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    Home » कोरोना की व्याधि: योग की आंधी
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    कोरोना की व्याधि: योग की आंधी

    Devanand SinghBy Devanand SinghJune 18, 2020No Comments8 Mins Read
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    ललित गर्ग 

    योग की एक किरण ही काफी है भीतर का तम हरने के लिये, दुनिया में अमन एवं शांति स्थापित करने के लिये। शर्त एक ही है कि उस किरण को पहचानने वाली दृष्टि और दृष्टि के अनुरूप पुरुषार्थ का योग हो। भारतभूमि अनादिकाल से योग भूमि के रूप में विख्यात रही है, जिसका लाभ अब समूची दुनिया को मिल रहा है। भारत का कण-कण, अणु-अणु न जाने कितने योगियों की योग-साधना से आप्लावित हुआ है। तपस्वियों की गहन तपस्या के परमाणुओं से अभिषिक्त यह माटी धन्य है और धन्य है यहां की हवाएं, जो साधना के शिखर पुरुषों की साक्षी हैं। इसी भूमि पर कभी वैदिक ऋषियों एवं महर्षियों की तपस्या साकार हुई थी तो कभी भगवान महावीर, बुद्ध एवं आद्य शंकराचार्य की साधना ने इस माटी को कृत्कृत्य किया था। साक्षी है यही धरा रामकृष्ण परमहंस की परमहंसी साधना की, साक्षी है यहां का कण-कण विवेकानंद की विवेक-साधना का, साक्षी है क्रांत योगी से बने अध्यात्म योगी श्री अरविन्द की ज्ञान साधना का और साक्षी है महात्मा गांधी की कर्मयोग-साधना का। योग साधना की यह मंदाकिनी न कभी यहां अवरुद्ध हुई है और न ही कभी अवरुद्ध होगी। इसी योग मंदाकिनी से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के प्रयत्नों एवं उपक्रमों से आज समूचा विश्व आप्लावित हो रहा है, निश्चित ही यह एक शुभ संकेत है सम्पूर्ण मानवता के लिये। विश्व योग दिवस की सार्थकता इसी बात में है कि सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से, विश्व मानवता का कल्याण हो। सचमुच कोरोना महाव्याधि से पीड़ित विश्व में योग वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है, रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का यह सशक्त माध्यम है। लोगों का जीवन योगमय हो, इसी से युग की धारा को बदला जा सकता है, कोरोना महासंकट से मुक्ति पायी जा सकती है।
    जापान में एक मन्दिर है उसमें बुद्ध की प्रतिमा नहीं है, केवल मन्दिर में एक अंगुली बनी हुई है बुद्ध की। उसके ऊपर एक चांद बना हुआ है। नीचे बुद्ध का एक बोध वाक्य लिखा हुआ है-‘मैंने अंगुली दिखाई है चांद की तरफ लेकिन मैं जानता हूं कि तुम नासमझ हो। चांद को नहीं देखोगे और मेरी अंगुली की पूजा करोगे।’ सत्य की ओर उठी अंगुली का यथार्थ कथन वही समझ सकता है जिसमें सांकेतिक भाषा पढ़ने की पारदर्शी योगमय दृष्टि होती है। योग चीजों की सही परिप्रेक्ष्य में समझने का विज्ञान है, अन्यथा बिना योग आदमी सिद्धान्तों को ढोता है, जीता नहीं। सत्य बोलता है, अनुभव नहीं करता। संसार को भोगता है, जानता नहीं। इसलिये योग सत्य तक ले जाने वाला राजपथ है। जो स्वदर्शी बनने की साधना साध लेता है वह कालिदास की भाषा में ‘ज्ञाने मौनं, क्षमा शक्तौ, त्यागे श्लाघाविपर्यय’ की भूमिका में पहुंच जाता है। उसका चरित्र सौ टंच सोना बन जाता है। योग जीवन का अन्तर्दर्शन कराता है। इसके दर्पण में मनुष्य अपना बिम्ब देखता है, क्योंकि दर्पण से ज्यादा जीवन का और कोई वक्ता नहीं होता। प्रतिक्षण भारुण्ड पक्षी की तरह जागरूक बने। अप्रतिक्रियावादी बने, अहिंसक एवं संतुलित बने। सुख-दुःख, लाभ-हानि, प्रतिकूल-अनुकूल प्रसंगों में संतुलन रखे, क्योंकि ‘सम्मत्तदंसी न करंति पावं’-समत्वदर्शी पाप नहीं करता। बस यही योग जीवन में अवतरित करना है कि मैं पुराने असत् संस्कारों का शोधन करूं। नये अशुभ संस्कारों-आदतों को प्रवेश न दूं।
