Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » विजयदशमी पर विशेष… *रावण बाहर नहीं, हमारे भीतर भी जीवित है*
    Breaking News Headlines उत्तर प्रदेश ओड़िशा खबरें राज्य से गिरिडीह चतरा चाईबासा चांडिल जमशेदपुर जामताड़ा झारखंड पटना पश्चिम बंगाल बिहार बेगूसराय मुंगेर मुजफ्फरपुर मुंबई रांची राष्ट्रीय संथाल परगना संथाल परगना समस्तीपुर सरायकेला-खरसावां साहित्य हजारीबाग

    विजयदशमी पर विशेष… *रावण बाहर नहीं, हमारे भीतर भी जीवित है*

    News DeskBy News DeskOctober 21, 2026No Comments16 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    विजयदशमी पर विशेष…

    *रावण बाहर नहीं, हमारे भीतर भी जीवित है*
    ✍️ डॉ. विनय कुमार वर्मा

    कहते हैं, सतयुग में देवता और राक्षस अलग-अलग लोकों में निवास करते थे। त्रेतायुग आया तो दोनों एक ही संसार में रहने लगे। द्वापर में यह दूरी और सिमट गई तथा देवत्व और आसुरी प्रवृत्तियाँ एक ही परिवार में दिखाई देने लगीं। और जब कलियुग आया, तो दोनों ने अपने निवास के लिए एक ही मनुष्य का हृदय चुन लिया। अब देवता और राक्षस को खोजने के लिए अलग-अलग लोकों, राज्यों या घरों में जाने की आवश्यकता नहीं रही। दोनों हमारे भीतर ही रहने लगे। कभी हमारी करुणा में देवता जाग उठता है, तो कभी हमारे अहंकार में राक्षस सिर उठाने लगता है।
    यह कथन भले ही किसी शास्त्र का प्रमाणित सूत्र न हो, लेकिन मनुष्य के मनोविज्ञान को समझने की दृष्टि से अत्यंत गहरा और विचारोत्तेजक है। सचमुच, आज मनुष्य को पहचानना कितना कठिन हो गया है!
    एक ही व्यक्ति किसी भूखे को भोजन करा सकता है और किसी निर्बल का अधिकार भी छीन सकता है। वही व्यक्ति मंदिर में सिर झुकाता है और घर लौटकर अपने माता-पिता का अपमान कर देता है। वही व्यक्ति सार्वजनिक मंच से नैतिकता का उपदेश देता है और निजी जीवन में अपने स्वार्थ के लिए सारे नैतिक मूल्यों को भुला बैठता है। वही व्यक्ति किसी अनजान की सहायता करके देवत्व का परिचय देता है और अगले ही क्षण क्रोध, ईर्ष्या या अहंकार में किसी अपने का हृदय तोड़ देता है।
    …तो फिर प्रश्न उठता है-मनुष्य वास्तव में है क्या?
    देवता या राक्षस?
    शायद दोनों में से कोई एक नहीं। मनुष्य इन दोनों संभावनाओं के बीच निरंतर चलने वाला संघर्ष है।
    उसके भीतर प्रकाश भी है और अँधेरा भी। प्रेम भी है और घृणा भी। त्याग भी है और लोभ भी। करुणा भी है और क्रूरता भी। विवेक भी है और अहंकार भी।
    यही मनुष्य होने की सबसे बड़ी जटिलता है।
    विजयादशमी इसी जटिलता को समझने का एक अद्भुत अवसर है। आज नगरों के मैदानों में रावण के विशाल पुतले खड़े किए जाते हैं। बाँस, कागज, कपड़े और पटाखों से निर्मित दस सिरों वाला रावण अपने पूरे आकार में दिखाई देता है। बच्चे उत्साहित हैं, परिवारों की भीड़ उमड़ती है, मेले सजते हैं और लोग उस क्षण की प्रतीक्षा करते हैं, जब अग्निबाण लगते ही रावण धू-धूकर जल उठेगा।

