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    Home » इसराइल-ईरान संघर्ष और भारत की रणनीतिक दोधारी चुनौती
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    इसराइल-ईरान संघर्ष और भारत की रणनीतिक दोधारी चुनौती

    News DeskBy News DeskJune 15, 2025Updated:June 15, 2025No Comments7 Mins Read
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    बिशन पपोला
    पश्चिम एशिया एक बार फिर उबलने लगा है। इसराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और सीधे सैन्य टकराव की आशंकाएं न केवल क्षेत्रीय अस्थिरता को जन्म दे रही हैं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन को भी झकझोर रही हैं। इस बदले हुए परिदृश्य में भारत जैसी उभरती हुई महाशक्ति के लिए यह संकट केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक हितों और विदेश नीति की संतुलनकारी रणनीति का भी गंभीर परीक्षण है।

     

    भारत का पश्चिम एशिया से संबंध केवल धार्मिक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक, व्यापारिक और मानवीय आधारों पर भी अत्यंत गहरा है। ईरान और इसराइल दोनों से भारत के ऐतिहासिक संबंध रहे हैं, लेकिन इनका स्वरूप और महत्व समय-समय पर बदलता रहा है। इसराइल, भारत का सुरक्षा और तकनीकी सहयोगी बनकर उभरा है, वहीं ईरान भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक अहम स्रोत रहा है, विशेषकर 1990 के दशक से पहले। वर्तमान में भले ही भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते ईरान से तेल आयात कम कर दिया हो, लेकिन यह मानना गलत होगा कि ईरान भारत की विदेश नीति से पूरी तरह ओझल हो गया है। चाबाहार बंदरगाह और अफगानिस्तान-ईरान-भारत त्रिकोणीय सहयोग जैसे प्रोजेक्ट अभी भी दोनों देशों के संबंधों को प्रासंगिक बनाते हैं।

     

    ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के रणनीतिक मामलों के विश्लेषक बताते हैं कि भारत का रुख इस पूरे टकराव में ‘संतुलनवादी’ होगा। उनका आकलन इस बात को पुष्ट करता है कि भारत खुले तौर पर किसी एक पक्ष के समर्थन में नहीं जाएगा, विशेषकर तब जब दोनों ही देश भारत के अहम साझेदार रहे हैं। भारत का विदेश मंत्रालय पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि वह दोनों पक्षों से शांतिपूर्ण समाधान की अपेक्षा करता है और कूटनीतिक संवाद को प्राथमिकता देता है, हालांकि इंडो-पैसिफिक विश्लेषक डेरेक ग्रॉसमैन का मत थोड़ा अलग है। उनके अनुसार भारत इसराइल के प्रति झुकाव तो रखेगा, लेकिन यह समर्थन बिना शर्त नहीं होगा। विशेषकर, अगर इसराइल ईरान पर आक्रामक हमला करता है, तो भारत उस कार्रवाई को समर्थन नहीं देगा। भारत का उद्देश्य रहेगा कि किसी भी सूरत में वह पश्चिम एशिया की राजनीति में फंसने से बचे, लेकिन इसके साथ-साथ अपनी ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक सहयोग को भी बचाए रखे।

     

    उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। हर साल वह अपने कुल तेल और गैस आयात का 50-60 प्रतिशत पश्चिम एशिया और खाड़ी के देशों, जैसे इराक़, सऊदी अरब, यूएई, क़तर, और कुवैत से प्राप्त करता है। इनमें से अधिकांश देश ईरान के पड़ोसी हैं, और कई देशों में अमेरिका के सैन्य ठिकाने भी स्थित हैं। यदि, इसराइल और ईरान के बीच युद्ध व्यापक रूप लेता है, तो इन आपूर्ति शृंखलाओं के बाधित होने की आशंका है।

    वर्तमान परिदृश्य में कच्चे तेल की कीमतों में पहले ही 13 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा चुकी है। कच्चा तेल 78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है, जो मार्च 2022 के बाद एक दिन में सबसे अधिक वृद्धि है। अगर, यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर भारत की महंगाई दर, व्यापार घाटा और विदेशी मुद्रा भंडार पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ेगा। भारत के लगभग 90 लाख नागरिक खाड़ी के देशों, विशेषकर यूएई, सऊदी अरब, क़तर और ओमान में कार्यरत हैं। भारत को हर साल जो रेमिटेंस प्राप्त होता है, उसमें इन प्रवासी भारतीयों का योगदान लगभग 40 प्रतिशत है। अगर, युद्ध की लपटें इन देशों तक पहुंचती हैं, तो न केवल वहां भारतीयों की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाला यह रेमिटेंस भी बुरी तरह प्रभावित होगा।

     