    मेेरी दृष्टि में योग मानवता की न्यूनतम जीवनशैली होनी चाहिए। आदमी को आदमी बनाने का यही एक सशक्त माध्यम है। एक-एक व्यक्ति को इससे परिचित- अवगत कराने और हर इंसान को अपने अन्दर झांकने के लिये प्रेरित करने हेतु विश्व योग दिवस को और व्यवस्थित ढंग से आयोजित करने के उपक्रम होने चाहिए। इसी से योगी बनने और अच्छा बनने की ललक पैदा होगी। योग मनुष्य जीवन की विसंगतियों पर नियंत्रण का माध्यम है। विश्वभर में योग के साधक आलोक की यात्रा पर निकल चुके हैं। जिस दिन वे दीर्घश्वास का अभ्यास करते हैं, स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार करते आलोक की पहली किरण उनके भीतर प्रवेश कर जाती है। उसके प्रकाश में कोई भी साधक अपने भीतर को देखने में सफल हो सकता है, बशर्ते उसका लक्ष्य अन्तर्मुखता हो। आत्मदर्शन की सोपान पर चढ़कर ही हम अपने स्वरूप को पहचान सकते है। अपने विकास की सार्थकता तभी होगी, जब हमें स्वयं का बोध होगा। आत्मबोध का सबसे सरल उपाय है अभ्यास एवं एकाग्रता की साधना। जिस व्यक्ति का लक्ष्य महान् होता है, वही अपनी प्रवृत्ति का उदात्तीकरण सकता है, अपनी और जग की समस्याओं का समाधान पा सकता है।
    योग मनुष्य को पवित्र बनाता है, निर्मल बनाता है, स्वस्थ बनाता है, कोरोना संक्रमण के दौर में योग रामबाण औषधि की तरह है। यजुर्वेद में की गयी पवित्रता- निर्मलता की यह कामना हर योगी के लिए काम्य है कि ‘‘देवजन मुझे पवित्र करें, मन में सुसंगत बुद्धि मुझे पवित्र करे, विश्व के सभी प्राणी मुझे पवित्र करें, अग्नि मुझे पवित्र करें।’’ योग के पथ पर अविराम गति से वही साधक आगे बढ़ सकता है, जो चित्त की पवित्रता एवं निर्मलता के प्रति पूर्ण जागरूक हो। निर्मल चित्त वाला व्यक्ति ही योग की गहराई तक पहुंच सकता है।
    स्वामी विवेकानंद कहते हैं-‘‘निर्मल हृदय ही सत्य के प्रतिबिम्ब के लिए सर्वोत्तम दर्पण है। इसलिए सारी साधना हृदय को निर्मल करने के लिए ही है। जब वह निर्मल हो जाता है तो सारे सत्य उसी क्षण उसमें प्रतिबिम्बित हो जाते हैं।…पावित्र्य के बिना आध्यात्मिक शक्ति नहीं आ सकती। अपवित्र कल्पना उतनी ही बुरी है, जितना अपवित्र कार्य।’’ आज विश्व में जो कोरोना महामारी, आतंकवाद, हिंसा, युद्ध, साम्प्रदायिक विद्धेष की ज्वलंत समस्याएं खड़ी है, उसका कारण भी योग का अभाव ही है। जब मानव अपनी आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक समस्याओं को सुलझाने के लिए अथवा उनका समाधान पाने के लिए योग का आश्रय लेता है तो वह योग से जुड़ता है, संबंध बनाता है, जीवन में उतारने का प्रयास करता है। किन्तु जब उसके बारे में कुछ जानने लगता है, जानकर क्रिया की प्रक्रिया में चरण बढ़ाता है तो वह प्रयोग की सीमा में पहुंच जाता है। इसी प्रयोग की भूमिका को जीवन का अभिन्न अंग बनाकर हम मानवता को एक नयी शक्ल दे सकते है।
    योग के नाम पर साम्प्रदायिकता करने वाले मानवता का भारी नुकसान कर रहे है। क्योंकि योग किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, जाति या भाषा से नहीं जुड़ा है। योग का अर्थ है जोड़ना, इसलिए यह प्रेम, अहिंसा, करुणा और सबको साथ लेकर चलने की बात करता है। योग, जीवन की प्रक्रिया की छानबीन है। यह सभी धर्मों से पहले अस्तित्व में आया और इसने मानव के सामने अनंत संभावनाओं को खोलने का काम किया। आंतरिक व आत्मिक विकास, मानव कल्याण से जुड़ा यह विज्ञान सम्पूर्ण दुनिया के लिए एक महान तोहफा है।
