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    पेयरिंग स्कीम से और कठिन हो रही शिक्षा की पहुंच

    News DeskBy News DeskJuly 17, 2025Updated:July 17, 2025No Comments4 Mins Read
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    पेयरिंग स्कीम से और कठिन हो रही शिक्षा की पहुंच
    देवानंद सिंह
    इसी साल फरवरी 2025 में केंद्र सरकार ने लोकसभा को बताया कि पिछले दस वर्षों में देशभर में करीब 89 हजार सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं, जिनमें से 25 हजार से अधिक अकेले उत्तर प्रदेश में हैं। इन आंकड़ों ने जहां देश की प्राथमिक शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए, वहीं उत्तर प्रदेश की पेयरिंग स्कीम ने इस बहस को और तेज़ कर दिया है।

     

    राज्य सरकार का दावा है कि यह योजना बेहतर प्रबंधन और संसाधनों के उपयोग के लिए लाई गई है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि इससे राज्य के लगभग 5000 प्राथमिक विद्यालयों के बंद होने का ख़तरा उत्पन्न हो गया है। इन स्कूलों को अन्य स्कूलों में मर्ज किया जा रहा है, खासकर वहां जहां छात्रों की संख्या 50 से कम है।
    बेसिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव दीपक कुमार द्वारा जारी 16 जून के आदेश के अनुसार, छात्रों की कम संख्या वाले विद्यालयों को मर्ज करने से संसाधनों का कुशल उपयोग और शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार होगा, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहती है।

     

    गांवों में रहने वाले गरीब व दिव्यांग अभिभावकों के लिए बच्चों को दो-तीन किलोमीटर दूर स्कूल भेजना एक असंभव कार्य बनता जा रहा है। लखनऊ के माल ब्लॉक में सरैया प्राथमिक विद्यालय के मर्जर के बाद, पहले सप्ताह में केवल 3 छात्र ही नए स्कूल में पहुंचे, जबकि पुराने स्कूल में 20 से अधिक छात्र थे। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि मर्जर से छात्रों की उपस्थिति में तेज गिरावट आ रही है। शिक्षा का अधिकार कानून के मुताबिक 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए 1 किलोमीटर के भीतर स्कूल होना अनिवार्य है, लेकिन पेयरिंग स्कीम इस दिशा-निर्देश को अनदेखा करती दिख रही है। प्राथमिक शिक्षक संघ के अनुसार, सरकार ने शिक्षकों के स्थानांतरण, वेतन भुगतान और बच्चों की उपस्थिति को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं बनाई है। बहुत से अध्यापक कहते हैं कि जब उनका स्कूल 2015 में दूसरी जगह शिफ्ट हुआ, तो उनके नए स्कूलों में बहुत कम बच्चे पहुंचे। शिक्षक कहते है कि
    यह योजना अव्यवस्थित है। शिक्षकों को नुकसान हो रहा है, बच्चों की उपस्थिति गिर रही है, और स्कूल प्रशासन असमंजस में है।

     

    समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने पेयरिंग स्कीम को गरीब और ग्रामीण बच्चों के भविष्य पर हमला करार दिया है। दूसरी ओर, बीजेपी सरकार इस योजना को शिक्षा सुधार के रूप में पेश कर रही है। पार्टी का दावा है कि सरकार हर बच्चे तक शिक्षा पहुंचने के लिए प्रतिबद्ध है। कोई भी स्कूल अभिभावकों की सहमति के बिना मर्ज नहीं किया जाएगा, हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पेयरिंग स्कीम को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका विरोध बना हुआ है। कोर्ट का कहना है कि सरकार का कदम बच्चों के हित में है और यह संसाधनों के समुचित प्रयोग की दिशा में है। फिर भी, वास्तविकता यह है कि स्कूलों की दूरी बढ़ने से छात्र स्कूल छोड़ रहे हैं, सुरक्षा की चिंता बढ़ रही है और सामाजिक असंतोष पनप रहा है।

     

    Sona

    कुल मिलाकर, सरकार के तर्कों के मुताबिक यह योजना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और संसाधन के इष्टतम उपयोग के लिए लाई गई है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर यह योजना शिक्षा की पहुंच को और अधिक कठिन बना रही है। ग्रामीण परिवेश में स्कूल सिर्फ पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और जागरूकता का माध्यम भी हैं।

     

    इनका मर्जर बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ उनकी सुरक्षा, उपस्थिति और मनोवैज्ञानिक स्थिति को भी प्रभावित कर रहा है। सरकार को चाहिए कि वह सुधार की दिशा में कोई कदम उठाने से पहले जमीनी हकीकत, स्थानीय जरूरतों और सामुदायिक विचारों को प्राथमिकता दे। अन्यथा यह सुधार नहीं, संकुचन की प्रक्रिया बनकर रह जाएगी।

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