चुनाव और लोक लुभावन वादे
देवानंद सिंह
चुनाव का मौसम हो और राजनीतिक पार्टियां लोकलुभावन वादे ना करें, ऐसा बिल्कुल भी नहीं हो सकता है। इसी क्रम में झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों द्वारा लोकलुभावन वादों की झड़ी लगाई जा रही है। इसमें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी पीछे नहीं हैं। उन्होंने पिछले दिनों केबी हाई स्कूल के मैदान में डुमरी विधानसभा क्षेत्र से झामुमो प्रत्याशी मंत्री बेबी देवी के नामांकन सभा को संबोधित करने के दौरान जिस तरह प्रत्येक महिलाओं को प्रति वर्ष एक-एक लाख रुपये देने की घोषणा की, उससे दूसरी पार्टियों के सामने भी चुनौती बढ़ गई है, इसीलिए आने वाले दिनों में और भी राजनीतिक पार्टियां कई घोषणाएं कर सकतीं हैं, लेकिन ये वादे पूरे होंगे या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं लेने वाले हैं। जनता किसके वादों को गंभीरता से लेती है, यह देखना भी काफी महत्वपूर्ण होगा, हालांकि ये कोई नई बात नहीं है।
दरअसल, ये वादे ही राजनीतिक दलों के लिए एक रणनीतिक उपकरण होते हैं, जिनके माध्यम से वे जनता का ध्यान आकर्षित करते हैं। जहां तक देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा सवाल है, उसने अमूमन अपने घोषणा-पत्र में विकास और आर्थिक समृद्धि पर जोर दिया है। लगता है झारखंड में वह इस परिपाटी को दोहराएगी।
भाजपा ने स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने का वादा भी किया है। विशेष योजनाओं के तहत उद्योगों को प्रोत्साहन देने की बात की जा रही है। भाजपा ने महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए भी विशेष योजनाएं लागू करने का वादा किया है। वहीं, किसानों के लिए बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने और कृषि तकनीकों को आधुनिक बनाने का आश्वासन दिया गया है, देखना है वह इसमें कितना सफल हो पाती है। हालांकि, भाजपा के पिछले कार्यकाल में भी ऐसे ही वादे किए गए थे और उनके क्रियान्वयन पर सवाल उठते रहे हैं। इसलिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस बार स्थिति कैसे बदलती है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की तरफ से मुख्यमंत्री महिलाओं को आर्थिक मदद देने की घोषणा कर चुके हैं, इसके अलावा भी उसके पास कई और मुद्दे भी हैं, जिसमें आदिवासी अधिकार और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे शामिल हैं। पार्टी ने आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा का वादा किया है। इसके तहत प्राकृतिक संसाधनों के उचित उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। वहीं, राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार करने का वादा किया है। आदिवासी क्षेत्रों में विशेष योजनाएं लागू करने की बात की गई है।
पिछले कार्यकाल में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कई विकास योजनाएं शुरू की थीं, लेकिन उनका कार्यान्वयन संतोषजनक नहीं रहा, लेकिन इस बार यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह अपने वादों को कैसे पूरा करती है। कांग्रेस भी वादे करने में पीछे नहीं रहती है। सामान्यतौर पर कांग्रेस किसान कल्याण योजनाओं पर फोकस करती है। इसके अलावा महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण पर भी विशेष फोकस करती है, लेकिन इस बार उसकी क्या रणनीति होगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
लोक लुभावन वादों की घोषणा करना चुनावी राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा तो है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये वादे वास्तविकता में बदलेंगे या नहीं। राज्य की आर्थिक स्थिति वादों के क्रियान्वयन में प्रमुख भूमिका निभाती है। अगर, राज्य का राजस्व संग्रहण बढ़ता है, तो योजनाओं को लागू करना संभव हो सकता है, लेकिन अगर, वित्तीय स्थिति कमजोर रहती है, तो वादों को पूरा करना चुनौतीपूर्ण होगा।
राजनीतिक दलों की वास्तविक इच्छाशक्ति भी महत्वपूर्ण है। यदि, वे वास्तव में जनता के लिए काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, तो वे अपने वादों को पूरा करने में सफल हो सकते हैं। लेकिन यदि यह सिर्फ चुनावी रणनीति है, तो परिणाम विपरीत हो सकते हैं। वहीं, जनता की जागरूकता और सक्रियता भी वादों के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण होती है। अगर, जनता सरकार की योजनाओं में सक्रिय रूप से भाग लेती है, तो वादों को पूरा करना संभव हो सकता है। अगर, राजनीतिक दल अपने वादों को पूरा नहीं करते, तो जनता का विश्वास टूट जाएगा और यह भविष्य में उनकी राजनीतिक स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। इस प्रकार, यह चुनाव न केवल वादों का, बल्कि उनके क्रियान्वयन का भी परीक्षण होगा।