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    Home » राष्ट्रपति का संदेश, मीडिया का दायित्व: क्या ज़मीनी हकीकत दावों से मेल खाती है?
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    राष्ट्रपति का संदेश, मीडिया का दायित्व: क्या ज़मीनी हकीकत दावों से मेल खाती है?

    Devanand SinghBy Devanand SinghJanuary 29, 2026Updated:January 29, 2026No Comments4 Mins Read
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    मीडिया का दायित्व-देवानंद सिंह

    मीडिया का दायित्व:-

    संसद के बजट सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का अभिभाषण केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह सरकार के आत्मविश्वास, उपलब्धियों के दावे और आने वाले वर्षों की दिशा का स्पष्ट संकेत भी था। रविंद्रनाथ टैगोर के विचार “आज़ादी तब तक अधूरी है, जब तक आत्मनिर्भर जीवन न जिया जाए”—को केंद्र में रखकर दिया गया यह संबोधन सरकार की वैचारिक रीढ़ और राजनीतिक प्राथमिकताओं को रेखांकित करता है।
    पिछले 10–11 वर्षों को उपलब्धियों के दौर के रूप में प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रपति ने भारत को “तेज़ी से आगे बढ़ता देश” बताया। महंगाई पर नियंत्रण, आर्थिक मजबूती, आधारभूत संरचना का विस्तार और सामाजिक योजनाओं के आँकड़े इस बात की पुष्टि के लिए रखे गए कि भारत अब केवल संभावनाओं का नहीं, बल्कि परिणामों का देश है। यह वही कथानक है, जिसे सरकार लंबे समय से “नए भारत” के रूप में सामने रखती आई है।
    आर्थिक मोर्चे पर अभिभाषण का स्वर आश्वस्त करने वाला था। महंगाई दर को कम रखने का रिकॉर्ड, मध्यम वर्ग और गरीबों को लाभ, रेलवे और राजमार्गों में भारी निवेश ये सभी बिंदु इस बात की ओर इशारा करते हैं कि सरकार विकास को इंफ्रास्ट्रक्चर-आधारित मॉडल के रूप में देख रही है। नॉर्थ ईस्ट में सड़कों और रेलवे पर ज़ोर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और राजनीतिक संदेश भी है कि पूर्वोत्तर अब “सीमांत” नहीं, बल्कि “केंद्र” में है।
    सुरक्षा और आतंकवाद के सवाल पर राष्ट्रपति का बयान सख्त और निर्णायक था। ऑपरेशन सिंदूर, सिंधु जल समझौते का उल्लेख और माओवाद प्रभावित जिलों की संख्या में भारी कमी ये सभी सरकार की “ज़ीरो टॉलरेंस” नीति को रेखांकित करते हैं। यह संदेश केवल संसद के भीतर नहीं, बल्कि देश और पड़ोसियों तक जाता है कि भारत अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक रुख अपनाने वाला राष्ट्र है। हालांकि, संपादकीय दृष्टि से यह सवाल भी उठता है कि सुरक्षा की सफलता को लोकतांत्रिक जवाबदेही, मानवाधिकार और संघीय संतुलन के साथ कैसे साधा जाए।
    आदिवासी क्षेत्रों, SC छात्रों की छात्रवृत्ति और माओवाद प्रभावित इलाकों में विकास के दावे सामाजिक समावेशन की तस्वीर पेश करते हैं। 42 हजार करोड़ की छात्रवृत्ति और 20 हजार गांवों को विकास से जोड़ने का लक्ष्य काग़ज़ पर प्रभावशाली है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में शिक्षा की गुणवत्ता, ड्रॉपआउट दर और रोजगार से जुड़ाव जैसे प्रश्न अब भी चुनौती बने हुए हैं।
    कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर राष्ट्रपति का ज़ोर सरकार की राजनीतिक समझ को भी दर्शाता है। PM किसान सम्मान निधि के तहत 4 लाख करोड़ रुपये का हस्तांतरण, मत्स्यपालन में 105 प्रतिशत वृद्धि और फूड प्रोसेसिंग क्षमता में 20 प्रतिशत इज़ाफ़ा ये आँकड़े ग्रामीण भारत को आश्वस्त करने का प्रयास हैं। फिर भी, किसान आय दोगुनी होने का लक्ष्य, MSP की कानूनी गारंटी और कृषि संकट जैसे मुद्दे इस चमकदार तस्वीर के समानांतर मौजूद हैं, जिन पर अभिभाषण अपेक्षाकृत मौन रहा।
    महिलाओं के संदर्भ में “लखपति दीदी” और “ड्रोन दीदी” जैसे शब्द सरकार की ब्रांडिंग रणनीति को दर्शाते हैं। 10 करोड़ महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़ना और 3 करोड़ का लक्ष्य निश्चित ही सामाजिक परिवर्तन की दिशा में बड़ा कदम है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आर्थिक सशक्तिकरण टिकाऊ है, या यह योजनाओं तक सीमित रह जाएगा? महिलाओं की सुरक्षा, श्रम भागीदारी और निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी जैसे मुद्दों पर ठोस रोडमैप अभी भी अपेक्षित है।
    कुल मिलाकर राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार के आत्मविश्वास और उपलब्धियों का दस्तावेज़ है। यह “विकसित भारत” की परिकल्पना को दोहराता है, जिसमें सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर, सामाजिक योजनाएं और आत्मनिर्भरता प्रमुख स्तंभ हैं। लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र में अभिभाषण का महत्व केवल दावों में नहीं, बल्कि उन दावों की आलोचनात्मक जाँच में भी है।

    राष्ट्र व मीडिया के लिए यह अभिभाषण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश को एक दिशा दिखाता है, पर उसी के साथ विपक्ष, नागरिक समाज और मीडिया पर यह ज़िम्मेदारी भी डालता है कि वे इन दावों को ज़मीनी सच्चाई की कसौटी पर परखें। आत्मनिर्भरता केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि संस्थाओं की मजबूती, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय से आती है। यदि सरकार इन तीनों को विकास के साथ संतुलित कर पाती है, तभी टैगोर की कल्पना में निहित “पूर्ण आज़ादी” का सपना सच हो सकेगा।

    -देवानंद सिंह

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