देवानंद सिंह
संसद का बजट सत्र किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। यही वह मंच है जहां सरकार अपने आर्थिक और नीतिगत एजेंडे को देश के सामने रखती है और विपक्ष उसकी परीक्षा लेता है। लेकिन संसद के बजट सत्र के चौथे दिन जो दृश्य सामने आया, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी संसद बहस और विमर्श का मंच बनी रह गई है या वह केवल राजनीतिक टकराव और आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बनती जा रही है।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का उद्देश्य सरकार की नीतियों का समग्र मूल्यांकन करना होता है। यह चर्चा सरकार और विपक्ष दोनों को गंभीर, तथ्यपरक और जिम्मेदार भूमिका निभाने का अवसर देती है। किंतु डोकलाम विवाद, चीनी घुसपैठ और पूर्व सेना प्रमुख की कथित किताब के हवाले ने जिस तरह सदन का माहौल गरमाया, उसने मूल मुद्दों को हाशिये पर धकेल दिया।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय उठाकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। लोकतंत्र में यह विपक्ष का अधिकार और कर्तव्य दोनों है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सदन में किसी ऐसी किताब का हवाला देना उचित है जो अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है? संसदीय नियम केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सदन की गरिमा और विश्वसनीयता के रक्षक हैं। यदि तथ्यों की पुष्टि के बिना दावे किए जाएंगे, तो बहस तर्क से हटकर शोर में बदल जाएगी।
सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने जिस तीखे अंदाज में आपत्ति दर्ज कराई, वह सरकार की उस चिंता को दर्शाता है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर किसी भी तरह की अस्पष्टता या अटकल को वह अस्वीकार्य मानती है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का हस्तक्षेप यह याद दिलाने के लिए था कि संसद बहस का मंच है, लेकिन उसकी अपनी मर्यादाएं और सीमाएं हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि वास्तविक मुद्दे—आर्थिक चुनौतियां, रोजगार, उद्योग, महंगाई और आम आदमी की समस्याएं—हंगामे के शोर में दबते चले गए। राहुल गांधी ने संसद के बाहर अमेरिकी शुल्क के कारण भारतीय कपड़ा उद्योग को हो रहे नुकसान की बात उठाई, जो निस्संदेह एक गंभीर आर्थिक सवाल है। लेकिन यह मुद्दा सदन के भीतर जिस गंभीरता से उठाया जाना चाहिए था, वह राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया।
संसद केवल सरकार और विपक्ष के बीच शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं है। यह देश के करोड़ों नागरिकों की उम्मीदों और अपेक्षाओं का प्रतिनिधि सदन है। जब बहस का स्तर गिरता है, तो नुकसान किसी एक दल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का होता है। विपक्ष का दायित्व है कि वह सवाल पूछे, लेकिन तथ्यों और नियमों के दायरे में रहकर। वहीं सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आलोचना को केवल राजनीतिक हमला मानकर खारिज न करे, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता के साथ उत्तर दे।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका भी ऐसे समय में बेहद अहम हो जाती है। नियमों का सख्त पालन कराना आवश्यक है, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि बहस बाधित न हो और सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चले। अनुशासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन ही संसदीय लोकतंत्र की आत्मा है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद को फिर से संवाद और समाधान का केंद्र बनाया जाए। बजट सत्र देश की दिशा और दशा तय करने का अवसर होता है। यदि यह सत्र केवल हंगामे और आरोपों तक सीमित रह गया, तो जनता के सवाल अनुत्तरित ही रह जाएंगे। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सदन में जीती गई बहसें नहीं, बल्कि देश के लिए लिए गए सही फैसले ही इतिहास में दर्ज होते हैं।
राजनीतिक टकराव लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब वह उद्देश्य से भटक जाए, तो आत्ममंथन जरूरी हो जाता है। संसद को फिर से गंभीर बहस, तथ्यपरक विमर्श और जनहित के फैसलों का मंच बनाना ही समय की सबसे बड़ी मांग है।