    कुछ ही क्षणों में विशाल पुतला राख का ढेर बन जाता है। आकाश में आतिशबाजी होती है। जय श्रीराम के उद्घोष गूँजते हैं। लोग एक-दूसरे को विजयादशमी की शुभकामनाएँ देते हैं और अपने-अपने घर लौट जाते हैं।
    लेकिन इसी उत्सव के बीच एक प्रश्न चुपचाप खड़ा रह जाता है-
    क्या रावण सचमुच जल गया?
    यदि रावण केवल लंका का एक राजा था, तो उसका अंत त्रेतायुग में ही हो चुका। यदि रावण केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र है, तो उसके पुतले का दहन एक सांस्कृतिक स्मृति का निर्वाह है। लेकिन यदि रावण अहंकार, अन्याय, वासना, लोभ, छल और विवेकहीन शक्ति का प्रतीक भी है, तो क्या उसे बाँस और कागज के पुतले में जलाकर समाप्त किया जा सकता है?
    जिस रावण को हम मैदान में जलाते हैं, वह तो कुछ क्षणों में भस्म हो जाता है। लेकिन जो रावण हमारे भीतर बैठा है, वह कई बार पूरे वर्ष जीवित रहता है।
    वह हमारी वाणी में उतर आता है। हमारे व्यवहार में दिखाई देता है। हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है। हमारे संबंधों को घायल करता है। और सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि हम उसे पहचान भी नहीं पाते। क्योंकि बाहर का रावण दस सिरों वाला होता है, जबकि भीतर का रावण हमारे अपने चेहरे के पीछे छिपा रहता है।

    यही विजयादशमी का सबसे गंभीर दार्शनिक प्रश्न है।
    हम हर वर्ष रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन अपने भीतर के अहंकार को कितनी बार अग्नि के हवाले करते हैं? हम अन्याय पर धर्म की विजय का उत्सव मनाते हैं, लेकिन अपने दैनिक जीवन में न्याय के पक्ष में कितनी दृढ़ता से खड़े होते हैं? हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जयघोष करते हैं, लेकिन अपने व्यवहार में मर्यादा का कितना पालन करते हैं?
    रामायण का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उसमें राम और रावण के बीच युद्ध हुआ। उसका महत्व इसलिए भी है कि वह मनुष्य को शक्ति और मर्यादा के बीच अंतर समझाती है।
    रावण साधारण व्यक्ति नहीं था। रामकथा की परंपराओं में उसका वर्णन असाधारण विद्वान, तपस्वी, शिवभक्त और सामर्थ्यवान शासक के रूप में मिलता है। उसके पास ज्ञान था, वैभव था, शक्ति थी और विशाल साम्राज्य था। लेकिन उसकी विद्वत्ता उसके अहंकार को नियंत्रित नहीं कर सकी। उसका सामर्थ्य उसके विवेक की रक्षा नहीं कर सका।

     

