देवानंद सिंह
भारत में सार्वजनिक स्थानों पर नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों की मूर्तियां लगाने की परंपरा नई नहीं है, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और द्रविड़ राजनीति के दिग्गज एम. करुणानिधि की मूर्ति लगाने की अनुमति से जुड़े एक मामले में जो सख्त टिप्पणी की, उसने इस परंपरा के पीछे छिपे राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों को एक बार फिर उजागर कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि आखिर क्यों जनता के टैक्स से जुटाए गए धन का इस्तेमाल नेताओं के महिमामंडन में होना चाहिए। क्या यह उचित है कि जिन सुविधाओं पर आम नागरिकों का हक है, उनकी जगह सियासतदान अपनी स्मृतियां गढ़ने में जुट जाएं?
दरअसल, तमिलनाडु सरकार ने तिरुनेलवेली जिले में करुणानिधि की मूर्ति लगाने की अनुमति मांगी थी, लेकिन पहले मद्रास हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट दोनों ने इस याचिका को खारिज कर दिया। अदालतों ने तर्क दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर मूर्तियां लगाने से ट्रैफिक बाधित होता है, नागरिकों को असुविधा झेलनी पड़ती है, और शहरी ढांचों पर दबाव बढ़ता है। खास बात यह रही कि मद्रास हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को यह वैकल्पिक सुझाव दिया कि यदि, नेताओं की स्मृति को जीवित रखना ही है तो उनके नाम से पार्क बनाए जाएं, ताकि लोग वहां आकर हरियाली का आनंद लेने के साथ-साथ नेताओं के विचारों और योगदान से भी परिचित हो सकें। यह सुझाव दरअसल सिर्फ तमिलनाडु के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीतिक संस्कृति के लिए एक दिशा है।
भारत में मूर्तियों की राजनीति का एक लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों से लेकर क्षेत्रीय दलों के नेताओं तक, जगह-जगह उनके स्मारक और प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं। यह महज श्रद्धांजलि का भाव नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी है। किसी नेता की मूर्ति खास समुदाय या जाति को यह संकेत देती है कि उनका नायक सम्मानित है, और उस सम्मान को कायम रखने के लिए वोट बैंक भी सुरक्षित रहना चाहिए। यही कारण है कि चुनावी सालों में या फिर किसी बड़े नेता के निधन के बाद मूर्ति राजनीति की मांग अचानक तेज हो जाती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी नेता की विरासत को केवल पत्थर या धातु की मूर्ति से ही परिभाषित किया जा सकता है? क्या जनता का पैसा उन ढांचों पर खर्च होना चाहिए, जिनसे न तो शिक्षा सुधरती है, न स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर होती हैं, और न ही रोजमर्रा की जिंदगी में कोई ठोस सुधार आता है? वास्तव में, सार्वजनिक स्मृति और सार्वजनिक सुविधा, दोनों ही लोकतंत्र में महत्वपूर्ण हैं। नेताओं और ऐतिहासिक हस्तियों का योगदान समाज को प्रेरित करता है और उनकी स्मृति कायम रखना जरूरी भी है, लेकिन यह स्मृति किस रूप में जीवित रहे, यह सवाल मौलिक है। अदालतों ने इसी पर जोर दिया है कि स्मृति का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे समाज को वास्तविक लाभ पहुंचे।
यदि, करुणानिधि या किसी भी नेता की स्मृति को जीवित रखना है, तो क्यों न उनके नाम से एक लाइब्रेरी बने जहां उनकी लिखी किताबें, भाषण और विचार सुरक्षित हों और नई पीढ़ी पढ़ सके। क्यों न उनके नाम से एक टेक्नोलॉजी पार्क, एक रिसर्च सेंटर या एक स्कॉलरशिप स्कीम शुरू की जाए जिससे युवाओं को वास्तविक मदद मिल सके। इस तरह नेताओं की स्मृति केवल शोभा बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रगति का औजार भी बनेगी। आज भारत के ज्यादातर शहरों की स्थिति यह है कि वहां रहने वालों को स्वच्छ हवा, हरियाली और खुली जगह की भारी कमी महसूस होती है। फुटपाथ अतिक्रमण से भरे हैं, पार्किंग की समस्या है, सड़कें टूटी पड़ी हैं और यातायात की हालत बदहाल है। ऐसे में, जब सरकारें लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर मूर्तियां खड़ी करती हैं तो नागरिकों में स्वाभाविक असंतोष पैदा होता है। अदालतों ने इसी व्यावहारिक पहलू को आधार बनाकर कहा कि मूर्तियों की जगह पार्क बनाए जाएं, क्योंकि वे न केवल शहर की खूबसूरती बढ़ाएंगे, बल्कि नागरिकों के लिए सांस लेने की जगह भी तैयार करेंगे।
