“रथ से उतरे नेता, बिहार में बिखरता विपक्ष?”
धीरज कुमार सिंह
बिहार की सियासत में विपक्षी एकजुटता का दावा एक बार फिर उस रथ से नीचे उतर गया, जिस पर उम्मीदों की सवारी होनी थी। राहुल गांधी की ‘संविधान बचाओ न्याय यात्रा’ के बहुचर्चित रथ से कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को उतारने का फैसला न केवल भावनात्मक रूप से विभाजनकारी रहा, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक नतीजे भी दिखने लगे हैं।
तेजस्वी की असहजता और रणनीतिक भूल

इस घटनाक्रम की तह में जाएं तो यह साफ दिखता है कि तेजस्वी यादव, कन्हैया कुमार को लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते आए हैं। कन्हैया की लोकप्रियता खासकर युवा और शहरी मतदाताओं में तेजी से बढ़ी है, जो पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण के बाहर भी जनाधार बनाता है। ऐसे में उन्हें रथ पर जगह न देना एक स्पष्ट संकेत था एक प्रकार की असुरक्षा और बढ़ती प्रतिस्पर्धा की स्वीकारोक्ति।
तेजस्वी द्वारा संजय यादव को रथ प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपना और फिर इस फैसले पर पर्दा डालना, यह दिखाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर जो तालमेल दिखाने की कोशिश हो रही है, वह जमीनी स्तर पर दरक रहा है।

राहुल गांधी की नाराजगी और कांग्रेस की दुविधा
राहुल गांधी ने भले ही प्रत्यक्ष रूप से इस विवाद में कोई बयान नहीं दिया हो, लेकिन कांग्रेस की आंतरिक नाराजगी की खबरें सामने आ रही हैं। कन्हैया कुमार आज भले कांग्रेस में अपेक्षाकृत नए हों, लेकिन वे पार्टी के लिए बिहार में नई ऊर्जा और चेहरा बनने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में उन्हें रथ से उतारना कांग्रेस के आत्मसम्मान पर चोट माना जा रहा है।
पप्पू यादव को नजरअंदाज करना — एक और चूक

पप्पू यादव जैसे जमीनी नेता, जो कोरोना काल में बेहतरीन सक्रियता और जनता के साथ सीधा संवाद कर चुके हैं, उन्हें इस तरह रथ से उतारना, सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, उनके समर्थकों के पूरे वोट बैंक को हतोत्साहित करना है। यह मान लिया जाए कि पप्पू यादव की शैली अलग हो सकती है, लेकिन बिहार जैसे विविधतापूर्ण राज्य में ऐसे जनाधार वाले नेताओं की अनदेखी कर पाना आसान नहीं।
प्रशांत किशोर की टिप्पणी और विपक्ष की “स्वराज” विफलता
प्रशांत किशोर ने इस पूरे घटनाक्रम को जिस तरह “स्वराज” शब्द से जोड़ा, वह विपक्ष के लिए एक चेतावनी है। अगर एक वैकल्पिक सत्ता के निर्माण की बात हो रही है तो उसमें सह-अस्तित्व को प्राथमिकता देनी होगी, न कि असहमति के आधार पर排除 की नीति अपनानी चाहिए।

राजद की क्षति और विपक्षी एकता पर असर
इस एक फैसले से राजद ने न केवल कांग्रेस को नाराज किया, बल्कि वाम दलों और स्वतंत्र नेताओं के साथ संभावित गठबंधन को भी कमजोर किया है। कन्हैया कुमार जैसे चेहरे का अपमान केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का अपमान है जो वैकल्पिक राजनीति की बात करती है।
बिहार चुनाव 2025 को लेकर विपक्षी दलों के बीच तालमेल अब और कठिन होता दिख रहा है। अगर तेजस्वी यादव नेतृत्व की परिपक्वता नहीं दिखाते, और सहयोगी दलों के नेताओं को सम्मानजनक स्थान नहीं देते, तो 2024 की पुनरावृत्ति का खतरा सामने है — जब जनता ने “एकजुट विपक्ष” की जगह “बिखरा विकल्प” देखा था।

राजद को यह समझना होगा कि गठबंधन में ‘नेतृत्व’ के साथ-साथ ‘साझेदारी’ भी उतनी ही जरूरी होती है। बिहार की जनता सिर्फ चेहरे नहीं, एकजुट इरादे को वोट देती है।

