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    यह गर्व की नहीं, बल्कि शर्म की बात है

    Devanand SinghBy Devanand SinghMay 28, 2020No Comments3 Mins Read
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    यह गर्व की नहीं, बल्कि शर्म की बात है

    सुधीर कुमार

    भोजपुरी अभिनेता सह गोरखपुर सांसद रवि किशन का एक डायलॉग बिहारियों पर बिल्कुल सटीक बैठता है – “जिंदगी झंड बा, फिर भी घमंड बा।” और ठीक इसी तर्ज पर, बिहार की एक पुरानी आदत रही है कि यहां कुछ ऐसी बातों पर भी गर्व किया जाता है, जो वास्तव में शर्म की बात है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली चुनाव में गर्व के साथ कहते हैं – “आप सभी प्रवासी भाइयों की वजह से यह महानगर चल रहा है।” जबकि यह किसी भी सरकार के लिये शर्म की बात होनी चाहिये कि वह स्थानीय स्तर पर, मजदूरी तक का काम नहीं उपलब्ध करा पा रही है।

    पिछले हफ्ते दरभंगा की एक लड़की, ज्योति, तथाकथित तौर पर, साईकल द्वारा अपने पिता को 1,2000 किलोमीटर लाने को लेकर सुर्खियों में थी, और निश्चित तौर पर, यह उसके लिए, एक बड़ी निजी उपलब्धि थी, लेकिन उसे “बिहार की बेटी” का तमगा दे रहे नेताओं व मीडिया के संस्थानों से यह पूछा जाना चाहिए कि इसमें गर्व करने लायक क्या था? इसकी जगह वास्तव में उन नेताओं व अधिकारियों पर कार्यवाही होनी चाहिए थी, जिनकी वजह से, उसे इतना मजबूर होना पड़ा। अगर दो-दो राज्य सरकारें मिलकर उसके लिए बस या ट्रेन का इंतजाम नहीं कर पाये, तो इसका जिम्मेदार कौन है? उसकी कहानी पर साईकल फेडरेशन से लेकर इवांका ट्रम्प तक ने संज्ञान लिया, और उसकी पीठ भी थपथपाई, लेकिन अफसोस, दोषियों पर कार्यवाही का जिक्र तक नहीं हुआ।

    बिहार में शिक्षा, मेडिकल व अन्य सरकारी व्यवस्थाएं तार-तार है, लेकिन इन पर कोई सवाल नहीं पूछता। पढ़ने से लेकर नौकरी तक, अगर बिहार का युवा हर चीज के लिए बाहर जाने को मजबूर है, तो इसका कारण क्या है? तकनीकी व अन्य नौकरियों की बात छोड़िए, अधिसंख्यक लोग मात्र 10-12 हजार रुपये के लिए गुजरात, महाराष्ट्र व देश के कोने-कोनों के अलावा, खाड़ी देशों में भी मजदूरी करने के लिए जाते हैं।

    दो दशक पहले, पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की बेटी की शादी में, उनके लोगों द्वारा टाटा मोटर्स के शोरूम से गाडियाँ उठा लेने से जो खौफ फैला था, जिसके बाद शोरूम बंद हो गया था, क्या वह आज भी कायम है? उसके बाद, रंगदारी तथा फैक्ट्री मालिकों को परेशान कर के, उन पर शेयर ट्रांसफर का जो दबाव बनाया जाने लगा, जिसकी वजह से कई फैक्टरियां बंद हुई, अगर उसका असर दो दशक बाद भी खत्म नहीं हुआ, तो इसका जिम्मेदार कौन है? लगातार बंद होते उद्योग धंधों के बीच, नये उद्योग यहां क्यों नहीं लगते, और स्वरोजगार के लिए लोग क्यों नहीं तैयार होते, इसका जबाब भी किसी के पास नहीं है।

    कोरोना संकट के इस काल में, घर लौटे इन प्रवासियों को बिहार सरकार से ये सभी सवाल पूछने चाहिये। लालू यादव के तथाकथित जंगल राज का भय दिखाकर, व जाति-धर्म के समीकरण सेट कर के सत्ता में बने लोगों को अब जनता को बरगलाना छोड़ कर, जमीनी स्तर पर काम करना चाहिये। इस त्रासदी को एक मौके की तरह इस्तेमाल कर के, अगर वापस लौटे लोगों की क्षमता का, अगर स्थानीय स्तर पर सही इस्तेमाल होता है, तो निश्चित तौर पर, राज्य की तकदीर बदल जायेगी, और हमारे पास, वास्तव में गर्व करने लायक मुद्दे रहेंगे।

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