जीएसटी सुधार भारत की आर्थिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़
देवानंद सिंह
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को राष्ट्र के नाम संदेश में घोषणा की कि 22 सितंबर से लागू होने वाली जीएसटी की नई दरें देश की अर्थव्यवस्था के लिए अगली पीढ़ी के सुधार साबित होंगी। प्रधानमंत्री का दावा था कि इन बदलावों से गरीब, मध्यम वर्ग, किसान, महिलाएं और व्यापारी सभी वर्ग सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे। सरकार का तर्क है कि रोज़मर्रा की वस्तुओं, खाने-पीने की चीज़ों और बीमा व ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में कर भार घटने से न केवल उपभोक्ता की बचत बढ़ेगी, बल्कि अर्थव्यवस्था में मांग और उत्पादन को भी नई गति मिलेगी।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में पुराने टैक्स ढांचे की तुलना करते हुए कहा कि पहले एक राज्य से दूसरे राज्य में सामान भेजना किसी अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसा कठिन था। नए सुधारों के बाद व्यापार आसान होगा और टैक्स रियायतों के माध्यम से नागरिकों को 2.5 लाख करोड़ रुपये तक की बचत का अवसर मिलेगा। प्रधानमंत्री का जोर इस बात पर भी रहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) और स्वदेशी उत्पादन को प्राथमिकता देनी होगी, लेकिन सवाल यह है कि यह सुधार वास्तव में कितना दूरगामी असर डाल पाएंगे? क्या यह आम आदमी की जेब में तुरंत राहत देंगे या फिर इसके प्रभाव को महसूस होने में समय लगेगा? और सबसे अहम—क्या इन सुधारों का समय भारत की वास्तविक आर्थिक ज़रूरतों के अनुरूप है, या इसके पीछे राजनीतिक लक्ष्य छिपे हुए हैं?
नई जीएसटी दरों में बदलाव का सीधा फायदा उपभोक्ता को मिलता दिख रहा है। दूध, मक्खन जैसी मूलभूत वस्तुएं सस्ती हुई हैं। कारों की कीमतों में कमी आई है। इंश्योरेंस प्रीमियम पर लगने वाला 18 प्रतिशत टैक्स हटने से परिवारों को हज़ारों रुपये की वार्षिक बचत होगी। उपभोक्ता की यह अतिरिक्त बचत परचेज़िंग पावर को बढ़ाएगी और वही पैसा बाज़ार में वापस घूमेगा, जिससे मांग और उत्पादन दोनों बढ़ सकते हैं, लेकिन आलोचकों का मानना है कि तस्वीर इतनी सरल नहीं है। उदाहरण के लिए, बीमा कंपनियों का कहना है कि उन्हें ऑफिस खर्च, कर्मचारियों की तनख्वाह और अन्य संचालन लागत पर कोई राहत नहीं मिली है। वहीं, उनकी आय का बड़ा हिस्सा यानी प्रीमियम अब टैक्स मुक्त कर दिया गया है। इसका नतीजा यह हो सकता है कि बीमा कंपनियां आय में कमी की भरपाई ग्राहकों की सुविधाओं में कटौती करके या नए शुल्क लगाकर करें। ऐसे में, उपभोक्ता को दी गई राहत धीरे-धीरे संतुलित हो सकती है और लंबे समय में आम आदमी को उतना लाभ न मिले जितना अभी बताया जा रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार जीएसटी 2017 में लागू हुआ था और उसी समय इसे लेकर कई विसंगतियां और कठिनाइयां सामने आई थीं। छोटे उद्योगों और खुदरा व्यापारियों को टैक्स ढांचे की जटिलताओं से जूझना पड़ा। अब जाकर इनमें संशोधन किया गया है। सवाल यह उठता है कि क्या यह कदम बहुत देर से उठाया गया? आलोचकों का कहना है कि अगर, इन सुधारों को समय रहते लागू किया जाता तो महामारी के बाद की आर्थिक मंदी से उबरने में देश को और तेजी मिल सकती थी। छोटे उद्योग पहले ही महंगाई, कच्चे माल की लागत और प्रतिस्पर्धा के दबाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में, देर से आया यह कदम उनके लिए राहत जरूर है, लेकिन उतना प्रभावशाली नहीं जितना समय पर होता।
