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    Home » जिस देश में जल को जगदीश मानने की परंपरा थी, उस देश में ही आज जलस्त्रोत सर्वाधिक प्रदूषित : केंद्रीय मंत्री शेखावत
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    जिस देश में जल को जगदीश मानने की परंपरा थी, उस देश में ही आज जलस्त्रोत सर्वाधिक प्रदूषित : केंद्रीय मंत्री शेखावत

    Bishan PapolaBy Bishan PapolaDecember 28, 2022No Comments3 Mins Read
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    उज्जैन । केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि जिस देश में जल को जगदीश मानने की परंपरा थी, उस देश में ही आज जलस्त्रोत सर्वाधिक प्रदूषित हैं। हमें अब इस पर विचार करना चाहिए कि वर्ष 2050 में हम अपने लोगों को अन्न और जल की कैसे उपलब्धता करवाएंगे?
    जल की पवित्रता पर भारतीय व देशज विमर्श तैयार करने और इसके वैज्ञानिक पहलुओं को विश्व पटल पर रखने के लिए मप्र जनअभियान परिषद द्वारा आयोजित पंच महाभूतों (आकाश, जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी) को समर्पित तीन दिवसीय सुजलाम कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन मंगलवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के पूर्व सरकार्यवाह भैयाजी जोशी, स्‍वामी अदृश्य कागसिध्‍देश्‍वरजी महाराज द्वारा आम के पेड़ पर 313 नदियों से एकत्रित किए गए जल को अर्पित कर किया गया।
    अपने संबोधन में शेखावत ने कहा कि हमारे देश में संतों ने इस सभ्यता को बचाने के लिए अपना संपूर्ण जीवन दे दिया है। देश में पेड़-पौधों तक की रक्षा के लिए धर्म का बंधन लगाया गया है। हम सब सौभाग्यशाली हैं कि पंचभूतों की अवधारण हमारे देश में विकसित हुई। शेखावत ने कहा कि नमामि गंगे अभियान से मात्र पांच वर्षों में संपूर्ण गंगा नदी के पानी को स्नान योग्य बना दिया गया है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में जल की उपलब्धता निर्बाध रूप से सभी के लिए हो, यह हमारी सबसे बड़ी चुनौती है।
    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि हमने प्रकृति का शोषण कर प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ दिया है। समझदारी के साथ संसाधनों का दोहन करना ही इस सृष्टि की रक्षा करेगा। आज सुजलाम सम्मेलन में जल तत्व के बारे में जो विचार और कार्ययोजना बनेगी, उसी पर प्रदेश सरकार कार्य करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्य प्रदेश की धरती पर हमने जल संरक्षण का प्रयास किया है और विगत वर्षों में चार लाख से अधिक जल संरचनाएं तैयार की गई हैं। प्रदेश की जनअभियान परिषद ने 313 नदियों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है।
    कार्यक्रम में स्वामी कागसिद्धदेश्वर महाराज ने कहा कि पंच महाभूत रहेंगे, तभी जीव का शरीर सुरक्षित रहेगा। जब तक संतुलन स्थापित नहीं होगा, सृष्टि का कार्य सुचारू रूप से नहीं चलेगा। हम पंच महाभूत को ही भगवान मानते आए हैं, लेकिन आज स्थिति बदल गई है। एक किलो अन्न ग्रहण करने पर 27 मिलीग्राम जहर हमारे शरीर में जा रहा है। अलग-अलग प्रकार से मिट्टी प्रदूषित हो रही है। पानी में भी अत्यधिक प्रदूषण फैल गया है।
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघ संचालक भैय्याजी जोशी ने कहा कि पंच महाभूत का उपयोग दुनिया के अन्य देश में नहीं किया जाता है। हमारे यहां के महापुरुषों, संतों ने इस शब्द का उपयोग शक्ति के रूप में किया है। हमारा शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है। पंच महाभूत वैश्विक है। भारतीय चिंतन की विशेषता रही है कि सृष्टि, वन, जड़, चेतन का निर्माण पंच महाभूतों के कारण ही हुआ है। आज हमें पंच महाभूतों के असंतुलन पर विचार क्यों करना पड़ रहा है, यह सोचनीय है।
    कार्यक्रम में अतिथियों ने ‘सुमंगली’ पुस्तक का विमोचन किया। इस पुस्तक का संपादन महर्षि पाणिनी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.विजय कुमार जे और आनन्दीलाल जोशी द्वारा किया गया है। कार्यक्रम में दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा निर्मित जल पर आधारित वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।

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