    यहीं रावण के चरित्र का सबसे बड़ा संदेश छिपा है।
    ज्ञान होना और ज्ञानी होना अलग-अलग बातें हैं। शक्तिशाली होना और श्रेष्ठ होना भी अलग-अलग बातें हैं।
    ज्ञान जब विनम्रता से अलग हो जाता है, तो अहंकार का उपकरण बन सकता है। शक्ति जब मर्यादा से विमुख हो जाती है, तो अत्याचार में बदल सकती है। और भक्ति जब आचरण को पवित्र नहीं करती, तो वह मनुष्य को अपने दोषों से मुक्त नहीं कर पाती।
    रावण का पतन उसकी शक्तिहीनता से नहीं, उसके विवेक पर अहंकार के अधिकार से हुआ।
    यह बात आज के समाज पर भी उतनी ही लागू होती है।
    हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ मनुष्य ने विज्ञान और तकनीक के माध्यम से असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कर ली हैं। वह अंतरिक्ष तक पहुँच गया है। महासागरों की गहराइयों का अध्ययन कर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित कर रहा है। संसार के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से क्षणभर में संवाद कर सकता है।
    लेकिन क्या इन उपलब्धियों के अनुपात में उसका हृदय भी विशाल हुआ है?
    क्या तकनीकी प्रगति ने उसके भीतर की ईर्ष्या कम कर दी है?
    क्या शिक्षा ने उसके अहंकार को पूरी तरह समाप्त कर दिया है?
    क्या संपन्नता ने उसे अधिक उदार बना दिया है?
    उत्तर सरल नहीं है।
    आज भी मनुष्य अपनी सफलता के मद में दूसरों का अपमान करता है। अधिकार मिलने पर कभी-कभी अपने ही लोगों को तुच्छ समझने लगता है। धन प्राप्त होते ही संबंधों की कीमत लगाने लगता है। विचारों में मतभेद होने पर सामने वाले को शत्रु मान बैठता है।
    यही वह क्षण है, जब भीतर का रावण जाग उठता है।
    लेकिन यहाँ एक और सावधानी आवश्यक है।
    हम किसी व्यक्ति को केवल उसके चेहरे, वेशभूषा, धर्म, जाति, भाषा या सामाजिक पहचान से राम अथवा रावण नहीं कह सकते।
    कभी अत्यंत सौम्य दिखने वाला व्यक्ति क्रूर आचरण कर बैठता है और कभी कठोर व्यक्तित्व वाला मनुष्य किसी असहाय के लिए अप्रत्याशित करुणा का स्रोत बन जाता है।
    किसी के माथे पर तिलक है, इससे उसके आचरण की श्रेष्ठता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती। किसी के बाहरी रूप में धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, इससे उसकी मनुष्यता कम नहीं हो जाती।
    मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके वस्त्रों में नहीं, उसके कर्मों में है।
    राम जैसा दिखाई देना पर्याप्त नहीं; राम जैसे आचरण की साधना आवश्यक है।
    और रावण जैसी बाहरी छवि बना देने से किसी व्यक्ति के भीतर की करुणा या सद्गुण समाप्त नहीं हो जाते।
    वास्तव में राम और रावण को केवल दो व्यक्तियों के रूप में देखना इस महान कथा के नैतिक विस्तार को सीमित कर देना होगा। इन्हें मनुष्य के भीतर उपस्थित दो विपरीत प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में भी समझा जा सकता है।
    जब हम सत्य के पक्ष में खड़े होते हैं, तब हमारे भीतर रामत्व प्रकट होता है। जब हम किसी निर्बल की रक्षा करते हैं, तब रामत्व जागता है। जब हम अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी स्वीकार करते हैं, तब रामत्व का विस्तार होता है।
    और जब हम स्वार्थ के लिए किसी का अपमान करते हैं, छल का सहारा लेते हैं, दूसरे के अधिकार का हनन करते हैं या अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हैं, तब हमारे भीतर की आसुरी प्रवृत्ति सक्रिय हो उठती है।

     

