लेखक: निशिकांत ठाकुर
देश में पेपर लीक की बढ़ती घटनाओं ने युवाओं के भविष्य को अंधकारमय बना दिया है, जिससे आक्रोशित छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
कहते हैं, महान बनने के लिए विशाल कद-काठी की आवश्यकता नहीं होती। महानता शरीर के आकार से नहीं, विचारों की ऊंचाई और संकल्प की दृढ़ता से पैदा होती है। महात्मा गांधी इसके सबसे विराट उदाहरण हैं। गांधीजी कहा करते थे—“मेरे साथ चलना है तो स्वयं का पूरा घर फूंककर तमाशा देखने के लिए तैयार रहना होगा।” उनके साथ चलने वालों को खुले आकाश के नीचे सोने, मोटा खद्दर पहनने, भोर में उठने, सादा और नीरस भोजन करने तथा अपने हाथों से अपनी गंदगी साफ करने के लिए तैयार रहना पड़ता था।
क्या संसार में ऐसा असाधारण व्यक्तित्व दूसरा कोई हुआ है?
गांधीजी ने यह सब अपने लिए नहीं किया था। वे वर्षों जेल में अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं रहे। उन्होंने पश्चिमी वस्त्रों का परित्याग किसी व्यक्तिगत प्रदर्शन के लिए नहीं किया। तीसरे दर्जे के रेल डिब्बे में आम भारतीय की तरह पूरे देश की यात्रा उन्होंने लोकप्रियता अर्जित करने के लिए नहीं की। उनके जीवन का एक-एक त्याग देश के लिए था, आने वाली पीढ़ियों के लिए था और भारत के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए था।
इस रास्ते में उन्हें अपने देशवासियों और अंग्रेजों की असंख्य कटु आलोचनाओं, अपमानों और उपेक्षाओं का सामना करना पड़ा। यहां तक कि लॉर्ड वेवेल जैसे व्यक्ति ने भी गांधीजी को एक “दुष्ट प्रकृति का बूढ़ा राजनीतिज्ञ” मानते हुए उन्हें अत्यंत काइयां, जिद्दी, धौंस देने वाला और दोहरी बातें करने वाला व्यक्ति बताया था। अंग्रेजों की यह घृणा स्वाभाविक भी थी, क्योंकि गांधी उस साम्राज्य की जड़ों को हिला रहे थे, जिसे भारत से उखाड़ फेंकने का संकल्प उन्होंने ले रखा था।
गांधी के बाद कौन?
अब वर्तमान परिस्थितियों का आकलन करें। आजादी के बाद, या यूं कहें कि गांधीजी के बाद, हम दूसरी पंक्ति का ऐसा कोई नेतृत्व विकसित नहीं कर सके, जिसे देश अपना नैतिक अगुवा मान सके और जो गांधी की तरह निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर समाज तथा राष्ट्र के लिए स्वयं को समर्पित कर सके।
घटनाक्रम को थोड़ा पीछे ले जाकर देखें तो पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का आंदोलन केवल एक परीक्षा व्यवस्था की विफलता के खिलाफ आक्रोश नहीं था। उसके भीतर बेरोजगारी, भविष्य की अनिश्चितता और व्यवस्था के प्रति लगातार टूटते भरोसे की पीड़ा भी थी। सरकार की ओर से संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा की जांच को दिल्ली दंगों की तर्ज पर किए जाने की बात कही जा रही है। लेकिन क्या इस पूरे घटनाक्रम को केवल हिंसा और कानून-व्यवस्था के चश्मे से देखना पर्याप्त होगा?
सच यह है कि आक्रोशित युवा केवल प्रश्नपत्र लीक होने से नाराज नहीं थे। पेपर लीक तो उस गहरे असंतोष की एक अभिव्यक्ति भर था, जिसकी जड़ें बेरोजगारी और अवसरों की कमी में कहीं अधिक गहरी हैं।
उन छात्रों और उनके अभिभावकों की पीड़ा को समझने की जरूरत है। वे कहते हैं—किसी तरह कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, उम्मीद थी कि पढ़ाई पूरी करने के बाद बच्चे अपने पैरों पर खड़े होंगे। लेकिन वर्ष बीतते जा रहे हैं और रोजगार का कोई स्थायी रास्ता दिखाई नहीं देता। जिन परिवारों ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपनी वर्तमान खुशियां कुर्बान कर दीं, वे आज खुद आर्थिक संकट में फंसे हैं। सवाल यह है कि यदि बच्चों को रोजगार नहीं मिला तो शिक्षा के लिए लिया गया कर्ज कौन चुकाएगा? गिरवी रखी जमीन कैसे छूटेगी? और जब परिवार के पास देने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं, तब इन युवाओं की आवाज कौन सुनेगा?