    आज योगिक विज्ञान जितना महत्वपूर्ण हो उठा है, इससे पहले यह कभी इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा। आज हमारे पास विज्ञान और तकनीक के तमाम साधन मौजूद हैं, जो दुनिया के विध्वंस का कारण भी बन सकते हैं। ऐसे में यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमारे भीतर जीवन के प्रति जागरूकता और ऐसा भाव बना रहे कि हम हर दूसरे प्राणी को अपना ही अंश महसूस कर सकें, वरना अपने सुख और भलाई के पीछे की हमारी दौड़ सब कुछ बर्बाद कर सकती है।
    अगर लोगों ने अपने जीवन का, जीवन में योग का महत्व समझ लिया और उसे महसूस कर लिया तो दुनिया में खासा बदलाव आ जाएगा। जीवन के प्रति अपने नजरिये में विस्तार लाने, व्यापकता लाने में ही मानव-जाति की सभी समस्याओं का समाधान है। उसे निजता से सार्वभौमिकता या समग्रता की ओर चलना होगा। भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो इस पूरी धरती पर मानव कल्याण और आत्मिक विकास की लहर पैदा कर सकता है।
    हम भारतीयों के लिये यह गर्व का विषय है कि योग भारत की विश्व को एक महान देन है। योग भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है। लेकिन अब यह संपूर्ण विश्व का विषय एवं मानव मात्र के जीवन का अंग बन रहा है। यह जीव नाना प्रकार के संस्कार रूपी रंगों से रंगे हुए शरीर में रहता है, लेकिन योगाभ्यास द्वारा तपाया गया शरीर रोग, बुढ़ापा, क्रोध आदि से रहित होकर स्वरूपानुभूति के योग्य होता है।
    प्रसिद्ध उक्ति है- ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’! इसके अनुसार निरोग एवं दृढ़ता से युक्त-पुष्ट शरीर के बिना साधना संभव नहीं। इसलिए योग को इस प्रकार गूंथ दिया गया है कि शरीर की सुडौलता के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रगति भी हो। शरीर की सुदृढ़ता के लिए आसन एवं दीर्घायु के लिए प्राणायाम को वैज्ञानिक ढंग से ऋषियों ने अनुभव के आधार पर दिया है इससे व्यक्ति एक महान संकल्प लेकर उसे कार्यान्वित कर सकता है। अतः योग इस जीवन में सुख और शांति देता है और मुक्ति के लिए साधना का मार्ग भी प्रशस्त करता है। योग केवल सुंदर एवं व्यवस्थित रूप से जीवन-यापन करना ही नहीं सिखाता अपितु व्यक्तित्व को निखारने की कला को भी सिखाता है।
    इस संसार में कर्म में प्रवृत्त परायण लोग शारीरिक शक्ति प्रधान होते हंै, कुछ लोग भक्ति परायण होकर भावनात्मक शक्ति प्रधान होते हैं, कुछ अन्य लोग ध्यान परायण होकर मानस शक्ति प्रधान होते हैं तो कुछ लोग विचार परायण होकर बौद्धिक शक्ति प्रधान होते हैं। इस प्रकार साधक भेद के अनुसार कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग एवं ज्ञानयोग-क्रमशः ये चार मार्ग प्रसिद्ध हैं। राजयोग के अनेक प्रभेदों में से एक ‘आष्टांग योग’ है। आजकल व्यवहार में इसके दो अंग-आसन और प्राणायाम-विशेष रूप से प्रचलित हैं। ‘ज्ञानादेव तु कैवल्य’ इस उक्ति के अनुरूप आपके शरीर एवं मन को उस ज्ञानानुभूति के योग बनाना ही योग का प्रमुख लक्ष्य है। विश्व योग दिवस की निरन्तरता बनी रहे, यह अपेक्षित है। यह इतिहास न बने, बल्कि परम्परा बने।

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