    इसीलिए विजयादशमी का वास्तविक संघर्ष किसी दूसरे मनुष्य को रावण सिद्ध करने का संघर्ष नहीं है। वह स्वयं को पहचानने का संघर्ष है।
    हम दूसरों की कमियाँ कितनी आसानी से देख लेते हैं! किसी की छोटी-सी भूल पर टिप्पणी कर देते हैं। किसी के व्यवहार में अहंकार खोज लेते हैं। किसी की सफलता में स्वार्थ और किसी की असफलता में उसकी कमजोरी ढूँढ़ लेते हैं। लेकिन जब वही दोष हमारे भीतर उपस्थित होते हैं, तो हम उनके लिए तर्क खोजने लगते हैं। दूसरे का क्रोध हमें दुर्व्यवहार दिखाई देता है, अपना क्रोध आत्मसम्मान की रक्षा लगने लगता है। दूसरे का लोभ हमें अनैतिकता लगता है, अपना लोभ भविष्य की सुरक्षा बन जाता है। दूसरे का अहंकार हमें असहनीय लगता है, अपना अहंकार व्यक्तित्व की दृढ़ता प्रतीत होता है। दूसरे का पक्षपात अन्याय है, लेकिन अपना पक्षपात संबंध निभाने की विवशता बन जाता है। यही आत्मप्रवंचना भीतर के रावण को सबसे अधिक शक्ति प्रदान करती है।
    क्योंकि जिस दोष को हम दोष मानने से ही इनकार कर दें, उससे मुक्ति का मार्ग कैसे निकलेगा?
    भारतीय दर्शन में मनुष्य के भीतर सत्त्व, रजस् और तमस्- इन तीन गुणों की चर्चा मिलती है। सत्त्व प्रकाश, संतुलन और विवेक की ओर ले जाता है; रजस् सक्रियता, इच्छा और आसक्ति से जुड़ा है; जबकि तमस् अज्ञान, जड़ता और मोह का प्रतीक है। ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य के भीतर अलग-अलग अनुपात में सक्रिय रहती हैं। कोई भी व्यक्ति हर क्षण एक ही मानसिक अवस्था में नहीं रहता।
    कभी हमारा विवेक प्रबल होता है, कभी इच्छाएँ हमें विचलित करती हैं और कभी अज्ञान हमारे निर्णयों पर छा जाता है।
    इस दृष्टि से भीतर के रावण को जलाने का अर्थ अपने अस्तित्व को नष्ट करना नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों पर नियंत्रण प्राप्त करना है, जो हमें अन्याय और अमानवीयता की ओर ले जाती हैं। क्रोध स्वयं में हमेशा अनर्थकारी नहीं होता। अन्याय देखकर उत्पन्न नैतिक आक्रोश परिवर्तन का कारण भी बन सकता है। लेकिन वही क्रोध जब विवेक खो देता है, तब हिंसा और प्रतिशोध में बदल जाता है।
    इच्छा जीवन को आगे बढ़ाती है, लेकिन अनियंत्रित इच्छा लोभ बन जाती है।
    आत्मसम्मान मनुष्य की गरिमा है, लेकिन वही जब दूसरों को तुच्छ समझने लगे, तो अहंकार बन जाता है।
    इसलिए वास्तविक साधना भावनाओं को समाप्त करना नहीं, उन्हें विवेक और मर्यादा के अधीन रखना है।
    रामत्व इसी संतुलन की साधना है।
    विजयादशमी के अवसर पर एक प्रश्न हमारे पारिवारिक जीवन से भी जुड़ता है। हम अपने बच्चों को राम और रावण की कथा सुनाते हैं। उन्हें बताते हैं कि अंततः सत्य की विजय होती है। लेकिन बच्चे केवल कथाओं से नहीं सीखते; वे हमारे आचरण को भी पढ़ते हैं।
    यदि पिता बच्चे को सत्य बोलने की शिक्षा दे और स्वयं सुविधा के लिए झूठ बोलता रहे, तो बच्चा किसे आदर्श मानेगा?
    यदि घर में देवी की पूजा हो, लेकिन उसी घर की महिलाओं के सम्मान की उपेक्षा की जाए, तो पूजा का नैतिक संदेश कितना प्रभावी होगा?
    यदि हम बच्चों को करुणा सिखाएँ, लेकिन अपने कर्मचारियों, सहयोगियों या कमजोर लोगों के साथ अपमानजनक व्यवहार करें, तो वे हमारे शब्दों पर विश्वास कैसे करेंगे?
    बच्चों के सामने राम का चरित्र प्रस्तुत करने का सबसे प्रभावशाली तरीका केवल रामायण सुनाना नहीं, अपने जीवन में मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत करना भी है। क्योंकि संस्कार भाषणों से कम और व्यवहार से अधिक उतरते हैं।
    समाज के सार्वजनिक जीवन में भी यही प्रश्न उपस्थित होता है। सत्ता, प्रतिष्ठा और अधिकार प्राप्त करने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक नैतिक परीक्षा से गुजरता है। शक्ति का वास्तविक सौंदर्य इस बात में नहीं कि वह कितनों को झुका सकती है, बल्कि इस बात में है कि वह कितनों की रक्षा कर सकती है।
