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    Home » इतिहास का सबसे कमजोर और सबसे मजबूत पीएम, कुर्सी चली गई पर कांग्रेस और लालू को नहीं दिलवाई राहत
    राजनीति संवाद विशेष

    इतिहास का सबसे कमजोर और सबसे मजबूत पीएम, कुर्सी चली गई पर कांग्रेस और लालू को नहीं दिलवाई राहत

    Devanand SinghBy Devanand SinghJune 1, 2021No Comments6 Mins Read
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    भारतीय राजनीति के इतिहास में 1996 का इतिहास बहुत रोचक रहा है. इस साल भारत को 3 प्रधानमंत्रियों का मुंह देखने को मिला. नरसिम्हा राव 1996 में अपनी पार्टी कांग्रेस को चुनावों में विजय नहीं दिलवा सके. सबसे बड़ी पार्टी के रूप में भारतीय जनता पार्टी (BJP) उभर कर आई पर सरकार बनाने के आंकड़े से बहुत दूर थी. दूसरे नंबर पर कांग्रेस रही. तीसरे पर जनता दल थी मगर सबसे आश्चर्यजनक सफलता रिजनल पार्टियों को मिली थी.अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन पुरानी सरकार गिरने के बाद जनता दल कहीं से भी रेस में नहीं थी पर भारतीय राजनीति में कुछ भी हो सकता है ये पहली बार निकल कर सामने आ रहा था. बड़े-बड़े धुरंधरों के बीच में जनता दल के एचडी देवगौड़ा का प्रधानमंत्री का पद पाना बडे़ नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा, अहं की लड़ाई और पार्टियों की गुटबाजी के चलते संभव हो सका था. इस तरह देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला जिसे इतिहास का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री भी कह सकते हैं और सबसे मजबूत भी. क्योंकि ये जानते हुए भी कि सरकार कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं के कृपा पर चल रही है बोफोर्स जांच और चारा घोटाले की जांच की आंच को कमजोर नहीं होना दिया. अब पर्दे के पीछे क्या चल रहा था ये कौन जाने पर देवगौड़ा सरकार के गिरने का यही कारण था कि सरकार कांग्रेस की सुन नहीं रही थी.

    लालू यादव सीबीआई से चाहते थे राहत

    सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद लालू यादव पर चारा घोटाले की सीबीआई जांच चल रही थी. लालू यादव के साथ 22 सांसद थे जो देवगौड़ा की सरकार गिराने के लिए काफी थे. पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी किताब बंधु बिहारी में लिखते हैं कि 1997 में पहली राउंड के पूछताछ के बाद लालू ने प्रधानमंत्री को फोन लगाकर फटकार लगाई, ” यह सब अच्छा नहीं हो रहा है, जो आप करवा रहे हैं उसका अंजाम अच्छा नहीं होगा. कांसिपिरेसी करना है तो बीजेपी के खिलाफ करो, हमारे खिलाफ क्यूं हो पड़े?” देवगौड़ा ने भी साफ-साफ अपनी लाचारगी जाहिर कर दी थी. हालांकि देवगौड़ा ने ही सीबीआई निदेशक जोगिंदर सिंह की नियुक्ति की थी अगर वे चाहते तो लालू यादव का कुछ काम बन सकता था. लालू ने प्रधानमंत्री निवास पर भी एक बार देवगौड़ा के सामने आते ही कमेंट किया था कि “का जी इसीलिए आपको प्रधानमंत्री बनाया था? बहुत गलती किया तुमको पीएम बना के. ” ठाकुर ने लिखा है कि देवगौड़ा ने भी इसी अंदाज में जवाब दिया था “भारत सरकार और सीबीआई कोई जनता दल थोड़े ही है कि जब चाहा जिसे चाहा भैंस की तरह हांक दिया. आप पार्टी को भैंस की तरह चलाते हैं पर मैं भारत सरकार चलाता हूं.”

