देवानंद सिंह
81 वर्ष की उम्र में झारखंड आंदोलन के जननायक और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन का निधन न केवल झारखंड की राजनीति, बल्कि समूचे आदिवासी विमर्श और भारत की लोकतांत्रिक चेतना के एक युग का अंत है। सोमवार सुबह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता की मृत्यु की जानकारी साझा करते हुए लिखा, “आज मैं शून्य हो गया हूं।” यह सिर्फ एक बेटे की भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि उस आदिवासी चेतना का भी शोकगीत था, जिसकी आत्मा को दशकों तक दिशोम गुरु ने दिशा दी थी।
शिबू सोरेन का जीवन बिहार के हजारीबाग (अब झारखंड) के एक सुदूर गांव से शुरू होकर भारतीय लोकतंत्र के केंद्र तक पहुंचने की गाथा है। उनका जन्म 1944 में एक ऐसे समय में हुआ था, जब आदिवासी समाज सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक शोषण के त्रिकोण में जकड़ा हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने के कारण हुई थी। यही वह क्षण था, जिसने शिबू सोरेन को जनआंदोलन की आग में तपाकर आदिवासी प्रतिरोध का पुरोधा बना दिया।
शिबू सोरेन ने महाजनी व्यवस्था के विरुद्ध धान कटनी आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसमें उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि धान उगाने वाले किसान ही धान काटेंगे, न कि सूदखोर महाजन। यह आंदोलन केवल आर्थिक न्याय का प्रश्न नहीं था, बल्कि यह आदिवासी स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का उद्घोष भी था। 1970 के दशक में यह आंदोलन पूरे दक्षिण बिहार में फैल गया और शिबू सोरेन ने गांव-गांव जाकर आदिवासियों को संगठित किया।
साल 1973 में विनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। जेएमएम कोई साधारण राजनीतिक संगठन नहीं था, बल्कि यह आदिवासियों के आत्मसम्मान, उनके संसाधनों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए एक संघर्षशील मोर्चा था। इस संगठन ने झारखंड के अलग राज्य की परिकल्पना को एक सशक्त सामाजिक आंदोलन का रूप दिया। अविभाजित बिहार के 26 जिलों को मिलाकर एक सांस्कृतिक, भौगोलिक और आर्थिक इकाई के रूप में झारखंड की परिकल्पना उन्हीं के प्रयासों का परिणाम थी।
शिबू सोरेन ने न केवल राज्य के निर्माण की लड़ाई लड़ी, बल्कि उसे तेवर भी दिया, एक ऐसा तेवर जो व्यवस्था के सामने झुकने की बजाय उसे चुनौती देता था। उनकी रैलियों में उमड़ती भीड़ और आदिवासी युवाओं में जोश यह साबित करता था कि वे सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन के पर्याय बन चुके थे। शिबू सोरेन को ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि आदिवासी समाज ने दी थी। दिशोम का अर्थ होता है ‘देश’ और गुरु का अर्थ होता है ‘मार्गदर्शक’। इस प्रकार दिशोम गुरु वह हुआ जो अपने समुदाय को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दिशा देता है। शिबू सोरेन रात्रि पाठशालाएं चलाते थे, ताकि दिनभर मेहनत करने वाले आदिवासी रात को पढ़ सकें। वे शराब और फिजूलखर्ची के खिलाफ प्रचार करते थे और मानते थे कि शिक्षा ही आदिवासी समाज को प्रगति की राह पर ले जा सकती है।
उनका पहला भाषण संसद में शराब के खिलाफ था, यह उनके सोच की गहराई और समाज सुधारक दृष्टिकोण का प्रमाण है। वे आदिवासी समाज को आत्मनिर्भर, शिक्षित और स्वाभिमानी देखना चाहते थे। यही कारण है कि वे न केवल एक राजनीतिक नेता के रूप में, बल्कि एक सामाजिक मार्गदर्शक के रूप में भी आदिवासी समाज की चेतना में अमर हो गए। 1977 में पहली बार लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी शिबू सोरेन ने हार नहीं मानी। 1980 से 2019 तक वे लगातार दुमका से आठ बार सांसद और दो बार विधायक चुने गए। वे दो बार राज्यसभा के सदस्य भी रहे। उनका संसदीय जीवन उतार-चढ़ावों से भरा रहा। केंद्र सरकार में उन्हें तीन बार कोयला मंत्री बनाया गया, लेकिन दुर्भाग्यवश तीनों बार वे कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।
2004 में केंद्रीय मंत्री बनने के कुछ ही समय बाद जामताड़ा के एक पुराने मामले में गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। 2006 में निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें फिर पद छोड़ना पड़ा, हालांकि बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। राज्य स्तर पर भी उनकी मुख्यमंत्री पद की यात्रा बाधाओं से भरी रही। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन तीनों बार बहुमत या विधायकी चुनाव हारने के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा। 2009 में बीजेपी के समर्थन से सरकार बनी लेकिन जल्द ही गिर गई। यह विडंबना रही कि जिस नेता ने झारखंड राज्य के लिए संघर्ष किया, वह स्वयं वहां स्थिर शासन नहीं दे सके। शिबू सोरेन के राजनीतिक जीवन में आलोचना भी कम नहीं रही। उन पर कई बार वंशवाद, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता के आरोप लगे। खासकर, झारखंड मुक्ति मोर्चा के भीतर परिवारवाद और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर सवाल उठे। उनके बेटे हेमंत सोरेन को पार्टी नेतृत्व सौंपने की प्रक्रिया को भी कई बार आलोचना का विषय बनाया गया।
इसके बावजूद यह कहना गलत नहीं होगा कि इन आलोचनाओं से उनका ऐतिहासिक योगदान कम नहीं होता। शिबू सोरेन की विरासत केवल सत्ता या पदों से नहीं मापी जा सकती, उन्होंने जिस सामाजिक चेतना को जगाया, वह आज भी झारखंड की आत्मा में जीवित है।
कुल मिलाकर, शिबू सोरेन का निधन केवल एक राजनेता का अंत नहीं है, बल्कि झारखंड की आत्मा के एक युग का समापन है। वे उस पीढ़ी के नेता थे, जो राजनीति को समाज परिवर्तन का माध्यम मानते थे, और जिन्होंने आंदोलनों की आंच में तपकर नेतृत्व सीखा। आज जब भारतीय राजनीति की भाषाएं बदल रही हैं, तब शिबू सोरेन की विरासत हमें याद दिलाती है कि सत्ता का असली अर्थ जनता की पीड़ा को समझना, उनकी भाषा में बोलना और उनके लिए लड़ना होता है।
झारखंड आज एक राज्य है, पर वह केवल राजनीतिक सीमाओं से परिभाषित नहीं होता, वह शिबू सोरेन जैसे पुरोधाओं की आत्मा से निर्मित हुआ है। दिशोम गुरु का जाना, आदिवासी भारत की चेतना में एक खालीपन छोड़ गया है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा। शायद, हेमंत सोरेन का “मैं शून्य हो गया” कहना केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है, बल्कि यह झारखंड के हर उस नागरिक की भावना है, जिसने कभी दिशा के लिए दिशोम गुरु की ओर देखा था।
दिशोम गुरु के सम्मान में राष्ट्र संवाद ने कल संपादकीय रिक्त रखा था वही आज दे रहा हूं

