

स्वर्गीय श्रीमती करतार देवी : संघर्ष, त्याग, मातृत्व और संस्कारों की प्रेरणादायक मिसाल
स्वर्गीय श्रीमती करतार देवी का जीवन संघर्ष, त्याग, साहस, ममता और सामाजिक सरोकारों की एक प्रेरणादायक गाथा रहा है। 89 वर्ष की आयु में उनका निधन आर्टेमिस अस्पताल, गुरुग्राम में हुआ तथा 30 अक्टूबर 2026 को उनके पैतृक गांव सांघी में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके इस तरह दुनिया से चले जाने से परिवार, रिश्तेदारों और परिचितों में गहरी शोक की लहर दौड़ गई है।
श्रीमती करतार देवी का विवाह स्वर्गीय श्री सतबीर सिंह के साथ हुआ था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था; जब वह मात्र 34 वर्ष की थीं, तभी उनके पति का इतनी कम उम्र में साया उनके सिर से उठ गया। जीवन के इस पड़ाव पर जीवनसाथी का साथ छूट जाना किसी भी महिला के लिए वज्रपात जैसा होता है। हालांकि, करतार देवी ने विपरीत परिस्थितियों और दुखों के आगे कभी घुटने नहीं टेके।
अकेले संघर्ष कर बच्चों को बनाया कामयाब
उन्होंने अपने बच्चों के पालन-पोषण, बेहतरीन शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए जीवनभर कड़ा संघर्ष किया। मां और पिता दोनों की दोहरी जिम्मेदारियां निभाते हुए उन्होंने अपनी संतान को उच्च संस्कार दिए और जीवन में हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनका अटूट धैर्य, आत्मसम्मान और लोहे जैसा दृढ़ संकल्प उनके व्यक्तित्व के मजबूत पहलू रहे। इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं।
उनका व्यक्तित्व शिक्षा, संस्कार और सामाजिक संवेदनशीलता का एक अनूठा संगम था। उन्होंने खानपुर गुरुकुल से अपनी शिक्षा प्राप्त की थी। एक संभ्रांत आर्य समाजी परिवार से ताल्लुक रखने वाली करतार देवी हमेशा वैदिक विचारधारा, सादगी, नैतिकता और उच्च मानवीय मूल्यों में गहरी आस्था रखती थीं। वह पेशे से एक सेवानिवृत्त शिक्षिका थीं, इसलिए शिक्षा के प्रति उनका समर्पण और संस्कारों के प्रति उनकी निष्ठा उनके रोजमर्रा के जीवन में साफ झलकती थी।
अपने मिलनसार, दयालु और मिलनसार स्वभाव के कारण वह हर किसी के दिल में बसती थीं। वह हमेशा लोगों के सुख-दुख में बढ़-चढ़कर सहभागी बनती थीं और हर शख्स से आत्मीयता से पेश आती थीं। उनकी सहजता, विनम्रता और दूसरों के दर्द के प्रति संवेदनशीलता ही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी थी।
विभिन्न क्षेत्रों में बच्चों ने लहराया परचम
कठिन संघर्षों के बीच पली-बढ़ी उनकी संतान ने आज समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी मेहनत से उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। उनके सुपुत्र डॉ. सुरेंद्र सिंह हुड्डा, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड, और श्री नरेंद्र हुड्डा, वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय में अपनी यशस्वी सेवाएं दे रहे हैं। वहीं, उनकी सुपुत्री राजबाला हरियाणा अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं। बच्चों की इन तमाम कामयाबियों के पीछे करतार देवी के वर्षों के त्याग, अनुशासन और दिए गए संस्कारों की अहम भूमिका रही है।
अतुलनीय संघर्ष और दृढ़ इच्छाशक्ति की यह दास्तान आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती रहेगी कि चाहे हालात कितने भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि दिल में हौसला हो तो हर मुश्किल को मात दी जा सकती है। उनकी आत्मीय स्मृतियां हमेशा उनके चाहने वालों के दिलों में जिंदा रहेंगी।