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह संघर्ष अभी थमने वाला नहीं है। उनके अनुसार ईरान बदला ज़रूर लेगा, भले ही थोड़ी देर से। वे यह भी मानते हैं कि अमेरिका अप्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में संलिप्त है, क्योंकि इसराइली विमानों को क़तर स्थित अमेरिकी वायुसेना बेस से ईंधन मिल रहा है। यही नहीं, अमेरिका ने ईरान द्वारा भेजे गए ड्रोन को मार गिराया, और सऊदी अरब, जॉर्डन तथा यूएई ने अपने एयर स्पेस इसराइल को इस्तेमाल करने दिए।
    इस पूरे संघर्ष में अमेरिका की भूमिका स्पष्ट है। वह इसराइल का समर्थन कर रहा है, लेकिन खुलकर युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता। भारत, जो पिछले तीन दशकों में अमेरिका के निकट आया है, उसकी नीतियों से पूर्णतः भिन्न रुख अपनाने में हिचकिचाहट महसूस करता है।

     

    विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत के लिए इसराइल का समर्थन करना एक स्वाभाविक राजनीतिक विकल्प है, विशेषकर तब जब इसराइल ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारत का खुलकर समर्थन किया था। इसके विपरीत ईरान से भारत के संबंध लगातार कमजोर हुए हैं। न तो तेल और गैस की आपूर्ति हो रही है, और न ही चाबाहार परियोजना की गति उत्साहजनक है। विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत को अभी संतुलन बनाए रखना चाहिए। उनके अनुसार, इसराइल ही संकट की घड़ी में भारत की मदद करता रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत युद्ध का समर्थन करे। उनके अनुसार, भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए, इसराइल को आक्रामकता से रोकना और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना।

    ईरान का भौगोलिक स्थान उसे एक रणनीतिक भूमिका में रखता है। स्ट्रेट ऑफ होरमुज़, जहां से भारत का अधिकांश तेल गुजरता है, ईरान की निगरानी में आता है। अगर, यह इलाका युद्ध के दायरे में आता है, तो न केवल तेल आपूर्ति बाधित होगी, बल्कि भारत के यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और भूमध्यसागर के देशों से समुद्री व्यापार पर भी गंभीर असर पड़ेगा। 2023-24 में भारत का कुल विदेशी व्यापार 1.11 ट्रिलियन डॉलर रहा, जिसमें से 208.48 अरब डॉलर का व्यापार पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र से हुआ, जो कुल व्यापार का 18.17 प्रतिशत है। यह आंकड़ा भारत की आर्थिक संरचना में इस क्षेत्र की केंद्रीयता को रेखांकित करता है।

     

    1990-91 के दौरान जब खाड़ी युद्ध छिड़ा था, भारत पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा था। उस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई और भारत का आयात बिल लगभग तीन गुना बढ़ गया। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ा और राजनीतिक अस्थिरता ने भारत को आर्थिक सुधारों की ओर धकेला। उस अनुभव को देखते हुए भारत यह भूल नहीं सकता कि पश्चिम एशिया की अशांति का सीधा असर उसकी घरेलू स्थिरता पर भी पड़ता है।

    भारत को एक तटस्थ, लेकिन सक्रिय मध्यस्थ की भूमिका अपनानी चाहिए। न केवल इसराइल और ईरान से संवाद बनाए रखना ज़रूरी है, बल्कि खाड़ी के अन्य देशों और अमेरिका से भी संतुलित रिश्ते कायम रखना अहम होगा। भारत का रणनीतिक हित न किसी पक्ष की अंधभक्ति में है, न ही अनिर्णय की स्थिति में। उसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा, नागरिकों की सुरक्षा और व्यापारिक हितों को ध्यान में रखते हुए विवेकपूर्ण निर्णय लेने होंगे। पश्चिम एशिया की राजनीति कभी सरल नहीं रही। धार्मिक, सांस्कृतिक, सामरिक और आर्थिक टकरावों से उपजे तनाव भारत जैसे देश के लिए जोखिम भरे अवसर की तरह हैं। भारत यदि इस चुनौतीपूर्ण समय में कुशल कूटनीति का प्रदर्शन करता है, तो न केवल वह अपने हितों की रक्षा कर पाएगा, बल्कि एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में उसकी पहचान और भी मजबूत होगी।

     

     

    कुल मिलाकर, इसराइल-ईरान टकराव भारत के लिए केवल एक भू-राजनीतिक संकट नहीं है, यह उसकी ऊर्जा नीति, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक छवि की परीक्षा भी है। इतिहास के अनुभव और वर्तमान की चुनौतियों को देखते हुए भारत को संतुलनकारी, विवेकशील और बहुपक्षीय दृष्टिकोण अपनाना होगा। यह युद्ध भले ही भारत की सीमाओं से दूर हो, लेकिन इसके साए से भारत अछूता नहीं रहेगा। अतः यह समय है निर्णय का, ऐसा निर्णय, जो न केवल भारत की सुरक्षा को सुनिश्चित करे, बल्कि पश्चिम एशिया में शांति के लिए भी एक निर्णायक हस्तक्षेप सिद्ध हो सके।

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