    जिसके पास अधिकार है, वह यदि उसका उपयोग दूसरों को भयभीत करने में करता है, तो उसके भीतर अहंकार बढ़ रहा है। लेकिन वही अधिकार यदि न्याय, सुरक्षा और लोककल्याण का माध्यम बनता है, तो उसमें मर्यादा का प्रकाश दिखाई देता है। यह सिद्धांत किसी एक राजनीतिक दल, धर्म, संस्था या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह हर उस मनुष्य पर लागू होता है, जिसके हाथ में किसी दूसरे के जीवन को प्रभावित करने की क्षमता है।
    एक शिक्षक के भीतर भी राम और रावण की संभावनाएँ हैं। वह अपने ज्ञान से विद्यार्थी का भविष्य सँवार सकता है और अपने अपमानजनक व्यवहार से उसका आत्मविश्वास भी तोड़ सकता है।
    एक व्यापारी ईमानदारी से समाज की आवश्यकताएँ पूरी कर सकता है और लोभ में पड़कर दूसरों का शोषण भी कर सकता है।
    एक अधिकारी अपने पद को सेवा का माध्यम बना सकता है अथवा अहंकार का सिंहासन।
    यहाँ तक कि एक साधारण मनुष्य भी अपने छोटे-छोटे व्यवहारों में प्रतिदिन इन दोनों प्रवृत्तियों के बीच चुनाव करता रहता है।
    इसलिए रामत्व किसी विशेष पद की उपलब्धि नहीं और रावणत्व किसी विशेष वर्ग की पहचान नहीं।
    दोनों मनुष्य के आचरण की संभावनाएँ हैं।
    विजयादशमी का सबसे सुंदर अर्थ शायद इसी दैनिक चुनाव में छिपा है।
    हर सुबह हमारे सामने एक नया अवसर आता है। हम चाहें तो किसी से मधुर व्यवहार कर सकते हैं, चाहें तो कटुता फैला सकते हैं। हम चाहें तो किसी की सफलता पर प्रसन्न हो सकते हैं, चाहें तो ईर्ष्या में जल सकते हैं। हम चाहें तो अपनी भूल स्वीकार कर सकते हैं, चाहें तो उसे छिपाने के लिए अनेक असत्य गढ़ सकते हैं।
    यही छोटे-छोटे निर्णय धीरे-धीरे हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं।
    और चरित्र किसी एक दिन की विजय नहीं, जीवनभर की साधना है। इसीलिए केवल वर्ष में एक बार रावण का पुतला जलाना पर्याप्त नहीं हो सकता।
    यदि विजयादशमी वास्तव में हमारे भीतर उतरनी है, तो हमें प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा आत्ममंथन करना होगा।
    आज मैंने किसका अपमान किया?
    किसकी पीड़ा को अनदेखा किया?
    कहाँ मेरे अहंकार ने मेरे विवेक को पराजित किया?
    किस अवसर पर मैंने सत्य जानते हुए भी मौन रहना उचित समझा?
    और कहाँ मैंने अपने स्वार्थ के कारण किसी दूसरे के अधिकार की उपेक्षा की?
    ये प्रश्न सरल दिखाई देते हैं, लेकिन इनके उत्तर देना कठिन है। क्योंकि संसार के सामने स्वयं को निर्दोष सिद्ध करना आसान है, अपने अंतःकरण के सामने स्वयं को परखना कठिन।
    हमारे भीतर का रावण दूसरों के आरोपों से उतना नहीं डरता, जितना हमारी ईमानदार आत्मस्वीकृति से डरता है। जिस दिन मनुष्य अपनी भूल स्वीकार कर लेता है, उसी दिन उसके भीतर परिवर्तन का पहला दीपक जल उठता है।
    वास्तव में राम और रावण का युद्ध केवल अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान की नैतिक चुनौती भी है।
    यह युद्ध हमारे भीतर तब चलता है, जब लाभ और न्याय में से किसी एक को चुनना होता है।
    जब प्रतिशोध और क्षमा में से किसी एक का निर्णय करना होता है।
    जब अहंकार और विनम्रता आमने-सामने खड़े होते हैं।
    जब सुविधा और सत्य के रास्ते अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं।
