाल दी। पार्टी के अंदर से विरोध के स्वर उठे, सुधांशु शेखर जैसे सहयोगियों ने उन पर खरीद-फरोख्त में शामिल होने तक का आरोप लगाया। आर्थिक अपराध इकाई ने जांच शुरू की, जो आज भी जारी है। इस प्रकरण ने संजीव को बाग़ी विधायक की संज्ञा दे दी, और यह उपाधि किसी भी पार्टी के भीतर लंबी उम्र नहीं रखती।
राजनीति में संजीव कुमार का अंदाज़ सीधे और सख्त सवालों का रहा है। गंगा नदी पर पुलों के बार-बार ढहने का मुद्दा हो, या खगड़िया के बुनियादी ढांचे में भ्रष्टाचार की बात, वे लगातार सरकार और नौकरशाही दोनों पर प्रहार करते रहे। उनके भाषणों में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन से लेकर स्थानीय मेडिकल कॉलेज और बिजली सब-स्टेशन जैसे सार्वजनिक प्रोजेक्टों का श्रेय अपने क्षेत्र के नाम जोड़ने की जिद तक दिखाई देती रही, पर यही बेबाकी अक्सर पार्टी के भीतर असहजता का कारण बनी। संगठन और सरकार के बीच सामंजस्य की जो लकीर बिहार की राजनीति में बहुत नाज़ुक होती है, संजीव बार-बार उसी लकीर को पार करते दिखे। नतीजा यह हुआ कि स्थानीय स्तर पर उनका जनाधार तो बढ़ता गया, लेकिन पार्टी नेतृत्व उनसे दूर होता गया। अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों राजद? सतही तौर पर जवाब सीधा है, राजनीति में अवसर वही पकड़ता है, जो समय पहचान ले, लेकिन यह सिर्फ अवसर की कहानी नहीं, बल्कि कारणों और परिस्थितियों का एक गहन जाल है।
संजीव कुमार की तेजस्वी यादव के प्रति झुकाव अचानक नहीं आया। उनके परिवार का कांग्रेस और महागठबंधन के नेताओं से पुराना परिचय रहा है। उनके भाई, कांग्रेस एमएलसी राजीव कुमार, पहले से महागठबंधन के संपर्क में रहे हैं। यह पारिवारिक समीकरण राजनीतिक पुल का काम करता है। दूसरा, परबत्ता सीट का अपना जातीय ताना-बाना है। यहां भूमिहार, ओबीसी, ईबीसी और एससी वोटों का संतुलन निर्णायक भूमिका निभाता है। राजद पारंपरिक रूप से यादव-मुस्लिम समीकरण पर टिकी पार्टी रही है, लेकिन भूमिहार वोट बैंक तक उसकी पहुँच सीमित रही है। ऐसे में, डॉ. संजीव जैसे भूमिहार नेता का साथ मिलना राजद के लिए सिर्फ एक विधायक का लाभ नहीं, बल्कि एक सामाजिक विस्तार का अवसर है।
उनकी मौजूदगी राजद को न सिर्फ परबत्ता में, बल्कि पूरे खगड़िया-बेगूसराय बेल्ट में जातीय सन्तुलन साधने में मदद कर सकती है। यह वही इलाका है, जहां भूमिहार और पिछड़ी जातियों का साझा नेतृत्व लंबे समय से टूटता-बनता रहा है। ऐसे में, संजीव का आगमन एक बैलेंसिंग एजेंट की तरह है, जो भूमिहार प्रतिष्ठा के साथ-साथ गरीब तबकों की राजनीतिक आवाज़ को भी जोड़ सकता है। राजनीतिक अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से देखें तो यह डिफेक्शन कोई अचानक की गई घुसपैठ नहीं, बल्कि एक योजनाबद्ध कदम है। राजद अब केवल पारंपरिक जाति समीकरणों से नहीं, बल्कि स्थानीय प्रभावशाली चेहरों के सहारे अपने क्षेत्रीय विस्तार की रणनीति पर काम कर रही है। पश्चिम और उत्तर बिहार में उसका लक्ष्य है, जातीय गोलबंदी से आगे बढ़कर स्थानीय विकास और नेतृत्व के भरोसे वोटों का समेकन।
पर सवाल यही है कि क्या एक व्यक्ति के दल बदलने से वोट बैंक शिफ्ट होता है? इतिहास कहता है कि बिहार में ऐसा बहुत कम हुआ है। भूमिहार समाज पारंपरिक रूप से स्थायी राजनीतिक निष्ठा नहीं रखता, वे उसी ओर झुकते हैं, जहां उन्हें नेतृत्व और सम्मान की गारंटी दिखे। संजीव ने अपने कार्यकाल में विकास के ठोस उदाहरण पेश किए। ऐसे में, उनकी स्थानीय छवि मजबूत है। पर यह देखना बाकी है कि क्या यह लोकप्रियता वोटों में तब्दील हो सकेगी।
