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    रामलीला में अखिलेश की हुंकार, यूपी में गठबंधन की एकता पर सवाल!

    Devanand SinghBy Devanand SinghNovember 2, 2026No Comments3 Mins Read
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    अखिलेश यादव
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    रामलीला में अखिलेश की हुंकार, यूपी में गठबंधन की एकता पर सवाल!

    दिल्ली के रामलीला मैदान से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा के खिलाफ ऐसी हुंकार भरी है, जिसकी असली परीक्षा अब उत्तर प्रदेश में होगी। एक नवंबर को इंडिया गठबंधन की महारैली में विपक्षी नेताओं ने एक मंच पर खड़े होकर चुनावी व्यवस्था और भाजपा की राजनीति पर हमला बोला। अखिलेश ने दावा किया कि 2027 में उत्तर प्रदेश से भाजपा की विदाई होगी। उनके इस बयान ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। मगर सवाल यह है कि जो विपक्ष दिल्ली के रामलीला मैदान में एकजुट दिखाई दिया, क्या वह लखनऊ पहुंचते-पहुंचते भी अपनी एकजुटता बचा पाएगा?

    अखिलेश यादव ने अपने भाषण में उत्तर प्रदेश को बदलाव की राजनीति का केंद्र बताया। उन्होंने रामलीला मैदान को लोकतंत्र की हल्दीघाटी बताते हुए कहा कि परिवर्तन का संदेश यहीं से निकलेगा। भाजपा पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि जिनकी जमीन ही नहीं बची, वे पैर कहां रखेंगे। उनका इशारा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अंगद के पैर वाले बयान की तरफ था। अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम कटने संबंधी बयान को भी राजनीतिक हथियार बनाया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर यह आंकड़ा कहां से आया और इसकी जानकारी किस आधार पर दी गई?

    अखिलेश यादव की राजनीतिक आक्रामकता के पीछे 2024 के लोकसभा चुनाव का परिणाम है। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीती थीं। दोनों दलों का संयुक्त आंकड़ा 43 सीटों तक पहुंच गया था। भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई थी। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उत्तर प्रदेश लंबे समय से भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति का सबसे मजबूत आधार बना हुआ है। अधिक जानकारी के लिए निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर विजिट कर सकते हैं।

    लेकिन 2024 की जीत को 2027 की जीत की गारंटी समझना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे अलग होते हैं। स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, संगठन की सक्रियता और सरकार के कामकाज का असर विधानसभा चुनाव में कहीं अधिक दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं और बहुमत के लिए 202 सीटों की जरूरत होती है। 2022 के चुनाव में भाजपा ने अकेले 255 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। समाजवादी पार्टी 111 सीटों तक पहुंची थी। कांग्रेस को केवल दो सीटें मिली थीं। भाजपा के सहयोगियों को मिलाकर एनडीए की संख्या 273 तक पहुंच गई थी।

    गठबंधन की सबसे कठिन परीक्षा सीटों के बंटवारे में होगी। कांग्रेस 2024 के प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है। पार्टी की नजर उन सीटों पर है जहां उसका पुराना जनाधार और मजबूत उम्मीदवार मौजूद हैं। दूसरी तरफ सपा खुद को प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत मानती है। अखिलेश यादव की राजनीति का सबसे बड़ा आधार पीडीए है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एक राजनीतिक मंच पर लाने की उनकी कोशिश ने 2024 में सपा को बड़ी सफलता दिलाई। मगर 2027 में इस समीकरण को बनाए रखना आसान नहीं होगा। रामलीला मैदान में विपक्ष ने भाजपा के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी है, लेकिन जमीन पर तालमेल और उम्मीदवारों का चयन ही असली परिणाम तय करेगा।

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