    इन क्षणों में कोई बाहरी सेना हमारी सहायता नहीं कर सकती। न कोई विशाल धनुष दिखाई देता है, न कोई युद्धभूमि सजती है। केवल हमारा अंतःकरण होता है और उसके सामने खड़ा हमारा निर्णय। यही मनुष्य के जीवन की वास्तविक लंका है। और यही उसके भीतर की वास्तविक विजयादशमी भी। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य पूर्ण नहीं होता। उसके भीतर दुर्बलताएँ होती हैं। वह गलतियाँ करता है, कभी भटकता है और कभी अपने ही आदर्शों से दूर चला जाता है। लेकिन मनुष्य की महानता इस बात में नहीं कि उससे कभी भूल न हो; महानता इस बात में है कि वह अपनी भूल को पहचानकर स्वयं को सुधारने का साहस रखे।
    जो व्यक्ति अपने भीतर के अँधेरे को स्वीकार कर सकता है, वही प्रकाश की ओर ईमानदारी से बढ़ सकता है।
    जो स्वयं को हर समय राम मानकर चलता है, उसके भीतर छिपे रावण को पहचानना कठिन हो जाता है।
    और जो अपने भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों को पहचान लेता है, उसके लिए रामत्व की साधना संभव हो जाती है। यही आत्मज्ञान का आरंभ है।
    आज जब विजयादशमी के अवसर पर रावण के पुतले अग्नि को समर्पित किए जाएँ, तो उस दृश्य को केवल उत्सव की समाप्ति मत समझिए। उसे अपने भीतर झाँकने का निमंत्रण भी मानिए। उस अग्नि की लौ में अपने क्रोध को पहचानिए। उसके प्रकाश में अपने अहंकार को देखिए।
    उसकी तपिश में अपने लोभ, ईर्ष्या, छल और अन्यायपूर्ण प्रवृत्तियों का परीक्षण कीजिए। और स्वयं से पूछिए- जिस रावण को मैं बाहर जला रहा हूँ, क्या उसके किसी अंश को अपने भीतर भी संरक्षण दे रहा हूँ?
    यदि उत्तर हाँ है, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं। यही स्वीकारोक्ति परिवर्तन की शुरुआत है।
    विजयादशमी का संदेश मनुष्य को अपराधबोध में डुबोना नहीं, उसके भीतर नैतिक साहस जगाना है।
    राम की विजय का उत्सव तभी अधिक सार्थक होगा, जब हम अपने जीवन में सत्य, करुणा, संयम, न्याय और मर्यादा को थोड़ा और स्थान देंगे।
    क्योंकि संसार को केवल रावण के पुतले जलाने वाले लोगों की आवश्यकता नहीं है। उसे ऐसे मनुष्यों की आवश्यकता है, जो अपने भीतर के अहंकार को नियंत्रित कर सकें, दूसरों की गरिमा का सम्मान कर सकें और शक्ति प्राप्त होने पर भी विनम्र बने रहें।
    इसलिए प्रश्न यह नहीं कि रावण कितना बड़ा था।
    प्रश्न यह है कि हमारे भीतर का अहंकार कितना बड़ा है।
    प्रश्न यह नहीं कि राम ने कितने बाण चलाए।
    प्रश्न यह है कि हम अपने भीतर के अज्ञान पर विवेक का कितना प्रकाश डाल सके।
    प्रश्न यह भी नहीं कि आज कितने पुतले जलाए गए।
    सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आज कितने मनुष्यों ने अपने भीतर की किसी बुराई को छोड़ने का संकल्प लिया।
    शायद इसी संकल्प में विजयादशमी की वास्तविक विजय छिपी है।
    बाहर का रावण अग्नि से जलता है, लेकिन भीतर का रावण आत्मबोध से कमजोर पड़ता है। बाहर के रावण को एक बाण पर्याप्त हो सकता है, लेकिन भीतर के रावण पर प्रतिदिन विवेक, संयम और सदाचार के बाण चलाने पड़ते हैं।
    बाहर के रावण का दहन एक उत्सव है।
    भीतर के रावण का दमन एक साधना है।
    और यह साधना किसी एक दिन की नहीं, पूरे जीवन की है।
    जिस दिन हम दूसरे के भीतर रावण खोजने से पहले अपने भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों को पहचानने लगेंगे, उसी दिन विजयादशमी केवल कैलेंडर का पर्व नहीं रहेगी; वह हमारे चरित्र का उत्सव बन जाएगी।
    क्योंकि राम और रावण का सबसे निर्णायक युद्ध किसी दूर देश की रणभूमि में नहीं, आज भी मनुष्य के अंतःकरण में लड़ा जा रहा है। और इस युद्ध में विजय का अर्थ किसी दूसरे को पराजित करना नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर मनुष्य बना लेना है।
    रावण के पुतले तो हर वर्ष जलते रहेंगे…
    लेकिन जिस दिन हमारे भीतर का अहंकार जलेगा, उसी दिन हमारे जीवन में सचमुच रामराज्य की पहली किरण उतरेगी।
    🙏
    *डॉ. विनय कुमार वर्मा*
    (9838851004)

