कांशीराम की विरासत और बसपा की मौजूदा चुनौती
कांशीराम की विरासत के सामने बसपा की सियासी चुनौती
जेपी गुप्ता, राष्ट्र संवाद संवाददाता | लखनऊ। बहुजन राजनीति के प्रमुख शिल्पकार कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि पर बसपा के सामने उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती है। कांशीराम ने दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों को संगठित कर सत्ता में भागीदारी का लक्ष्य दिया था। इसी सामाजिक आधार और संगठनात्मक ताकत के बूते बसपा ने उत्तर प्रदेश में मजबूत राजनीतिक प्रभाव बनाया और 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।
हालांकि मौजूदा दौर में पार्टी का पारंपरिक सामाजिक आधार पहले जैसी चुनावी ताकत में तब्दील नहीं हो पा रहा है। नेतृत्व का केंद्रीकरण, जमीनी संगठन की कमजोरी, कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी और बदलते सामाजिक समीकरण बसपा के सामने प्रमुख चुनौतियां हैं। भाजपा, सपा और कांग्रेस की दलित मतदाताओं में बढ़ती पहुंच ने भी बसपा के प्रभाव को प्रभावित किया है।
इसके बावजूद कांशीराम की विरासत, दलित समाज में बसपा की ऐतिहासिक पहचान और मायावती की राजनीतिक स्वीकार्यता पार्टी के लिए आधार बने हुए हैं। बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने, नए नेतृत्व को अवसर देने और युवाओं व वंचित वर्गों से संवाद बढ़ाने से पार्टी के पुनरुत्थान की संभावनाएं बनी हुई हैं।
बॉक्स | कांशीराम की पुण्यतिथि पर मायावती का कार्यक्रम
लखनऊ। बसपा संस्थापक कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि 9 अक्टूबर को पार्टी श्रद्धापूर्वक मनाएगी। बसपा प्रमुख मायावती सुबह 9 बजे 9, मॉल एवेन्यू स्थित बीएसपी केंद्रीय कैंप कार्यालय में कांशीराम को श्रद्धासुमन अर्पित करेंगी। इस दौरान पार्टी के प्रमुख नेता भी उन्हें श्रद्धांजलि देंगे। पुण्यतिथि बसपा के लिए श्रद्धांजलि के साथ-साथ संगठन और राजनीतिक दिशा पर आत्ममंथन का अवसर भी मानी जा रही है।

