*पैतृक गांव पासेया में 107वीं जयंती समारोह, कक्षा 10 की पुस्तक व कविता संग्रह का हुआ विमोचन*
मृत्युंजय बर्मन
राष्ट्र संवाद संवाददाता, सरायकेला
हो भाषा और वारंगक्षिति लिपि के जनक ओत गुरु कोल लाको बोदरा की 107वीं जयंती उनके पैतृक गांव पासेया में उत्साह और सांस्कृतिक रंग के बीच मनाई गई। रूमतुलै, पासेया की ओर से आयोजित ‘जुमलै दिलं’ समारोह में भाषा, शिक्षा और हो समाज की सांस्कृतिक पहचान को लेकर गंभीर चर्चा हुई। समारोह के मुख्य अतिथि सरायकेला-खरसावां जिला परिषद अध्यक्ष सोनाराम बोदरा ने कहा कि जिस गांव ने वारंग लिपि के जनक को जन्म दिया, उसी गांव की स्थिति आज बदहाल है। उन्होंने लाको बोदरा के परिवारजनों को उचित सम्मान नहीं मिलने पर भी चिंता जताई।
सोनाराम बोदरा ने कहा कि राज्य में 26 वर्षों से ‘आबुआ सरकार’ की बात की जा रही है, लेकिन प्राथमिक शिक्षा में वारंग लिपि के जरिए पढ़ाई की व्यवस्था अब तक नहीं हो सकी है। वारंग लिपि के लिए पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं और हो भाषा को भी वह सम्मान नहीं मिला जिसकी अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि भाषा और लिपि को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस पहल जरूरी है।
*किताबों के जरिए भाषा संरक्षण का संदेश*
समारोह का विशेष आकर्षण वारंगक्षिति लिपि में लिखित कक्षा 10 की पुस्तक ‘सुड़ा सांगेन’ और डॉ. सरस्वती गागराई की कविता पुस्तक ‘षुर्रषुति’ का विमोचन रहा। दोनों पुस्तकों का विमोचन मुख्य अतिथि सोनाराम बोदरा ने किया। आयोजकों ने कहा कि वारंग लिपि में अध्ययन सामग्री और साहित्य का सृजन लिपि को अगली पीढ़ी से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम में हो समाज की पारंपरिक कला और संस्कृति को भी मंच मिला। एकल गीत, क्विज, सामूहिक नृत्य, बांसुरी और बनाम प्रतियोगिताओं में प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। विजेताओं एवं प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि ने प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।
इस अवसर पर रूमतुलै अध्यक्ष बिङ बिक्रम सिंह बोदरा, संयुक्त सचिव डॉ. जय किशोर मंगल हासदा, पोदना हेस:, डॉ. सरस्वती गागराई, साधना चाकी तथा पासेया ससान मुतुल के अधिकारी सुधीर सिंह लेयांगी, मंगल बानरा, ग्रामीण मुंडा समेत बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि के साथ खूंटपानी मंडल अध्यक्ष राकेश बानसिंह, पूर्व मंडल अध्यक्ष सुदामा हाइबुरु और कोकिल केशरी भी समारोह में मौजूद रहे। जयंती समारोह ने लाको बोदरा के योगदान को स्मरण करने के साथ वारंग लिपि को प्राथमिक शिक्षा में स्थान देने और हो भाषा-संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रभावी सरकारी पहल की जरूरत को भी रेखांकित किया।

