नई दिल्ली. त्योहारी मौसम से पहले प्याज की बढ़ती कीमतों ने केंद्र सरकार की चिंता बढ़ा दी है. उपभोक्ताओं को राहत देने और बाजार में अचानक आई तेजी पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र ने अपने बफर भंडार से प्याज की बिक्री तेज कर दी है. सरकार ने रियायती दर पर बिक्री शुरू होने के पहले 10 दिनों में ही 17 शहरों में करीब 4,000 टन बफर प्याज बेच दिया है. चुनिंदा शहरों में यह प्याज 35 रुपये प्रति किलोग्राम की रियायती दर पर उपलब्ध कराया जा रहा है. इसके बावजूद तस्वीर पूरी तरह सरकार के पक्ष में नहीं है. पांच सितंबर तक देश में प्याज का औसत खुदरा भाव 50.79 रुपये प्रति किलो पहुंच गया, जबकि 28 अगस्त को सरकारी रियायती बिक्री शुरू होने के समय यह 48.50 रुपये प्रति किलो था.
सरकार के पास 1.21 लाख टन का बफर
केंद्र सरकार ने 2026 के लिए करीब 1.21 लाख टन प्याज का बफर भंडार तैयार किया है. इसे भारतीय राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ और भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ के माध्यम से बाजार में उतारा जा रहा है. सरकार का उद्देश्य उन शहरों और बाजारों में तत्काल आपूर्ति बढ़ाना है जहां कीमतों में असामान्य तेजी दिखाई दे रही है.
उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार, बफर प्याज को उत्पादक राज्यों से प्रमुख खपत केंद्रों तक पहुंचाने के लिए रेल और सड़क दोनों माध्यमों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके लिए विशेष रेल सेवा ‘कांदा एक्सप्रेस’ चलाई जा रही है. दिल्ली और चेन्नई तक इसकी खेप पहुंच चुकी है, जबकि तीसरी खेप गुवाहाटी भेजने की तैयारी की जा रही है.
35 रुपये किलो की बिक्री से कितनी राहत
सरकार ने कीमतों के लिहाज से संवेदनशील चुनिंदा शहरों में बफर प्याज 35 रुपये प्रति किलो की दर से बेचने का फैसला किया है. भारतीय राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ अकेले अब तक करीब 1,500 टन बफर प्याज बेच चुका है.
संघ की प्रबंध निदेशक अनीस जोसेफ चंद्रा के मुताबिक, कुछ बाजारों में इस हस्तक्षेप से प्याज की कीमतों में 2 से 3 रुपये प्रति किलो तक की कमी देखने को मिली है. सरकारी प्याज को मोबाइल वैन, खुदरा केंद्रों, सहकारी संस्थाओं और स्थानीय प्रशासन द्वारा चिन्हित अन्य माध्यमों से उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जा रहा है.
लेकिन राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े सरकार की चुनौती को भी सामने रखते हैं. पांच सितंबर को दिल्ली में प्याज करीब 58 रुपये, मुंबई में 53 रुपये, चेन्नई में 63 रुपये और रांची में 40 रुपये प्रति किलो बिक रहा था. देश का औसत थोक भाव करीब 42.79 रुपये प्रति किलो था.
सरकारी बिक्री के बावजूद औसत भाव क्यों बढ़ा
यही इस पूरे अभियान का सबसे अहम सवाल है. सरकार ने बड़ी मात्रा में बफर प्याज बाजार में उतारा, लेकिन राष्ट्रीय औसत खुदरा कीमत उस अवधि में कम नहीं हुई. इसके पीछे क्षेत्रीय आपूर्ति, परिवहन लागत, स्थानीय मांग और मंडी स्तर पर उपलब्धता जैसे कई कारण हो सकते हैं.
सरकारी बफर का फायदा उन्हीं इलाकों में अधिक दिखाई देता है जहां प्याज सीधे रियायती चैनल से उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है. दूसरी ओर, सामान्य खुदरा बाजार में प्याज की कीमत स्थानीय आपूर्ति और मांग के हिसाब से तय होती है. इसलिए 35 रुपये किलो की सरकारी बिक्री का अर्थ यह नहीं है कि हर शहर में दुकानों पर प्याज उसी भाव पर उपलब्ध होगा.
यही वजह है कि सरकार के सामने केवल बफर स्टॉक जारी करना ही पर्याप्त नहीं है. उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सस्ती प्याज वास्तविक रूप से अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचे और बीच की आपूर्ति श्रृंखला में उसका लाभ खत्म न हो.
बारिश ने बिगाड़ा प्याज का गणित
इस बार प्याज की कीमतों के पीछे मौसम भी महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है. सरकार के अनुसार, सामान्य तौर पर साल के बाद के महीनों में बाजार की जरूरत पूरी करने के लिए रखी जाने वाली रबी प्याज की फसल को कटाई के दौरान बेमौसम बारिश से नुकसान हुआ.
रबी प्याज देश की प्याज आपूर्ति व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसकी फसल को भंडारित करके बाद के महीनों में बाजार में उतारा जाता है. यदि भंडारण योग्य प्याज की मात्रा या गुणवत्ता प्रभावित होती है तो आगे चलकर बाजार में उपलब्धता पर दबाव बन सकता है.
