साहब’ कुर्सी पर ठीक से जमे भी नहीं कि गुलदस्ता ब्रिगेड स्वागत के लिए हाज़िर
राष्ट्र संवाद संवादाता
स्वच्छ प्रशासनिक सेवा पर हावी होता बटरिंग कल्चर
मृत्युंजय बर्मन
झारखण्ड में पोस्टिंग का मौसम चल रहा है। सरायकेला में, चाहे जिला प्रशासन या पुलिस प्रशासन में, जहां भी नयी पोस्टिंग होती है, वहां ‘साहब’ कुर्सी पर अभी ठीक से जमे भी नहीं होते हैं कि उनके स्वागत के लिए ‘गुलदस्ता ब्रिगेड’ पहले ही दरबाजे पर लाइन लगा देते हैं। लिलोन शर्ट के उपर खादी बंड़ी, खिजाब से रंगे बाल, चमकते जूते, कपड़ो से निकलती परफ्यूम की खुश्बू, हाथों में थामे गुलदस्ते में लिपटी सुनहरी तारों के बीच फंसा विजिटिंग कार्ड और ‘फर्स्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन’ की थ्योरी में उलझा बैचेन मन.. ऑफिस पिउन के पुकारे जाने के इंतज़ार में… वाला दृश्य सभी ऑफिस में दिखाई देते हैं।
‘साहब’ के ऑफिस के अंदर का बटरिंग वाला नजारा भी कम दिलचस्प नहीं होता है। हाथ में गुलदस्ता, चेहरे पर मुस्कान और जेब में परिचय का कोई न कोई “लिंक” तैयार रहता है। कोई बताता है कि साहब के गांव के बगल वाले गांव में उसके मामा के साढ़ू रहते हैं, तो कोई दावा करता है कि साहब के कॉलेज के एक प्रोफेसर को वह व्यक्तिगत रूप से जानता है। जिनका सरनेम मिल जाता है, वे तो सीधे पारिवारिक रिश्तेदारी तक पहुंच जाते हैं। जिनका सरनेम नहीं मिलता, वे जन्मस्थान, स्कूल, कॉलेज और विभागीय संपर्कों के जरिए ही निकटता का पुल बांध देते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि स्वागत मेला में आम नागरिक शायद ही कहीं दिखाई देते हैं। न मोहल्ले के शिक्षक, न डॉक्टर, न ईमानदार व्यवसायी और न ही करदाता नागरिक। सबसे ज्यादा उत्साह उन्हीं चेहरों में दिखाई देता है जिनका किसी न किसी रूप में विभाग से सीधा “व्यावसायिक” रिश्ता होता है।नए अधिकारी के साथ फोटो खिंचवाने की उनकी क्षमता अद्भुत होती है। सोशल मीडिया पर तस्वीर डालकर यह संदेश देने की कोशिश होती है कि पुलिस और प्रशासनिक पहिये अब उनकी सलाह से ही घूमेंगे।
किसी का ठेका चल रहा होता है, किसी की फाइल अटकी होती है, कोई मंथली व्यवस्था को लेकर चिंतित होता है, तो कोई अपने दो नंबर के कारोबार की सुरक्षा कवच तलाश रहा होता है। कई लोगों के लिए गुलदस्ता दरअसल फूलों का गुच्छा नहीं, बल्कि भविष्य के निवेश का पहला किश्त होता है।
उद्योगों और बड़े संस्थानों के जनसंपर्क विभाग भी ऐसे अवसरों पर अचानक रेस हो जाते हैं। अधिकारियों से “कर्टसी मीट” के लिए बेचैन हो उठते हैं। मानो, समस्त औद्योगिक अड़चनों का, पुराने साहब के टेबल में अटकी फाइल का मिमांसा इसी मुलाकात पर निर्भर हो।
सच यह है कि सार्वजनिक संपर्क वाले पदों पर बैठे अधिकारियों के लिए नए लोगों से परिचय आवश्यक भी है। इससे क्षेत्र की जानकारी मिलती है और कामकाज में सुविधा होती है। लेकिन अनुभव कहता है कि सबसे पहले गुलदस्ता लेकर पहुंचने वाला व्यक्ति हमेशा सबसे उपयोगी नागरिक हो, यह जरूरी नहीं।
प्रशासनिक सेवा का असली कौशल इसी में है कि वह फूलों के गुच्छे के पीछे छिपे हितों को पहचान सके। जो व्यक्ति पहले दिन से अत्यधिक आत्मीयता दिखा रहा हो, उसकी पृष्ठभूमि की पड़ताल शायद उतनी ही जरूरी है जितनी किसी शिकायत की जांच।
नए अधिकारियों को शायद अपने स्वागतकर्ताओं की सूची भी एक बार ध्यान से देखनी चाहिए। क्योंकि कई बार जनता की असली आवाज कतार में सबसे पीछे खड़ी होती है, जबकि सबसे आगे वही लोग होते हैं जिन्हें व्यवस्था से सेवा नहीं, सुविधा चाहिए। गुलदस्ते मुरझा जाते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपे मकसद अक्सर लंबे समय तक हरे-भरे रहते हैं।

