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    Home » अपहरण की गुत्थी, पुलिस की सुस्ती और संगठित अपराध का उभरता चेहरा
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    अपहरण की गुत्थी, पुलिस की सुस्ती और संगठित अपराध का उभरता चेहरा

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीJanuary 22, 2026No Comments4 Mins Read
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    अपहरण की गुत्थी, पुलिस की सुस्ती और संगठित अपराध का उभरता चेहरा

    देवानंद सिंह
    जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित एसएसपी आवास के समीप से चर्चित उद्यमी कैरव गांधी के अपहरण को नौ दिन बीत चुके हैं, लेकिन पुलिस अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। न अपहृत का कोई सुराग, न अपहरणकर्ताओं की गिरफ्तारी। यह स्थिति न केवल पीड़ित परिवार की पीड़ा बढ़ा रही है, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
    इस पूरे मामले में जिस बात ने सबसे अधिक चिंता पैदा की है, वह है संगठित अपराध के पुराने नामों का बार-बार सामने आना। सूत्रों के अनुसार, इस अपहरण कांड में चंदन सोनार नामक अपराधी का नाम चर्चा में है। बताया जा रहा है कि इससे पहले भी रांची सहित कई बड़े अपहरण मामलों में उसका नाम जुड़ चुका है। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी से जुड़े एक मंडल के अपहरण और अन्य हाई-प्रोफाइल मामलों में भी उसका नाम सामने आया था। हालांकि, इन सभी बिंदुओं पर अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

     

    जांच एजेंसियों के भीतर यह चर्चा भी है कि कैरव गांधी अपहरण मामले में जिस स्कॉर्पियो वाहन का इस्तेमाल हुआ, उसका पैटर्न पूर्व के अपहरण कांडों से मेल खाता है। यही कारण है कि पुलिस की जांच की दिशा अब झारखंड से निकलकर बिहार के नालंदा जिले तक पहुंच गई है। स्कॉर्पियो वाहन के मालिक राजशेखर का फरार होना और उसके इलाके का साइबर अपराध के लिए कुख्यात होना, संदेह को और गहरा करता है।

     

    इस मामले में एक और गंभीर पहलू है—हनी ट्रैप का संभावित एंगल। सूत्रों के अनुसार, चंदन सोनार से जुड़े पुराने मामलों में हनी ट्रैप की रणनीति का इस्तेमाल किया गया था। यह भी बताया जाता है कि उसके कथित गिरोह में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल रही हैं, जिन्हें विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराकर अपराध के जाल में इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि, यह सब जांच का विषय है, लेकिन पुलिस का इन बिंदुओं को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट न करना, कई सवाल छोड़ जाता है।

     

    चंदन सोनार इस समय पश्चिम बंगाल की एक जेल में बंद बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि अगर वह जेल में है, तो क्या उसका नेटवर्क बाहर सक्रिय है? क्या संगठित अपराध अब व्यक्तियों से आगे बढ़कर एक सिस्टम और नेटवर्क का रूप ले चुका है? यह वही बिंदु है, जहां पुलिस की पारंपरिक जांच पद्धति कमजोर नजर आती है।

     

    सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 192 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पुलिस के पास साझा करने लायक कोई ठोस जानकारी नहीं है। कोल्हान के डीआईजी द्वारा लगातार जल्द खुलासे के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे मेल नहीं खाती। अपहरण जैसे गंभीर अपराध में समय सबसे बड़ा कारक होता है, और हर बीतता घंटा अपहृत की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाता है।
    यह मामला केवल एक व्यक्ति के अपहरण तक सीमित नहीं है। यह शहर की कानून-व्यवस्था, पुलिस की तैयारी और संगठित अपराध से निपटने की रणनीति की परीक्षा है। अगर पुराने अपराधियों के नाम बार-बार सामने आ रहे हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पुलिस ने अतीत से कोई सबक लिया?

     

    आज जरूरत है कि जांच को सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित न रखकर अंतरराज्यीय संगठित अपराध नेटवर्क के रूप में देखा जाए। साथ ही, पुलिस को अफवाहों और अटकलों पर नहीं, बल्कि पारदर्शी संवाद के जरिए जनता का भरोसा जीतना होगा। पीड़ित परिवार और शहरवासियों का आक्रोश इसी भरोसे की कमी का परिणाम है।

     

    कैरव गांधी अपहरण कांड एक चेतावनी है—यदि इसे जल्द और निष्पक्ष तरीके से नहीं सुलझाया गया, तो यह संदेश जाएगा कि संगठित अपराध कानून से एक कदम आगे है। एक जिम्मेदार लोकतंत्र में यह स्वीकार्य नहीं हो सकता।
    अब वक्त है कि पुलिस दावों से आगे बढ़कर परिणाम दे। क्योंकि हर असफलता सिर्फ एक केस की हार नहीं होती, बल्कि पूरे सिस्टम की साख पर सवाल बन जाती है।

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