देवानंद सिंह
ईरान और इसराइल के बीच संघर्ष वैश्विक भू-राजनीति को एक नई दिशा में मोड़ रहा है। जहां एक ओर यह टकराव मध्य पूर्व में व्यापक अस्थिरता की आशंका को बढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर यह भारत जैसे देशों के लिए एक गंभीर रणनीतिक परीक्षा बन गया है।

इसराइल की ऑपरेशन राइज़िंग लायन जैसी कार्रवाई दर्शाती है कि वह अब कूटनीतिक प्रयासों से ज्यादा सैन्य विकल्पों को प्राथमिकता दे रहा है। उसका लक्ष्य स्पष्ट है कि ईरान को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र बनने से रोकना, लेकिन इसकी कीमत वैश्विक स्थिरता है, विशेषकर तब जब अमेरिका भी प्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल हो गया है।
ईरान का जवाबी हमला यह दर्शाता है कि वह पीछे हटने को तैयार नहीं है। उसके पास क्षेत्रीय ताकतों जैसे हिज़्बुल्लाह, हौथी और शिया मिलिशिया के ज़रिए अप्रत्यक्ष युद्ध छेड़ने की पूरी क्षमता है। इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंका जा सकता है, जिसकी चपेट में तेल के वैश्विक दाम, व्यापारिक मार्ग और शांति प्रयास सब आ सकते हैं।

भारत के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है। एक ओर, वह इसराइल से रक्षा, साइबर सुरक्षा और खुफिया जानकारी साझा करने में आगे बढ़ चुका है। दूसरी ओर, ईरान से भारत का जुड़ाव केवल चाबहार बंदरगाह तक सीमित नहीं, बल्कि मध्य एशिया तक भारत की पहुंच का सेतु भी है। ईरान से तेल आयात पर भारत लंबे समय तक निर्भर रहा है। चाबहार बंदरगाह के ज़रिए भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया से व्यापारिक संबंध मज़बूत करता है।

खाड़ी देशों में 90 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं, जिनकी सुरक्षा और रोज़गार भारत की प्राथमिकता है।
अमेरिका इसराइल के साथ मज़बूती से खड़ा है। यह न केवल रणनीतिक कारणों से, बल्कि ट्रंप के राजनीतिक लाभ के लिए भी अहम है। रूस और चीन हालांकि युद्ध विराम की बात कर रहे हैं, लेकिन उनका असल उद्देश्य इस क्षेत्र में अमेरिकी दबदबे को चुनौती देना है।

भारत के लिए यह और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वह अमेरिका, रूस और इसराइल तीनों से सामरिक संबंध बनाए रखना चाहता है और अब ईरान के साथ भी व्यापारिक और ऊर्जा साझेदारी को कायम रखना उसकी मजबूरी है। इन खाड़ी देशों का रुख काफी निर्णायक हो सकता है। हाल के वर्षों में सऊदी अरब और इसराइल के रिश्तों में सुधार हुआ है, लेकिन वे भी खुलकर युद्ध में उतरना नहीं चाहते। यदि, यह संघर्ष बढ़ता है, तो इन देशों पर घरेलू अस्थिरता और तेल आपूर्ति संकट का खतरा गहरा सकता है, जो भारत के लिए गंभीर आर्थिक चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने अब तक रणनीतिक संतुलन का रास्ता चुना है, न खुलकर किसी पक्ष के साथ खड़ा हुआ, न ही अपने हितों से समझौता किया, लेकिन अगर संघर्ष लंबा चला और अमेरिका अपने सहयोगियों से स्पष्ट समर्थन मांगे, तो भारत को एक कठिन निर्णय लेना पड़ सकता है।

यह स्पष्ट है कि भारत केवल मूल्य आधारित नहीं, हित आधारित विदेश नीति पर चलता है। यदि, कभी ऐसा समय आए कि भारत को इसराइल और ईरान में किसी एक को चुनना पड़े, तो वह अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर ही निर्णय करेगा और उस समय संभवतः अमेरिका और इसराइल के साथ जाना उसके लिए व्यावहारिक होगा। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें 30% तक बढ़ सकती हैं, इससे भारत का आयात खर्च बढ़ेगा और मुद्रा पर नकारात्मक असर पड़ेगा। खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा पर खतरा बढ़ेगा और बड़ी संख्या में पलायन की स्थिति बन सकती है।

कुल मिलाकर, इसराइल और ईरान का टकराव केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रहा। यह एक वैश्विक भू-राजनीतिक युद्ध का रूप लेता जा रहा है, जिसमें अमेरिका, रूस, चीन, खाड़ी देश और भारत जैसे क्षेत्रीय और वैश्विक ताकतें किसी न किसी रूप में शामिल हैं। भारत के लिए यह संघर्ष संतुलन की कठिन परीक्षा है, एक ऐसी परीक्षा, जिसमें उसे अपने आर्थिक, सामरिक और राजनयिक हितों को एक साथ साधना है। भारत अब तक जिस संतुलित नीति पर चला है, वह युद्ध की आग में कितनी देर तक टिक पाएगी, यह आने वाला समय बताएगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत इस संघर्ष से अलग नहीं रह सकता, चाहे वह चाहे या न चाहे।