    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleजानिए आपके सितारे क्या बोलते हैं
    Next Article मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने कसमार-बरलंगा निर्माणाधीन मुख्य सड़क का किया निरीक्षण, निर्माण कार्य की प्रगति एवं गुणवत्ता का लिया जायजा

    Related Posts

    पार्किंग व्यवस्था को लेकर ट्रैफिक पुलिस से क्यों उलझे विपिन झा? वाहन मालिकों का दर्द समझना भी जरूरी

    October 21, 2026

    वंदे मातरम् के पूर्ण गायन में कोई झिझक या आपत्ति नहीं होनी चाहिए: मोहन भागवत

    October 21, 2026

    राष्ट्रपति मुर्मू, प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में अलग-अलग स्थानों पर दशहरा उत्सव में हिस्सा लिया

    October 21, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    पार्किंग व्यवस्था को लेकर ट्रैफिक पुलिस से क्यों उलझे विपिन झा? वाहन मालिकों का दर्द समझना भी जरूरी

    वंदे मातरम् के पूर्ण गायन में कोई झिझक या आपत्ति नहीं होनी चाहिए: मोहन भागवत

    राष्ट्रपति मुर्मू, प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में अलग-अलग स्थानों पर दशहरा उत्सव में हिस्सा लिया

    राष्ट्र हित में सभी संस्थाओं और राजनीतिक दलों को एकजुट होना चाहिए: मोदी

    कोलकाता भगदड़: मुख्यमंत्री ने पांच पीड़ित परिवारों को अनुग्रह राशि सौंपी, विपक्ष पर निशाना साधा

    भारत-अमेरिका व्यापार समझौता होने के करीब, वाशिंगटन से ऊर्जा और रक्षा खरीद बढ़ाए भारत:रूबियो

    शाह ने मान पर मादक पदार्थ की समस्या को लेकर गंभीर नहीं होने का आरोप लगाया

    मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने कसमार-बरलंगा निर्माणाधीन मुख्य सड़क का किया निरीक्षण, निर्माण कार्य की प्रगति एवं गुणवत्ता का लिया जायजा

    विजयदशमी पर विशेष… *रावण बाहर नहीं, हमारे भीतर भी जीवित है*

    जानिए आपके सितारे क्या बोलते हैं

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.