देवानंद सिंह
भारतीय लोकतंत्र का ढांचा तीन प्रमुख स्तंभों – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर टिका रहता है। संविधान निर्माताओं ने इन तीनों को स्वतंत्र, लेकिन परस्पर संतुलित रखा ताकि कोई भी सत्ता केंद्रित न हो सके और ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ की आत्मा बनी रहे। परंतु बीते दिनों हुए घटनाक्रमों और राजनीतिक नेतृत्व के कड़े बयानों ने इस संतुलन को गहरे सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।
दरअसल, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील विष्णु शंकर जैन की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अधिकारों की सीमा पर गहन बहस देखने को मिली। याचिकाकर्ता की मांग थी कि केंद्र सरकार को पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने का निर्देश दिया जाए, साथ ही राज्य में पैरा मिलेट्री फोर्स की तैनाती सुनिश्चित की जाए। इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस बीआर गवई कर रहे थे, ने तीखे व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “आप चाहते हैं कि हम राष्ट्रपति को आदेश दें? वैसे भी हम पर कार्यपालिका में हस्तक्षेप के आरोप लग रहे हैं।” गवई देश के अगले मुख्य न्यायाधीश बनने वाले हैं, इसीलिए उनकी टिप्पणी बहुत मायने रखती हैं।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और कुछ भाजपा नेताओं ने न्यायपालिका पर विधायिका और कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण करने के आरोप लगाए हैं। उपराष्ट्रपति ने विशेष रूप से उस फैसले पर नाराज़गी जताई, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों को निर्देश दिया था कि वे संसद या विधानसभा से दोबारा पारित विधेयकों को तीन महीने के भीतर मंजूरी दें। उनके अनुसार, यह निर्णय न केवल संविधान की मूल आत्मा के विपरीत है, बल्कि यह राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद की गरिमा को भी कम करता है। यह पूरी बहस सिर्फ एक कानूनी प्रावधान या एक अदालती टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के ताने-बाने, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों के गहरे विमर्श का हिस्सा बन चुकी है।
दरअसल, संवैधानिक व्यवस्था और न्यायपालिका की भूमिका संविधान की प्रस्तावना में ‘न्याय’, ‘स्वतंत्रता’, ‘समता’ और ‘बंधुता’ जैसे मूल्य शामिल किए गए हैं, जो न केवल नागरिकों के अधिकारों की गारंटी देते हैं, बल्कि संस्थाओं के दायरे भी स्पष्ट करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन लागू करने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है, जिसे राष्ट्रपति की अनुशंसा पर लागू किया जाता है, लेकिन इस प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा की भी व्यवस्था है ताकि किसी राज्य में केंद्र सरकार मनमाने ढंग से हस्तक्षेप न कर सके।
जब सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग करता है, तो न्यायपालिका के सामने यह संवैधानिक सवाल खड़ा होता है कि क्या वह कार्यपालिका को ऐसे निर्णय के लिए बाध्य कर सकती है? सुप्रीम कोर्ट की बेंच का यह कहना कि हम पर पहले से ही कार्यपालिका में हस्तक्षेप के आरोप लग रहे हैं, एक आत्मनिरीक्षण भी है और राजनीतिक बयानबाजी पर प्रतिक्रिया भी। क्या न्यायपालिका अतिक्रमण कर रही है? यह प्रश्न बार-बार उठाया जाता है कि न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्र में दखल क्यों देती है। परंतु यह भी सच है कि जब कार्यपालिका अपने दायित्वों का निर्वहन करने में विफल होती है, तब नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अदालतें आगे आती हैं। उदाहरण के लिए, पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार, जेल सुधार, महिला सुरक्षा, पुलिस सुधार जैसी कई जनहित याचिकाओं पर न्यायपालिका ने वर्षों तक ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं, जिनका प्रभाव आम नागरिकों के जीवन पर पड़ा है।
उदाहरणस्वरूप, विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों में पारदर्शिता, राजनीतिक अपराधियों की अयोग्यता, राजनीतिक दलों को फंडिंग की पारदर्शिता जैसे मामलों में न्यायपालिका के हस्तक्षेप से लोकतंत्र मजबूत हुआ है। ऐसे में ‘अतिक्रमण’ का आरोप एकपक्षीय नजर आता है।
कार्यपालिका की विफलता और न्यायिक सक्रियता
जब प्रशासनिक तंत्र नागरिकों को मूलभूत सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता उपलब्ध नहीं करवा पाता, तब न्यायपालिका को आगे आना पड़ता है। भारत में न्यायिक सक्रियता का यह स्वरूप 1980 के दशक में सामने आया, जब पीआईएल (Public Interest Litigation) की शुरुआत हुई। उस समय यह एक माध्यम था, जिसके जरिए गरीब, वंचित, शोषित वर्गों की आवाज अदालत तक पहुंची।
लेकिन, आज जब अदालतें विधायिका या कार्यपालिका से जवाब मांगती हैं, तो उस पर ‘ओवररीच’ (Overreach) का आरोप लगाया जाता है। सवाल यह है कि क्या अदालतें मूकदर्शक बनी रहें, जब संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन हो रहा हो? राजनीतिक बयानबाजी बनाम संवैधानिक मर्यादा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा न्यायपालिका के खिलाफ की गई टिप्पणी एक उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की ओर से आई है, जिसे केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। परंतु इसी के साथ यह प्रश्न भी उठता है कि क्या यह टिप्पणी न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक दबाव बनाने की कोशिश है? संवैधानिक मर्यादा यह कहती है कि सभी संस्थाओं को अपने अधिकार क्षेत्र में रहकर कार्य करना चाहिए, और यदि कोई टकराव हो भी, तो उसे संवाद और सहमति से सुलझाया जाए। सार्वजनिक मंचों पर इस प्रकार की टिप्पणियां संस्थागत संघर्ष को बढ़ावा देती हैं।
इन परिस्थितियों में संविधान की शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, आम जनता और राजनीतिक नेतृत्व को संविधान की गहरी समझ होनी चाहिए, जिससे वे समझ सकें कि विभिन्न संस्थाओं की क्या सीमाएं और भूमिकाएं हैं। दूसरा, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच समय-समय पर औपचारिक संवाद की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे आपसी गलतफहमियों को सुलझाया जा सके। लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा का सम्मान होना चाहिए, सभी संस्थाओं को एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। न्यायपालिका की आलोचना यदि आवश्यक हो, तो तथ्यों और संविधान की सीमाओं में रहकर हो। न्यायिक जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी है। न्यायपालिका को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका हस्तक्षेप संविधान की भावना के अनुरूप हो। न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
कुल मिलाकर, सत्ता का संतुलन ही लोकतंत्र की आत्मा है। भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव और सरकारों की अदला-बदली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों की निरंतरता, संस्थागत संतुलन और नागरिक अधिकारों की गारंटी से जुड़ा हुआ है। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका – तीनों स्तंभों का एक-दूसरे के प्रति सम्मान और संवैधानिक मर्यादा में रहना लोकतंत्र की मजबूती का आधार है। मुर्शिदाबाद की घटना एक राज्य विशेष की कानून-व्यवस्था का मामला हो सकता है, लेकिन इसके बहाने, जो संवैधानिक विमर्श शुरू हुआ है, वह पूरे लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। अगर, यह विमर्श बुद्धिमत्ता, मर्यादा और समझदारी के साथ आगे बढ़ता है, तो भारतीय लोकतंत्र न केवल मजबूत होगा, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्थायी मॉडल भी बनेगा।

