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    Home » क्या भाजपा को चुनावी माइलेज देगा घुसपैठियों का मुद्दा …?
    Breaking News Headlines झारखंड संपादकीय संवाद विशेष

    क्या भाजपा को चुनावी माइलेज देगा घुसपैठियों का मुद्दा …?

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 25, 2024No Comments5 Mins Read
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    क्या भाजपा को चुनावी माइलेज देगा घुसपैठियों का मुद्दा …?
    देवानंद सिंह
    झारखंड विधानसभा चुनाव में बांग्लादेशी घुसपैठ और एनआरसी लागू करने का मुद्दा छाए रहने की संभावना है। बीजेपी लगातार इस मुद्दे पर मुखर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गत दिनों जमशेदपुर जनसभा में संबोधन के दौरान झारखंड की बदल रही डेमोग्राफी और बांग्लादेशी घुसपैठ के जिक्र के बाद यह तय हो गया है कि आगामी विधानसभा चुनाव में बीजेपी इसे प्रमुखता से उठाएगी और इस मुद्दे को उस समय तरजीह मिल गई जब राज्यसभा के पूर्व सांसद राकेश सिन्हा ने प्रधानमंत्री मोदी के बातों को जमशेदपुर में दोहरा दिया
    इसमें कोई शक नहीं है कि झारखंड के संताल परगना में बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी घुसपैठ हुई है। इससे संबंधित क्षेत्र की डेमोग्राफी बदल गई है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि बीते कुछ दशकों से इस क्षेत्र में आदिवासियों की संख्या लगातार घटती जा रही है। संताल क्षेत्र में कभी आदिवासियों की आबादी 44 प्रतिशत थी, जो वर्तमान में घटकर 28 प्रतिशत रह गई है। झारखंड में सिर्फ घुसपैठ ही नहीं मतांतरण और पलायन भी हो रहा है। केंद्र सरकार के पास घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें वापस भेजने की क्षमता है, लेकिन इसके लिए एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) लागू करना जरूरी है।
    बंगाल से झारखंड में आने वाले घुसपैठियों का मुद्दा उस समय और भी गर्म हो गया है, जब से कई अध्ययन और रिपोर्टें इस बात का संकेत देती हैं कि अवैध प्रवासियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। स्थानीय निवासियों का यह आरोप है कि ये घुसपैठिए उनकी सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों पर असर डाल रहे हैं। दरअसल, झारखंड की सीमाएं पश्चिम बंगाल से सटी हुई हैं और इस क्षेत्र में स्थानीय लोगों के बीच अवैध प्रवासियों को लेकर बढ़ती चिंता का मुद्दा भाजपा के लिए एक संवेदनशील और आकर्षक चुनावी नारा बन सकता है। पार्टी इस मुद्दे को उठाकर स्थानीय जनता के बीच अपनी साख और विश्वसनीयता बढ़ाने की भरपूर कोशिश करेगी।
    दरअसल, यह मुद्दा न केवल सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं से जुड़ा हुआ है, बल्कि यह चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता भी रखता है। भाजपा ने हमेशा से अपने राजनीतिक विमर्श में सुरक्षा और प्रवासन के मुद्दों को प्रमुखता दी है और झारखंड में यह मुद्दा विशेष रूप से प्रासंगिक हो गया है। भाजपा हमेशा से “विकास” और “सुरक्षा” के मुद्दों को अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल करते आई है। लिहाजा, झारखंड विधानसभा चुनाव में बंगाल के घुसपैठियों के मुद्दे को भाजपा इस तरह पेश कर सकती है कि यह न केवल झारखंड के निवासियों की सुरक्षा से जुड़ा है, बल्कि यह विकास और रोजगार के अवसरों को भी प्रभावित कर रहा है। भाजपा इस मुद्दे को उठाकर निश्चित ही यह दिखाना चाहेगी कि कैसे अवैध प्रवासी स्थानीय संसाधनों पर बोझ डालते हैं, जिससे रोजगार की संभावनाएं कम होती हैं। इसके साथ ही, पार्टी यह भी सुनिश्चित कर सकती है कि स्थानीय लोगों को उनकी पहचान और संस्कृति की रक्षा के लिए एक मजबूत नेतृत्व चाहिए, हालांकि, इस मुद्दे को उठाने के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं।
    झारखंड के कुछ हिस्सों में घुसपैठियों को लेकर धारणा विभाजित है। कुछ समुदायों में यह विचार हो सकता है कि घुसपैठियों ने स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान दिया है, खासकर कृषि और निर्माण क्षेत्रों में। ऐसे में, भाजपा को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका संदेश सभी समुदायों तक पहुंचे और किसी भी तरह के सामाजिक तनाव को बढ़ाने से बचा जाए। इसके अलावा, विपक्षी दल इस मुद्दे को भाजपा के लिए एक दोधारी तलवार के रूप में पेश कर सकते हैं। ऐसा देखने को मिल रहा है।
    बांग्लादेशी घुसपैठ पर मुखर रही भाजपा को जवाब देने के लिए जेएमएम ने सरना धर्म कोड का सहारा लिया है।
    जेएमएम का कहना है कि बीजेपी द्वारा गुजरात और असम से तय एजेंडे को जनता ठुकरा देगी और चुनाव परिणाम वही होगा, जो 2019 के विधानसभा चुनाव में हुआ था। केन्द्र सरकार आदिवासियों के सरना धर्मकोड पर चुप क्यों है, राज्य सरकार के पिछड़ों का आरक्षण बढ़ाने संबंधी प्रस्ताव को आखिर क्यों लटका कर रखी है ? झारखंड का बकाया 136 करोड़ क्यों नहीं दे रही है ? बहरहाल, बंगलादेशी घुसपैठ पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने सामने हैं, जाहिर तौर पर यह मुद्दा फिलहाल शांत होता नहीं दिख रहा है, इसीलिए यह मुद्दा विधानसभा चुनाव तक छाया रहेगा। अगर, विपक्ष इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने में सफल होता है तो तो भाजपा को इसकी प्रतिक्रिया में सावधानी बरतने की बहुत अधिक आवश्यकता होगी।
    ऐसे में, भाजपा को चाहिए कि वह चुनावी अभियान में केवल घुसपैठियों का मुद्दा ही नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दों को भी प्राथमिकता दे। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दे स्थानीय लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन मुद्दों को संबोधित करके पार्टी अपने चुनावी वादों को मजबूत कर सकती है। इसके अलावा, भाजपा को चाहिए कि वह स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के माध्यम से एक मजबूत जनसमर्थन नेटवर्क तैयार करे। स्थानीय स्तर पर किए गए विकास कार्यों को उजागर करने से पार्टी को अपनी साख को और बढ़ाने में मदद मिलेगी।
    यदि, भाजपा इस मुद्दे को समझदारी से उठाती है और इसे स्थानीय समस्याओं से जोड़ती है तो यह निश्चित रूप से चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसके लिए पार्टी को अपनी रणनीति को संतुलित रखना होगा, ताकि समाज में कोई दरार न आए और सभी वर्गों का विश्वास जीत सके। इसके इतर, झारखंड में भाजपा की चुनावी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह स्थानीय मुद्दों को कैसे समझती है और उनका समाधान कैसे प्रस्तुत करती है। घुसपैठियों का मुद्दा एक अच्छा उपकरण हो सकता है, लेकिन इसे समझदारी और संवेदनशीलता के साथ उठाना होगा।
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