जदयू के लिए यह नुकसान सिर्फ एक विधायक के खोने का नहीं, बल्कि संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष का भी संकेत है। पार्टी प्रवक्ताओं ने संजीव पर पार्टी-विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाया और उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया। पर इस औपचारिक कार्रवाई के पीछे असली चिंता यह है कि क्या नीतीश कुमार का संगठन अब असहमति को संभालने की क्षमता खो रहा है? यह सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का चेहरा स्थिरता और अनुशासन का प्रतीक रहा है। अगर उनके ही दल में युवा नेता असंतोष के चलते पलायन करने लगें, तो यह न केवल पार्टी की आंतरिक संरचना पर सवाल है, बल्कि 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए गंभीर चेतावनी भी है। संजीव कुमार पर चल रही ईओयू जांच भी इस कहानी का अहम हिस्सा है। राजनीति में जांच एजेंसियों का इस्तेमाल अक्सर दोधारी तलवार की तरह होता है। संजीव इस जांच को अपने राजनीतिक उत्पीड़न के नैरेटिव में बदल सकते हैं, मैं जनता की आवाज़ उठा रहा था, इसलिए मुझ पर कार्रवाई की जा रही है।
यह नैरेटिव भावनात्मक असर पैदा करता है, खासकर तब जब मतदाता खुद प्रशासनिक अन्याय से असंतुष्ट हों, लेकिन कानूनी प्रक्रिया की अपनी गंभीरता है। आरोप जब तक सिद्ध नहीं होते, तब तक वे राजनीतिक हथियार भर हैं, पर जोखिम भरे भी। अगर, जांच में ठोस सबूत मिले, तो वही नैरेटिव पलट सकता है। राजद के लिए संजीव कुमार का आगमन उत्साहजनक जरूर है, पर आसान नहीं। परबत्ता जैसी सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी होता है। 2020 में उनकी जीत का अंतर महज़ 951 वोट था। ऐसी स्थिति में किसी भी नेता का साइड-स्विच परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब राजद संगठनात्मक स्तर पर संजीव की ताकत को बूथ स्तर तक उतार सके।
राजद को यह भी देखना होगा कि संजीव की भाषा और शैली उसकी राजनीतिक संस्कृति के अनुकूल है या नहीं। उनके कुछ बयान — जैसे अगर, मेरी इज्जत पर आंच आई तो मैं हथियार उठा सकता हूं — शक्ति प्रदर्शन के प्रतीक जरूर हैं, लेकिन लोकतांत्रिक आचरण के लिहाज से अशोभनीय माने जाते हैं। चुनावी राजनीति में ऐसे शब्द अक्सर हिंसक प्रवृत्तियों को जन्म देते हैं, जो पार्टी की छवि के लिए घातक हो सकते हैं। इसलिए तेजस्वी यादव के सामने यह चुनौती होगी कि वे संजीव के जोश को ऊर्जा में बदलें, लेकिन आक्रामकता को मर्यादा में रखें।
संजय कुमार की यह दल-बदल बिहार की राजनीति में उस संक्रमण का प्रतीक है जो पिछले एक दशक से चल रहा है। अब राजनीति सिर्फ जाति की गणित या बड़े नारों पर नहीं टिकती। चुनाव अब केवल कौन सी जाति किसके साथ है पर नहीं, बल्कि कौन सा नेता जनता की समस्या को कितनी ताक़त से उठा रहा है पर निर्भर करने लगे हैं। यही वजह है कि तेजस्वी यादव जैसे युवा नेता अब ऐसे चेहरों को जोड़ रहे हैं जो स्थानीय प्रभाव रखते हैं, भले वे कभी विरोधी दल में रहे हों।
बिहार की 2025 की चुनावी तस्वीर में डॉ. संजीव कुमार का कदम एक छोटे भूकंप जैसा है। इससे पूरे राज्य का नक्शा तो नहीं बदलेगा, लेकिन परबत्ता, खगड़िया और आसपास के इलाकों में सत्ता संतुलन जरूर हिल सकता है। जदयू के लिए यह चेतावनी है कि पार्टी के भीतर असहमति की जगह सिकुड़ रही है। भाजपा के लिए यह संकेत है कि सहयोगी दलों की आंतरिक दरारें भविष्य की रणनीति पर असर डाल सकती हैं। वहीं, राजद के लिए यह अवसर है कि वह अपने सामाजिक आधार का दायरा बढ़ाए और ‘सिर्फ जातीय पार्टी’ की छवि से बाहर निकले, लेकिन अंततः फैसला जनता के हाथ में है। क्या परबत्ता के मतदाता संजीव को अपने हितों का सच्चा प्रतिनिधि मानेंगे, या यह कदम उन्हें एक और पार्टी बदलने वाले नेता की श्रेणी में रख देगा? यह आने वाला चुनाव बताएगा।
राजनीति में अवसर और नैतिकता का द्वंद्व सदैव चलता रहा है। परबत्ता की यह कहानी बताती है कि बिहार में अब वही नेता टिकेगा जो न सिर्फ अपनी जाति का, बल्कि जनता के जीवन-संघर्ष का प्रतिनिधि बन सके। डॉ. संजीव कुमार के सामने अब वही असली परीक्षा है कि क्या वे अपने बाग़ी स्वभाव को जनहित की राजनीति में रूपांतरित कर पाएंगे, या इतिहास उन्हें एक और राजनीतिक मोड़ भर के रूप में याद रखेगा?

