मथुरा-काशी से जुड़ी नई मुहीम का आह्वान
-ललित गर्ग-
हिंदू समूहों का दावा है कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मथुरा में श्रीकृष्ण मंदिर और वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर को नष्ट करके उनके ऊपर मस्जिदें बना दीं। इसीलिये विश्व हिंदू परिषद और साधु-संतों ने 1984 में तीन मंदिरों की बात की थी, जिनमें में अयोध्या में श्रीराम मन्दिर बन चुका है। इसके बाद कई लोगों को लगने लगा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व उसके अन्य सहयोगी संगठन इससे संतुष्ट हो चुके हैं और काशी व मथुरा के विषय को जैसे उन्होंने त्याग दिया है या भूला दिया है। लेकिन ऐसा नहीं है, लोकसभा में वक्फ विधेयक के पेश किए जाने से कुछ ही घंटे पहले संघ के सरकार्यवाह एवं महामंत्री दत्तात्रेय होसबाले ने काशी ज्ञानवापी और मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े आंदोलनों-कार्यक्रमों में संघ के स्वयंसेवकों को न रोकने की बात कह कर एक नई मुहीम के आह्वान का अप्रत्यक्ष रूप से संकेत दे दिया है, जिसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। पिछले कुछ समय से इनको लेकर एक ऊहापोह की स्थिति थी, लेकिन संघ के इस मुद्दे पर छाये धुंधलको को हटाते हुए अपने नये बयान से ऊर्जा का संचार किया है। भले ही इससे राजनीति गर्माये, लेकिन हिन्दू आस्था को इससे खुशी मिली है।
संघ की कन्नड़ साप्ताहिक पत्रिका विक्रमा को दिए इंटरव्यू में होसबाले ने साफ कर दिया कि उस समय यानी 1984 में विश्व हिंदू परिषद और साधु-संतों ने तीन मंदिरों की बात की थी। इसलिए अगर संघ के स्वयंसेवक इन मंदिरों के लिए काम करना चाहते हैं, तो हम उनको रोकेंगे नहीं। साफ है, इस बयान के बाद इन मथुरा-काशी दोनों स्थलों से जुड़े विवाद और इनके आंदोलनों को एक नई ऊर्जा, इन मन्दिरों के जीर्णोद्धार, स्वतंत्र अस्तित्व हासिल करने में सफलता मिलेगी। इससे एक बार फिर भाजपा की ताकत बढे़गी एवं हिन्दुओं को एकजुट करने का वातावरण बनेगा। बिहार में कुछ ही माह बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और साल 2027 की शुरुआत में ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे। बिहार एवं उत्तर प्रदेश दोनों ही प्रदेशों में जातिगत गणना और आरक्षण को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिशें हो रही हैं। इन दोनों चुनावों में काशी और मथुरा बड़ा मुद्दा बने, तो कोई आश्चर्य नहीं है। दोनों मन्दिर बिहार से सटे उत्तर प्रदेश के दो छोरों पर स्थित हिंदुओं के दो बड़े पवित्र एवं पावन धर्मस्थल हैं। मथुरा में श्रीकृष्ण मंदिर भगवान कृष्ण के जन्मस्थान के रूप में और वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के रूप में हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण आस्था-स्थल हैं, जहाँ लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए आते हैं। दोनों मंदिर हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और करोड़ो भक्तों को आकर्षित करते हैं, दोनों मंदिर भारतीय संस्कृति और इतिहास का अहम हिस्सा हैं और उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।
काशी में विश्वनाथ और मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर का पुनरुद्धार केवल भौतिक संरचनाओं को पुनर्स्थापित करने का प्रयास नहीं है-यह भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सार को पुनर्जीवित करने एवं आहत हिन्दू आस्था पर मरहम लगाने का आह्वान है। सनातन धर्म की शाश्वत विरासत के प्रतीक ये मंदिर आक्रमणकारियों के सदियों के हमलों के बावजूद हिंदुओं की दृढ़ता और भक्ति के प्रमाण हैं। इन पवित्र स्थलों को पुनः प्राप्त करना हमारे पूर्वजों के बलिदान का सम्मान करने, हमारी विरासत को संरक्षित करने और हमारी समृद्ध परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का कार्य है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदू मंदिरों के बारे में सच्चाई सबके सामने है, लेकिन ये मामले अनसुलझे हैं। ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के ये स्थल लंबी अदालती लड़ाई के बावजूद अभी भी न्याय का इंतजार कर रहे हैं।
