जितिया पर्व पर अवकाश: परंपरा, संवेदना और पत्रकारिता की जिम्मेदारी
देवानंद सिंह
जितिया पर्व पर राष्ट्र संवाद कार्यालय द्वारा अवकाश घोषित करना एक सकारात्मक और सराहनीय कदम है। यह केवल एक छुट्टी का ऐलान नहीं, बल्कि उन माताओं और बेटियों के श्रम, त्याग और परंपरा के प्रति सम्मान का प्रतीक है जो इस पर्व को पूरे विश्वास और आस्था से मनाती हैं।
मीडिया हमेशा दूसरों की आवाज बुलंद करता है, लेकिन अपने घर के भीतर के सवालों पर अक्सर चुप रह जाता है। महिला पत्रकारों और कर्मचारियों के लिए धार्मिक-सांस्कृतिक पर्वों पर अवकाश की परंपरा शुरू करना यह संदेश देता है कि संस्थान उनकी भावनाओं और जीवन मूल्यों का सम्मान करता है। यह कदम अन्य मीडिया संस्थानों के लिए भी अनुकरणीय बन सकता है।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि RNI के नियमों के अनुसार महीने में 25 दिन अखबार का नियमित प्रकाशन होना चाहिए। इस संतुलन को बनाए रखते हुए छुट्टियां घोषित करना प्रबंधन के लिए एक चुनौती हो सकता है। समाधान यह है कि ऐसी छुट्टियों को पहले से नियोजित किया जाए ताकि पाठकों को नियमित सामग्री मिलती रहे और कर्मचारियों को पर्व मनाने का अवसर भी मिले।
यह बहस सिर्फ छुट्टी तक सीमित नहीं है। यह कार्यस्थल पर जेंडर संवेदनशीलता और कार्य-जीवन संतुलन का भी सवाल है। महिला पत्रकार हों या पुरुष, सबको अपने पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व निभाने का समान अवसर मिलना चाहिए।

अंततः, जितिया पर अवकाश की शुरुआत केवल एक परंपरा का सम्मान नहीं बल्कि समाज में बदलते मूल्यों और संवेदनशील पत्रकारिता की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। मीडिया को चाहिए कि वह न केवल समाज की आवाज बने बल्कि अपने भीतर भी मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दे।

पत्रकारिता का असली चेहरा तभी निखरेगा जब वह दूसरों की तरह अपने घर के भीतर भी न्याय, सम्मान और समानता की आवाज बुलंद करे। जितिया की छुट्टी सिर्फ शुरुआत है – असली इम्तिहान इसके बाद है।

