कालियाचक की आग: कानून व्यवस्था या सियासी पटकथा?
पश्चिम बंगाल की ‘कालियाचक घटना’ ने प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। एनआईए जांच और इसके सियासी मायने पढ़ें ‘राष्ट्र संवाद’ पर।
देवानंद सिंह
पश्चिम बंगाल के मालदा स्थित कालियाचक मोथाबाड़ी क्षेत्र में न्यायिक अधिकारियों के घेराव की घटना केवल एक कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है, बल्कि इसने कई गंभीर सवालों को जन्म दे दिया है। मतदाता सूची पुनरीक्षण के खिलाफ विरोध का यह रूप जिस तरह हिंसक हुआ और न्यायपालिका तक को निशाना बनाया गया, वह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।
एनआईए की एंट्री ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। जब देश की शीर्ष जांच एजेंसी को हस्तक्षेप करना पड़े, तो साफ है कि मामला सिर्फ स्थानीय प्रशासन की क्षमता से बाहर माना गया है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद केंद्र की सक्रियता यह भी दर्शाती है कि राज्य सरकार की भूमिका और प्रतिक्रिया दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
*सबसे बड़ा सवाल डीएम और एसपी कहां थे?*
किसी भी संवेदनशील हालात में जिला प्रशासन की पहली जिम्मेदारी होती है कि वह मौके पर मौजूद रहे। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में न तो जिलाधिकारी दिखे और न ही पुलिस अधीक्षक। क्या यह महज लापरवाही थी या फिर स्थिति को जानबूझकर बढ़ने दिया गया? प्रशासन की अनुपस्थिति ने भीड़ के हौसले को बढ़ाया और हालात बेकाबू हो गए।
क्या यह ‘ट्रेलर’ है और असली ‘पिक्चर’ अभी बाकी है?
कालियाचक पहले भी संवेदनशील रहा है। ऐसे में यह घटना भविष्य के लिए एक चेतावनी भी हो सकती है। अगर समय रहते कड़ा संदेश नहीं दिया गया, तो यह प्रवृत्ति अन्य क्षेत्रों में भी दोहराई जा सकती है। सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार इसे सिर्फ एक isolated घटना बताकर टाल देगी या व्यापक कार्रवाई करेगी?
*राष्ट्रपति शासन सियासी फायदा या जोखिम?*
अब बहस इस पर भी है कि अगर हालात बिगड़ते हैं और राष्ट्रपति शासन की नौबत आती है, तो इसका राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा। एक धारणा यह भी है कि ममता बनर्जी खुद को ‘पीड़ित’ दिखाकर राजनीतिक सहानुभूति बटोर सकती हैं। बंगाल की राजनीति में “बाहरी हस्तक्षेप” का मुद्दा पहले भी तृणमूल कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हुआ है।
ऐसी घटनाएं अक्सर राजनीतिक ध्रुवीकरण को जन्म देती हैं। एक तरफ हिंदू एकजुटता की बात तेज होगी, तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यक राजनीति को भी हवा मिल सकती है। ऐसे माहौल में असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं के लिए भी राजनीतिक अवसर बनते हैं, जो पहचान आधारित राजनीति को आगे बढ़ाते हैं।
कालियाचक की घटना ने एक बार फिर दिखा दिया है कि जब प्रशासन कमजोर पड़ता है, तो सियासत हावी हो जाती है। यह सिर्फ पश्चिम बंगाल का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है कि लोकतंत्र की संस्थाओं पर हमला किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता।
अब देखना यह है कि एनआईए की जांच सच सामने लाती है या यह मामला भी राजनीतिक बयानबाजी के शोर में दबकर रह जाता है।

