लेखक: देवानंद सिंह
झारखंड की राजनीति में इरफान अंसारी के बयान एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने दशहरा आयोजन के दौरान हनुमान के स्वरूप में मौजूद एक कलाकार द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के पैर छूने की घटना पर सोशल मीडिया के माध्यम से गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस टिप्पणी ने सत्ताधारी गठबंधन और विपक्ष के बीच तीखी बहस को जन्म दे दिया है, जिससे सरकार को असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
इरफान अंसारी के बयान से क्यों मचा सियासी बवाल
मंत्री इरफान अंसारी ने अपने आधिकारिक हैंडल से घटना का वीडियो साझा करते हुए इसे अहंकार का प्रतीक बताया और माफी की मांग कर डाली। उनके इस रुख ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास की सार्वजनिक छवि लंबे समय से धार्मिक आस्था और सामाजिक परंपराओं के सम्मान से जुड़ी रही है। ऐसे में किसी घटना की पूरी परिस्थिति समझे बिना उस पर राजनीतिक निष्कर्ष निकालना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
विधायक पूर्णिमा साहू ने मंत्री के बयान पर कड़ा पलटवार करते हुए उन्हें अपनी भाषा और आचरण पर आत्ममंथन करने की नसीहत दी है। उन्होंने कहा कि विरोध का अधिकार लोकतंत्र में सभी को है, लेकिन विरोध के नाम पर व्यक्तिगत टिप्पणी और धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाना उचित नहीं है। इस घटनाक्रम ने झारखंड की राजनीति में शुचिता और मर्यादा के गिरते स्तर को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
पहले भी विवादों में घिरते रहे हैं मंत्री
यह पहला मौका नहीं है जब डॉ. इरफान अंसारी अपने बयानों को लेकर विवादों में घिरे हों। इससे पहले भी उनके कई बयानों से झारखंड सरकार को असहज स्थिति और राजनीतिक किरकिरी का सामना करना पड़ा है। एक जिम्मेदार मंत्री पद पर आसीन व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सार्वजनिक मंचों पर शब्दों की मर्यादा और उसके दूरगामी राजनीतिक परिणामों का ध्यान रखें। बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं सरकार की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयानों से सत्ताधारी दल को चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है। जनता बयानबाजी से अधिक विकास कार्यों और जनहित के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित देखना चाहती है। झारखंड सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध नीतियों और योजनाओं की जानकारी इस बात की गवाही देती है कि सरकार का फोकस विकास पर है, लेकिन मंत्रियों के विवादित बयान इस नैरेटिव को कमजोर कर देते हैं।
आस्था को हथियार बनाने के खतरे
श्रीराम और हनुमान करोड़ों लोगों की श्रद्धा के प्रतीक हैं। उनके आदर्श नेताओं से संयम, सत्य और मर्यादा की अपेक्षा करते हैं। आस्था को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हथियार बनाना न केवल सामाजिक सौहार्द के लिए खतरनाक है, बल्कि यह संवैधानिक पद की गरिमा के भी विपरीत है। झारखंड की जनता को बयानबाजी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे जनहित के मुद्दों पर ठोस काम चाहिए।
सरकार को गंभीरता से आत्ममंथन करना होगा कि उसके मंत्रियों के विवादित बयान उसकी उपलब्धियों पर भारी तो नहीं पड़ रहे हैं। राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल एक खतरनाक प्रवृत्ति है, जिससे सभी दलों को बचना चाहिए। इस प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सार्वजनिक जीवन में मर्यादा का पालन कितना आवश्यक है।