सरकार ने हालांकि यह भी कहा है कि देश में कुल प्याज उत्पादन की स्थिति मजबूत है. 2025-26 में प्याज का अनुमानित उत्पादन करीब 307.37 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 307.67 लाख टन के लगभग बराबर है.
नई खरीफ फसल से अक्टूबर में मिल सकती है राहत
सरकार और बाजार विशेषज्ञों की नजर अब नई खरीफ प्याज की आवक पर है. अधिकारियों को उम्मीद है कि अक्टूबर के मध्य से नई खरीफ प्याज बाजार में आने लगेगी, जिससे आपूर्ति बढ़ेगी और मौजूदा दबाव कम हो सकता है. यदि नई फसल की आवक अनुमान के मुताबिक रही तो आने वाले सप्ताहों में कीमतों को संभालने में मदद मिलेगी.
इसका अर्थ यह है कि सरकार का मौजूदा बफर स्टॉक अभियान तत्काल राहत देने का उपाय है, जबकि अक्टूबर में आने वाली नई फसल बाजार के लिए अपेक्षाकृत स्थायी राहत का आधार बन सकती है.
19 शहरों तक पहुंचाया जा रहा बफर प्याज
सरकार ने बफर प्याज की आपूर्ति को लगातार बढ़ाया है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने सितंबर की शुरुआत में बताया था कि बफर स्टॉक की लक्षित बिक्री को 19 शहरों तक विस्तार दिया गया है. इसके लिए रेल रैक के साथ 30 से अधिक ट्रकों का इस्तेमाल किया जा रहा है. 35 रुपये किलो की बिक्री भारतीय राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ, भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ, केंद्रीय भंडार और मोबाइल वैन जैसे माध्यमों से की जा रही है.
इस व्यवस्था का मकसद केवल कीमत घटाना नहीं, बल्कि उन इलाकों में प्याज पहुंचाना भी है जहां स्थानीय आपूर्ति कमजोर होने के कारण खुदरा कीमत तेजी से बढ़ रही है.
किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण है सरकारी हस्तक्षेप
प्याज की कीमतों पर चर्चा में अक्सर उपभोक्ता का पक्ष सामने आता है, लेकिन इसका सीधा असर किसानों पर भी पड़ता है. जब बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो किसान को बेहतर भाव मिल सकता है, लेकिन अत्यधिक उतार-चढ़ाव उत्पादन और अगली फसल की योजना को प्रभावित कर सकता है.
सरकार की बफर नीति का उद्देश्य ऐसे समय में बाजार में प्याज उतारना है जब कीमतें असामान्य रूप से बढ़ रही हों और दूसरी ओर किसानों को उत्पादन के समय उचित बाजार उपलब्धता मिलती रहे. सरकार ने 2026-27 के लिए रबी प्याज की खरीद का लक्ष्य 2 लाख टन रखा है और खरीद अभियान 15 मई से शुरू किया गया था.
इसलिए सरकार के सामने संतुलन की चुनौती है—उपभोक्ता को महंगाई से राहत मिले, लेकिन किसानों को उनकी फसल का लाभकारी मूल्य भी मिलता रहे.
कांदा एक्सप्रेस बनी आपूर्ति की नई कड़ी
बफर प्याज की मौजूदा रणनीति में ‘कांदा एक्सप्रेस’ सबसे चर्चित पहल बनकर सामने आई है. रेल के जरिए बड़ी मात्रा में प्याज को कम समय में उत्पादक क्षेत्रों से दूर स्थित बड़े बाजारों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है. इससे सड़क परिवहन पर निर्भरता घटाने और बड़े शहरों में एक साथ बड़ी खेप पहुंचाने में मदद मिल सकती है.
दिल्ली और चेन्नई में इसकी खेप पहुंचने के बाद अब गुवाहाटी के लिए अगली खेप तैयार की जा रही है. इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार केवल एक-दो महानगरों तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग उपभोग केंद्रों में आपूर्ति का दबाव कम करना चाहती है.
असली परीक्षा आने वाले हफ्तों में
सरकार ने फिलहाल बाजार में प्याज की उपलब्धता बढ़ाने के लिए बड़ा हस्तक्षेप किया है. 10 दिनों में 4,000 टन की बिक्री बताती है कि बफर स्टॉक को तेजी से बाजार में उतारा जा रहा है. लेकिन राष्ट्रीय औसत कीमत का 48.50 रुपये से बढ़कर 50.79 रुपये प्रति किलो होना यह भी बताता है कि सरकारी हस्तक्षेप का असर अभी पूरे देश में समान नहीं पहुंचा है.
अब सरकार की रणनीति की असली परीक्षा सितंबर और अक्टूबर में होगी. एक ओर बफर प्याज की आपूर्ति बढ़ानी होगी, वहीं दूसरी ओर नई खरीफ फसल की आवक सुचारु करानी होगी. यदि अक्टूबर में नई फसल पर्याप्त मात्रा में बाजार में आती है तो कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना है.
फिलहाल उपभोक्ताओं के लिए राहत यह है कि चुनिंदा शहरों में 35 रुपये किलो की सरकारी प्याज उपलब्ध है. लेकिन पूरे देश के बाजार के लिए तस्वीर अभी मिश्रित है. बफर स्टॉक बाजार में उतर चुका है, कांदा एक्सप्रेस दौड़ रही है, लेकिन प्याज की कीमतों पर पूरी तरह लगाम लगने के लिए नई फसल की आवक का इंतजार करना पड़ सकता है.