यही वह प्रश्न है जिसे सत्ता को संवेदनशीलता के साथ सुनना होगा।
देश के जाने-माने सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी जेन-जी के आंदोलन को लेकर राज्यसभा में सवाल उठाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी नई पीढ़ी के सवालों और उसके असंतोष को समझने के लिए संवाद की आवश्यकता पर बल दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कानून-व्यवस्था से जुड़ी एजेंसियों को यह संदेश दिया है कि जब युवा प्रदर्शन कर रहे हों, तो प्रशासन और पुलिस को पहले यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि उनके भीतर आक्रोश पैदा क्यों हुआ है। लोकतंत्र में पुलिस की शक्ति का इस्तेमाल नागरिकों की आवाज दबाने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन कायम करने के लिए होना चाहिए।
युवाओं की आवाज आखिर सुनेगा कौन?
क्या हमारे लोकतंत्र में अपनी बात कहने, अपना दुखड़ा सुनाने और अपनी पीड़ा व्यक्त करने की कीमत किसी युवा को अपना भविष्य दांव पर लगाकर चुकानी होगी?
यदि देश का युवा अपनी शिकायत लेकर सरकार के पास नहीं जाएगा, तो आखिर कहां जाएगा?
आज छात्रों के इस आंदोलन को लेकर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। यह प्रचारित किया जा रहा है कि छात्रों की भीड़ में आतंकी तत्व घुस आए थे, जिन्होंने उपद्रव किया और छात्रों तथा सुरक्षाकर्मियों के साथ बदसलूकी की। यह भी कहा जा रहा है कि आंदोलन का उद्देश्य केवल शिक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग नहीं, बल्कि सरकार को अस्थिर करना और उसे राजनीतिक रूप से नीचा दिखाना था।
दूसरी ओर, पुलिस दिल्ली दंगों से जुड़े अनुभवों और उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर मामले की गहन जांच कर रही है। विभिन्न व्यक्तियों, राजनेताओं और कार्यकर्ताओं की सीडीआर, इंटरनेट मीडिया गतिविधियों और सीसीटीवी फुटेज की जांच की जा रही है। सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर वीडियो प्रसारित करने वालों की गतिविधियों का भी विश्लेषण किया जा रहा है। जांच एजेंसियों का उद्देश्य यदि षड्यंत्र की कोई कड़ी सामने आती है तो उसके आधार पर साक्ष्य-समर्थित आरोपपत्र दाखिल करना और दोषियों को कानून के कठघरे तक पहुंचाना है।
लेकिन जांच और दंड अपनी जगह हैं। उससे पहले एक बड़ा सवाल है—क्या हम उस बेचैनी की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, जिसने हजारों युवाओं को सड़क पर उतरने के लिए विवश किया?
शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही कौन तय करेगा?
काश, शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने समय रहते यह समझ लिया होता कि शिक्षा जैसे संवेदनशील और व्यापक मंत्रालय को केवल प्रशासनिक आदेशों से नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, जवाबदेही और दूरदर्शिता से चलाया जाता है। भारत में शिक्षा को आदिकाल से ज्ञान, विवेक और चरित्र निर्माण का आधार माना गया है। ऐसे में यदि व्यवस्था योग्य और अयोग्य के बीच फर्क करने में विफल हो जाए, तो यह केवल परीक्षा प्रणाली की समस्या नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज के भविष्य का प्रश्न बन जाती है।
क्या किसी सरकार का अहंकार इतना बड़ा हो सकता है कि वह केवल इस धारणा को बचाए रखने के लिए कि उसकी पार्टी में इस्तीफे की परंपरा नहीं है, अपनी शिक्षा व्यवस्था को संकट में जाने दे?