पार्क सिर्फ हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद के स्थल भी होते हैं। वहां बच्चे खेल सकते हैं, बुजुर्ग टहल सकते हैं, और युवा पढ़ाई या बातचीत कर सकते हैं। यदि, ऐसे पार्कों में नेताओं के जीवन और विचारों से जुड़ी जानकारी उपलब्ध हो, तो यह स्मृति और सुविधा दोनों का संतुलन बन जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक और गहरा प्रश्न उठाया कि आखिर जनता के टैक्स से इकट्ठा हुआ पैसा किस काम में आना चाहिए? लोकतांत्रिक शासन की बुनियाद यही है कि जनता सरकार को अपने संसाधनों का जिम्मेदार प्रबंधन सौंपती है, लेकिन जब यही संसाधन नेताओं के महिमामंडन या चुनावी लाभ के लिए खर्च होने लगते हैं तो लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचती है।
भारत जैसे विकासशील देश में जहां अब भी स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ पानी और बुनियादी ढांचों की भारी कमी है, वहां मूर्तियों पर खर्च किया गया हर रुपया जनता से छीन लिया गया अवसर है। यदि, वही पैसा अस्पतालों की हालत सुधारने, सड़कों की मरम्मत करने या पार्कों के निर्माण में लगाया जाए तो यह सीधे जनता के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाएगा। विरासत केवल मूर्तियों से नहीं बनती। विरासत बनती है विचारों से, कार्यों से और उन संस्थाओं से जो किसी समाज को स्थायी योगदान देती हैं। करुणानिधि जैसे नेता, जिन्होंने तमिल राजनीति और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया, उनकी विरासत को यदि, सचमुच मजबूत करना है तो उसे शिक्षा, साहित्य और सामाजिक कार्यक्रमों से जोड़ा जाना चाहिए।
उदाहरण के लिए, यदि करुणानिधि के नाम पर एक द्रविड़ विचार शोध संस्थान बने, जहां उनके लेखन, नाटकों और भाषणों का अध्ययन हो सके, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए कहीं अधिक मूल्यवान होगा। इसी तरह यदि उनके नाम से किसी गरीब छात्रवृत्ति योजना की शुरुआत हो, तो हजारों-लाखों युवाओं का भविष्य संवर सकता है। यह मूर्ति से कहीं बड़ी और जीवंत विरासत होगी। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने जो रुख अपनाया है, वह लोकतांत्रिक विमर्श में एक आवश्यक हस्तक्षेप है। यह केवल करुणानिधि या तमिलनाडु तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि पूरे भारत के लिए नजीर है। अदालतों ने इस बहस को राजनीतिक चश्मे से बाहर निकालकर नागरिक सुविधा और सार्वजनिक संसाधनों की दृष्टि से देखने की कोशिश की है। यह संदेश सभी दलों और राज्यों को समझना चाहिए कि विरासत और स्मृति का अर्थ जनता की भलाई से अलग नहीं हो सकता।
कुल मिलाकर, आज जब देश के नागरिक हर दिन ट्रैफिक, प्रदूषण, रोजगार की कमी और बुनियादी सुविधाओं के संकट से जूझ रहे हैं, तब मूर्तियों की राजनीति वास्तव में उनकी प्राथमिकताओं का मजाक उड़ाती है। नेताओं की स्मृति और सम्मान को लेकर कोई विवाद नहीं है, लेकिन उस सम्मान का रूप ऐसा होना चाहिए जिससे समाज को वास्तविक लाभ मिले।
पार्क, पुस्तकालय, शोध संस्थान, छात्रवृत्ति योजनाएं, ये सब ऐसे साधन हैं, जिनसे न केवल किसी नेता की विचारधारा जीवित रहती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी रास्ता मिलता है। इसके विपरीत, मूर्तियां अक्सर निष्क्रिय, विवादित और बोझिल संरचनाओं में बदल जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस दिशा में चेतावनी की घंटी है। यह लोकतंत्र को याद दिलाती है कि टैक्सपेयर्स का पैसा जनता की जरूरतों के लिए है, न कि राजनीतिक प्रतीकों की सजावट के लिए। यदि, सरकारें और दल इस संदेश को आत्मसात करें, तो देश में सार्वजनिक स्मृति और सार्वजनिक सुविधा का ऐसा संतुलन बन सकता है जो वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करेगा।