    कांग्रेस भी बोफोर्स की जांच को लेकर परेशान थी

    देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक कोऐलिशन ईयर्स में लिखा है कि देवगौड़ा सरकार गिरने का कारण यही था कि सीबीआई बोफोर्स मामले को लेकर भी काफी उछल रही थी. कांग्रेस लगातार इसे लेकर परेशान थी. उस समय माहौल और खराब हो गया जब 22 जनवरी 1997 को सीबीआई निदेशक जोगिंदर सिंह ने स्विटजरलैंड से लौटकर अपने साथ लाए एक बॉक्स को दिखाते हुए कहा था कि इसमें बोफोर्स से रिलेटेड बहुत से डॉक्युमेंट हैं. प्रणब मुखर्जी ने लिखा कि स्पष्ट था कि इसके पीछे देवगौड़ा का ही दिमाग काम कर रहा था. बाद में कांग्रसे पार्टी ने देवगौडा गवर्नमेंट से सपोर्ट वापस करने का मन बनाया. जिसके चलते जनता दल ने अपना लीडर देवगौड़ा की जगह आईके गुजराल को चुना.

    देवगौड़ा कैसे बने पीएम

    1996 में चुनावों के परिणाम आने के बाद जब किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, तब परंपरा के अनुसार सबसे बड़ी पार्टी को सबसे पहले सरकार बनाने का मौका दिया गया. 161 सीटों के साथ बिना बहुमत के ही 16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. हालांकि 13 दिन बाद अटल बिहारी वाजपेई लोकसभा में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए और उनकी सरकार गिर गई. अब दूसरा मौका कांग्रेस पार्टी को मिलने वाला था जिसके पास 141 लोकसभा सीटें थीं. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इस बार सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया. इसके बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी जनता दल जिसके पास 46 लोकसभा सीटें थीं उसे सरकार बनाने का मौका दिया गया. जनता दल ने बीजेपी के खिलाफ अपने साथ लगभग 13 क्षेत्रीय पार्टियों को मिलाकर एक गठबंधन तैयार किया गया जिसे ‘यूनाइटेड फ्रंट’ का नाम दिया गया. कांग्रेस ने इस गठबंधन को अपना समर्थन दे दिया जिससे पूरी उम्मीद बन गई थी अब देश को एक नया प्रधानमंत्री मिलने वाला है. लेकिन इस गठबंधन के साथ एक ही समस्या थी कि उन्हें यह नहीं पता था कि आखिरकार उनका प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन होगा.कहते हैं उस वक्त ‘यूनाइटेड फ्रंट’ गठबंधन के पास प्रधानमंत्री के लिए कई बड़े नाम थे. लेकिन किसी एक नाम पर मुहर लगाना मुश्किल हो रहा था. पहले मांग उठी की वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया, उसके बाद प्रधानमंत्री पद के लिए चंद्रबाबू नायडू, जीके मूपनार, ज्योति बसु सरीखे कई बड़े नेताओं के नाम आगे किए गए. लेकिन एक एक करके सभी नामों को रिजेक्ट कर दिया गया.

    जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर पूरा गठबंधन पशोपेश में था, तो उस वक्त तमिलनाडु भवन में एक बैठक चल रही थी. कहा जाता है कि इसी बैठक में किसी ने देवगौड़ा का नाम आगे बढ़ाने की पेशकश की जिसके बाद इस नाम पर धीरे-धीरे सब की मुहर लगने लगी. हालांकि देवगौड़ा के विरोध में केवल एक ही नाम था और वह था रामकृष्ण हेगड़े का जो कभी देवगौड़ा के साथी हुआ करते थे. लेकिन कर्नाटक की राजनीति में जब देवगौड़ा मुख्यमंत्री बने तो उनके और हेगड़े के बीच राजनीतिक अदावत तेज़ हो गई और वही अदावत देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने में भी रोड़ा डाल रही थी. हालांकि उत्तर प्रदेश के नेता मुलायम सिंह यादव और बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं का साथ देवगौड़ा को मिला. ऊपर से वामपंथी दल और चंद्रबाबू नायडू सरीखे नेताओं को भी इस नाम से कोई परहेज नहीं था. जिसके बाद कांग्रेस ने भी देवगौड़ा के नाम पर अपना समर्थन कर दिया और इस तरह 1 जून 1996 को एच डी देवगौड़ा देश के 11वें प्रधानमंत्री बन गए.

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