हालांकि यह भी सच है कि इस आंदोलन ने सरकार को यह संकेत अवश्य दे दिया कि यदि जनता और युवा सड़क पर उतर आएं, तो सत्ता के सारे राजनीतिक सिद्धांत और दावे उस जनाक्रोश के सामने बौने पड़ सकते हैं।
अब प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद पेपर लीक की घटनाओं पर रोक लगाने और पहले से सामने आए मामलों की जांच के लिए विशेषज्ञों का टास्क फोर्स गठित किया गया है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल कानून, समितियां और टास्क फोर्स पेपर लीक जैसी बीमारी का स्थायी इलाज कर पाएंगे?
कठोर कानून बनाना आवश्यक है, लेकिन कानून तभी प्रभावी होता है जब उसका भय अपराधी के मन में हो और व्यवस्था उसके निष्पक्ष तथा त्वरित क्रियान्वयन की गारंटी दे।
पेपर लीक और युवाओं का आक्रोश
पेपर लीक की घटनाओं को रोकने के लिए सार्वजनिक परीक्षा कानून में कड़े प्रावधान किए गए हैं। व्यक्तिगत अपराधियों के लिए जेल की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। संगठित रूप से पेपर लीक करने वाले गिरोहों के लिए कठोर आर्थिक दंड की व्यवस्था की गई है। परीक्षा आयोजित करने वाली दोषी एजेंसियों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। मामलों की शीघ्र सुनवाई और समयबद्ध निर्णय के लिए विशेष अदालतों की व्यवस्था की जा रही है।
लेकिन कानून का कठोर होना पर्याप्त नहीं है। व्यवस्था का ईमानदार, पारदर्शी और प्रभावी होना उससे भी अधिक जरूरी है।
चोट के बाद दर्द का एहसास
पेपर लीक के मामले में प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक चिंता व्यक्त कर चुके हैं। संदेश स्पष्ट है—प्रश्नपत्र लीक करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए।
दरअसल, किसी भी व्यवस्था में बड़ी चूक के बाद हम अक्सर यही करते हैं—पहले चोट लगती है, फिर दर्द का अहसास होता है। उसके बाद यह शोध शुरू होता है कि आखिर गलती कहां हुई, किस स्तर पर चूक हुई और भविष्य में ऐसी घटना को कैसे रोका जाए। लेकिन एक जिम्मेदार शासन व्यवस्था की पहचान यह है कि वह केवल हादसे के बाद सबक न सीखे, बल्कि संभावित संकट को पहले ही पहचान ले।
राष्ट्र के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों से इसी दूरदर्शिता की अपेक्षा की जाती है।
गांधीजी की सबसे बड़ी शक्ति उनका नैतिक साहस और दूरदर्शिता थी। वे केवल अपने समय को नहीं देखते थे; वे उस भारत को देखते थे, जो उनके बाद आने वाला था। यही कारण है कि उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
आज आवश्यकता इसी बात की है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर झांकने का साहस पैदा करे। वह यह समझे कि सत्ता, पद और प्रतिष्ठा स्थायी नहीं हैं। स्थायी है तो केवल आपका आचरण, आपकी नीयत और समाज के प्रति आपकी जवाबदेही।
यदि हम सार्वजनिक जीवन में हैं, तो हमें जनता के बीच सहज और सुलभ होना ही होगा। पारदर्शी होना होगा। सत्य के अतिरिक्त किसी अन्य पक्ष का अंध-समर्थक बनने से बचना होगा। आलोचना को शत्रुता नहीं, आत्ममंथन का अवसर समझना होगा।
गांधीजी इसलिए महान नहीं हुए कि उन्होंने केवल भाषण दिए। वे इसलिए महान हुए क्योंकि उन्होंने अपने जीवन को अपने विचारों की कसौटी बना दिया। उन्होंने सत्य का पक्ष लिया, उसकी कीमत चुकाई और उस कीमत से कभी पीछे नहीं हटे।
आज भारत को फिर उसी नैतिक साहस की आवश्यकता है।
सत्ता में बैठे लोगों को भी और विपक्ष में खड़े लोगों को भी।
युवाओं को भी और समाज के बुजुर्गों को भी।
क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र नागरिक की आवाज सुनने, असहमति का सम्मान करने और व्यवस्था को निरंतर बेहतर बनाने का संकल्प है।
और अंततः बात वही है—दुनिया उन्हीं के सामने झुकती है, जिनमें उसे झुकाने का नहीं, बल्कि सत्य के सामने स्वयं झुक जाने का साहस होता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

