चार वर्णों का इतिहास ही चार युगों का इतिहास है जो संकोचविकासी गतिधारा में आगे बढता जाता है
सामाजिक अग्रगति त्रयी का समन्वय है – संश्लेषण, श्लेषण और प्रतिश्लेषण।
जमशेदपुर 4 अगस्त 2023:
आनन्दमार्ग प्रचारक संघ द्वारा आनंद मार्ग जागृति , गदरा में आयोजित किया गया तीन दिवसीय सेमिनार 4,5 एवं 6 अगस्त 2023 के अवसर पर सेमिनार के प्रथम दिन आनन्दमार्ग के वरिष्ठ आचार्य स्वरूपानंद अवधूत ने “समाज का गति तत्व’’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समाज गति के कुछ नियम है जिन्हें जानना आवश्यक है। वे नियम क्या है। चलयमानता या गति दो प्रकार की है- पहला सापेक्ष चलायमानता और दूसरा निरपेक्ष चलायमानता। सापेक्ष चलायानता की विभिन्न स्थितियॉ होती हैं। उसमें गति, स्थिति एवं विरति शामिल हैं। उसमे वर्द्धमान(उदयमान) या ह्स्वमान, गतियॉं होती है। समाज की गति मुख्यत: संकोच-विकासी है अर्थात वह स्पन्दनात्मक होती है।
इस संकोच विकासी गति की चार मुख्य अवस्थायें होती हैं- विकासात्मक गति, विकासात्मक अगति, संकोचात्मक गति एवं संकोचात्मक अगति। व्यष्टि मन की गतियॉं हैं अधोगति, स्वाभाविक गति एवं व्यष्टि की प्रगति। सभी व्यष्टियों की अनेक गतिधाराओं के परिणामभूत गतिधारा को समाजिक गतिधारा कह सकते हैं। समाज गति के कुछ मुख्य नियम इस प्रकार हैं- (1) गति का नियम (2) सामुहिक मनस्तत्व का भौतिक एवं मानसिक संघर्ष का नियम (3) प्रगति का नियम (4)समाजिक क्रान्ति, विक्रान्ति, विप्लव, प्रति विप्लव परिक्रान्ति का नियम (5) समाज चक्रधारा में वर्णों की प्रधानता का नियम- क्षत्र, विप्र, वैश्य एवं शुद्र विप्लव। (6) समाज चक्र के केन्द्र में सद्विप्र का नियंत्रण (7) आकर्षण एवं विकर्षण का नियम (10) श्लेषण, प्रतिश्लेषण एवं संश्लेषण का नियम (11) जीओ और जीने दो का नियम (12) परम संश्लेषणात्मक विषयीगत प्रतिवादन (13) प्रमा त्रिकोण- लोक त्रिकोण एवं गुण त्रिकोण इत्यादि।
आचार्य जी ने उपरोक्त सभी बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा किया और बतलाया कि
सामाजिक अग्रगति त्रयी का समन्वय है – संश्लेषण, श्लेषण और प्रतिश्लेषण। आजतक मानव सभ्यतायें चाहे वह भारतीय हिन्दु सभ्यता हो या रूसी सभ्यता हो अथवा पश्चिमी सभ्यता का इतिहास रहा हो, सभी के सभी श्री श्री आनंदमूर्ति जी के समाज चक्र के सिद्धान्त का अनुगमन करते हुए आगे बढती गयी हैं अर्थात क्षात्रयुग के बाद विप्रयुग फिर वैश्य युग एवं अन्त में शुद्र विप्लव घटित होता है ओर समाज चक्र क्षात्रयुग के द्वितीय पर्याय में प्रवेश कर जाता है। इसी प्रकार चार वर्णों का इतिहास ही चार युगों का इतिहास है जो संकोचविकासी गतिधारा में आगे बढता जाता है।