दत्तात्रेय होसबले का यह साक्षात्कार महत्वपूर्ण होने के साथ दूरगामी सोच से जुड़ा है। हालांकि, होसबले ने अपने इसी इंटरव्यू में देश की सभी मस्जिदों को मुद्दा बनाने की प्रवृत्ति को सामाजिक ताने-बाने के लिए नुकसानदेह बताकर संतुलन साधने की कोशिश की है। इससे पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग तलाशना सही नहीं है। भले ही पिछले साल दिसंबर में मस्जिदों को लेकर उठ रहे विवाद को शांत करने का उन्होंने यह प्रयास किया था। लेकिन काशी और मथुरा भी उसमें शामिल रहे हो, ऐसा कैसे सोचा जा सकता है? होसबले ने इस साक्षात्कार में गौ हत्या, लव जिहाद और धर्मांतरण जैसी चिंताओं को स्वीकार किया। उन्होंने अस्पृश्यता यानी छुआछूत को खत्म करने, युवाओं में संस्कृति के संरक्षण और देशी भाषाओं की सुरक्षा जैसे समकालीन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया। भाषा नीति पर होसबाले ने त्रिभाषी दृष्टिकोण का समर्थन किया और इसे 95 प्रतिशत भाषाई विवादों का समाधान बताया। उन्होंने भारतीय भाषाओं के संरक्षण और उनमें शिक्षित लोगों के लिए आर्थिक अवसर सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दिया।
होसबोले ने कहा कि लोगों को यह समझना चाहिए कि वैश्विक भूराजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। यदि भारत में हिंदू समाज मजबूत और संगठित नहीं है, तो केवल ‘अखंड भारत’ के बारे में बोलने से परिणाम नहीं मिलेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अतीत की खोज में लगे रहने से समाज अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तनों पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाएगा, जैसे अस्पृश्यता को समाप्त करना, युवाओं में मूल्यों का संचार करना तथा संस्कृति और भाषाओं को संरक्षित करना। निश्चित ही होसबले के बोल से जहां हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की रक्षा को बल मिला है, वहीं राष्ट्रीयता भी मजबूत होती हुई दिख रही है। संघ की स्थापना भी इसी उद्देश्य एवं राष्ट्रवादी आंदोलन को एक मजबूत सांस्कृतिक आधार देने के लिए की गई थी। हमारी सदियों पुरानी प्राचीन सभ्यताएं जो धर्म, अहिंसा और भक्ति के सिद्धांतों पर आधारित थी उपनिवेशवाद के शोर में अपनी आवाज खो न जाये, हिन्दू समाज पर रह-रह हो रहे हमले रूके, हिन्दू एवं सनातन संस्कृति को सलक्ष्य कुचलने के प्रयास विराम पाये-इन जटिल स्थितियों में भारत के लोगों को एक सांस्कृतिक छत्र के नीचे एकजुट करने की दृष्टि से होसबले ने जगाया है, चेताया है, संगठित होने का आह्वान किया है। निश्चित तौर पर इन दोनों मन्दिर मुद्दों को नए सिरे से हवा देने की इस कवायद ने संघ विरोधियों एवं मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों के सामने एक नई गंभीर चुनौती पेश की है। खासकर यह देखते हुए कि अयोध्या की रणनीतिक सफलता ने हिंदुत्व की राजनीति का आधार मजबूत किया है, हिन्दुओं को संगठित किया है।
मंदिर-मस्जिद विवाद के बीच संघ की तरफ से पहले भी कई बयान आते रहे हैं। ये बयान दर्शाते हैं कि संघ भले ही सीधे-सीधे विवाद से खुद को भले ही अलग रखता हो, वैचारिक रूप से वह इनको पूरा समर्थन देता है। संघ का समर्थन देश को अराजक बनाने का कभी नहीं रहा, उसके सामने बड़ा लक्ष्य देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का भी है। बांग्लादेश समेत कई पड़ोसी देशों में भारत-विरोधी शक्तियां नए सिरे से सक्रिय होने लगी हैं, उनसे लड़ने की ताकत एवं रणनीति भी संघ चाहता है। संघ सामंजस्यपूर्ण और संगठित भारत के आदर्श को आकार देने के लिये प्रतिबद्ध है। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति जैसे आंदोलनों ने भारत के सभी वर्गों और क्षेत्रों को सांस्कृतिक रूप से संगठित किया। राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर सीमा सुरक्षा, शासन में सहभागिता से लेकर ग्रामीण विकास तक, राष्ट्रीय जीवन का कोई भी पहलू संघ के स्वयंसेवकों से अछूता नहीं है। सौ वर्षों की संघ यात्रा हिन्दू एकता, विश्व शांति व समृद्धि के साथ सामंजस्यपूर्ण और एकजुट भारत के भविष्य के संकल्प के साथ-साथ काशी-मथुरा के मुद्दे से भी जुड़ी है। हिंदुओं को बचाने और उन्हें सम्मान और गरिमा के साथ देश सेवा में तत्पर करने के लिये उनकी आस्था एवं अस्तित्व पर लगे घावों को तो भरना ही होगा।