एक बड़ा सवाल इस सुधार के राजनीतिक समय को लेकर उठ रहा है। देश के कई बड़े राज्यों बिहार, असम और उत्तर प्रदेश—में आने वाले महीनों में चुनाव हैं। मध्यम वर्ग, जो कभी भाजपा का मजबूत वोट बैंक माना जाता था, अब सरकार की नीतियों से कुछ हद तक निराश दिख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीएसटी सुधार की घोषणा को इसी वर्ग को साधने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। आलोचकों का तर्क है कि सरकार ने इसे ऐसे प्रस्तुत किया मानो पिछली सरकारों ने टैक्स बोझ बढ़ाया था और अब मोदी सरकार जनता को उससे मुक्ति दिला रही है, जबकि वास्तविकता यह है कि 2017 में जीएसटी की संरचना मौजूदा सरकार ने ही बनाई थी। अब उन्हीं दरों में संशोधन करके राहत देने का दावा किया जा रहा है। विपक्ष भी इस बिंदु को जनता के सामने मजबूती से उठाने में असफल रहा, जिसका लाभ सत्ताधारी दल को मिलता दिख रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, बीते कुछ चुनावों के अनुभव से साफ है कि केवल राष्ट्रवाद का नैरेटिव अब उतना असरदार नहीं रहा। जनता की आर्थिक परेशानियां मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, खर्चों में बढ़ोतरी अब केंद्र में हैं। ऐसे में, जीएसटी सुधार भाजपा के लिए उस मध्यम वर्ग को दोबारा जोड़ने का प्रयास है, जो आर्थिक दबावों के चलते धीरे-धीरे दूर होता दिख रहा है।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में स्वदेशी उत्पादों और एमएसएमई को सशक्त बनाने पर विशेष बल दिया। उनका कहना था कि जो देश के लोगों की ज़रूरत का है, उसे हमें देश में ही बनाना चाहिए। यह संदेश आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा से जुड़ा हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि छोटे और मध्यम उद्योगों को टैक्स में मिली छूट से अप्रत्यक्ष रूप से फायदा होगा। जब उपभोक्ता के पास अधिक पैसा बचेगा तो मांग बढ़ेगी, जिससे उत्पादन भी बढ़ेगा। त्योहारों के समय इसका असर और भी स्पष्ट दिख सकता है, लेकिन केवल टैक्स छूट से छोटे उद्योग लंबे समय तक टिक नहीं पाएंगे। वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारतीय उत्पादों की रक्षा करने के लिए सरकार को आयात पर सख्ती करनी होगी। आलोचकों का तर्क है कि अमेरिका की तरह अगर विदेशी वस्तुओं पर अधिक शुल्क लगाया जाए, तो घरेलू उद्योगों को बेहतर मौका मिलेगा। अन्यथा विदेशी कंपनियां सस्ते दाम पर सामान बेचकर भारतीय उद्योग को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
एमएसएमई को सशक्त करने के लिए केवल कर छूट काफी नहीं है। उन्हें आधुनिक तकनीक, आसान कर्ज, लॉजिस्टिक समर्थन और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच दिलाने की भी आवश्यकता है। यदि, यह समग्र रणनीति नहीं अपनाई गई तो जीएसटी में किया गया सुधार महज अस्थायी राहत ही साबित होगा।
जीएसटी 2.0 को लेकर सरकार का दावा है कि यह आम जनता और व्यापार जगत के लिए ऐतिहासिक राहत है। उपभोक्ताओं को कुछ क्षेत्रों में निश्चित रूप से लाभ मिलेगा। बाजार में मांग और उत्पादन बढ़ने की संभावना है। लेकिन इसके प्रभाव को लेकर कई तरह की आशंकाएं भी हैं।
बीमा कंपनियों का विरोध, सुधार के देर से लागू होने का सवाल, और इसके चुनावी समय को लेकर उठते संदेह, यह सब इस कदम की सीमाओं को उजागर करते हैं। छोटे उद्योगों और एमएसएमई को वास्तव में सशक्त बनाने के लिए केवल कर छूट पर्याप्त नहीं होगी; उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से बचाने और घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता देने के लिए व्यापक नीतिगत बदलाव की आवश्यकता है। आख़िरकार, जीएसटी सुधार भारत की आर्थिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ जरूर है, लेकिन इसे केवल अगली पीढ़ी के सुधार कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं। यह तभी सफल होगा, जब इसके साथ समग्र औद्योगिक नीति, आयात-निर्यात प्रबंधन, और रोजगार सृजन की ठोस रणनीतियां भी जुड़ें। वरना यह कदम जनता को तत्काल राहत तो देगा, पर दीर्घकालिक बदलाव का लक्ष्य अधूरा ही रह जाएगा।

