राष्ट्र संवाद
मुख्य संवाददाता जमशेदपुर।
बिरसानगर भूमि माफिया प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में है। इस मामले ने न केवल अवैध जमीन कारोबार को दोबारा चर्चा में ला दिया है, बल्कि अधिवक्ता हत्याकांड से जुड़े पुराने संबंधों और कथित राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रकरण के केंद्र में अमूल्यो कर्मकार का नाम फिर उभरकर सामने आया है, जिसे राजनीतिक गलियारों में “पलटू राम” के नाम से जाना जाता रहा है। आरोप है कि जेल से बाहर आने के बाद उसने एक बार फिर अवैध जमीन सौदों में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार, इस बार उसने बस्ती विकास समिति के कुछ हिस्सों को भी अपने पक्ष में कर लिया है।
बताया जा रहा है कि रिश्तेदारों के नाम पर एग्रीमेंट कर सरकारी जमीन का अवैध तरीके से सौदा करना उसकी पुरानी कार्यशैली रही है। बिरसानगर में इसी तरह के कई संदिग्ध जमीन सौदों की चर्चा तेज है। इस पूरे मामले में जमशेदपुर नोटिफाइड एरिया कमेटी (JNAC) और अंचल कार्यालय की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि अधिवक्ता हत्याकांड के आरोपी को जमानत किन आधारों पर मिली और क्या जमानत की शर्तों के बावजूद अवैध गतिविधियों में संलिप्त रहना न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं है?इस पर न्यायालय को संज्ञान लेना चाहिए। साथ ही कथित “सफेदपोश” संरक्षणकर्ताओं की भूमिका की भी जांच की मांग उठ रही है।
कुल मिलाकर, बिरसानगर भूमि माफिया प्रकरण अब जमीन तक सीमित न रहकर राजनीति, अपराध, प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया के आपसी गठजोड़ की ओर इशारा कर रहा है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और जांच एजेंसियां समय रहते सख्त कार्रवाई करती हैं या मामला एक बार फिर फाइलों में दबकर रह जाता है।


