लेखक: देवानंद सिंह
देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर चढ़ावे में हेराफेरी के बढ़ते मामलों ने करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को गहरी चोट पहुंचाई है। अयोध्या के भव्य राम मंदिर से लेकर बद्रीनाथ धाम तक, पवित्र स्थलों पर चढ़ावे की राशि में अनियमितता के आरोप लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। यह स्थिति न केवल धार्मिक संस्थानों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि शासन-प्रशासन की निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता को भी कटघरे में खड़ा करती है। जब भक्त अपनी गाढ़ी कमाई का हिस भगवान के चरणों में अर्पित करता है, तो वह अपेक्षा करता है कि उसका उपयोग जनकल्याण और मंदिर के रखरखाव में ईमानदारी से हो, न कि किसी के निजी स्वार्थ की भेंट चढ़े।
भारत में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, विश्वास और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक भी हैं। श्रद्धालु जब मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते हैं, तो वह किसी व्यक्ति या संस्था के लिए नहीं, बल्कि भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा और विश्वास के रूप में अर्पित करते हैं। ऐसे में यदि चढ़ावे में हेराफेरी या अनियमितता के आरोप सामने आते हैं, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं पर भी चोट है।
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर उठे विवाद के बाद अब बद्रीनाथ धाम में भी कथित हेराफेरी का मामला सामने आया है। पुलिस जांच, एसआईटी की कार्रवाई और राज्य सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति इस बात का संकेत हैं कि मामला गंभीर है। हालांकि, जांच पूरी होने से पहले किसी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा, लेकिन ऐसे आरोपों का सामने आना ही व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
देश के बड़े धार्मिक संस्थानों में हर वर्ष करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। विडंबना यह है कि कई स्थानों पर अभी भी चढ़ावे की गिनती, रिकॉर्ड और उपयोग की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं है। यही कारण है कि समय-समय पर विवाद जन्म लेते हैं और लोगों के मन में संदेह पैदा होता है। आस्था का आधार विश्वास है, और जब विश्वास कमजोर पड़ता है तो उसका असर केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे धार्मिक तंत्र की साख प्रभावित होती है।
चढ़ावे में हेराफेरी रोकने के लिए पारदर्शी और आधुनिक व्यवस्था लागू हो
आज आवश्यकता है कि देश के सभी बड़े मंदिरों में चढ़ावे के प्रबंधन के लिए एक समान, पारदर्शी और आधुनिक व्यवस्था लागू की जाए। सीसीटीवी निगरानी, डिजिटल रिकॉर्डिंग, स्वतंत्र ऑडिट, ऑनलाइन लेखा-जोखा और समय-समय पर सार्वजनिक रिपोर्ट जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य की जानी चाहिए। इससे न केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, बल्कि श्रद्धालुओं का विश्वास भी और मजबूत होगा।
धार्मिक संस्थाओं को भी यह समझना होगा कि पारदर्शिता उनकी प्रतिष्ठा को कम नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत करती है। यदि व्यवस्था साफ-सुथरी होगी तो किसी भी प्रकार के आरोप स्वतः कमजोर पड़ जाएंगे।
अंततः, मंदिरों में चढ़ाया गया धन भगवान का नहीं, बल्कि समाज की आस्था का धन है। इसलिए उसका एक-एक रुपया ईमानदारी और जवाबदेही के साथ सुरक्षित रहना चाहिए। आस्था की रक्षा केवल पूजा से नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था और निष्पक्ष जवाबदेही से भी होती है। यही सच्चे अर्थों में धर्म की सेवा है।
उम्मीद है कि अयोध्या और बद्रीनाथ में सामने आए चढ़ावे में हेराफेरी के मामले एक सबक बनेंगे और समूचे देश के मंदिर प्रशासनों को आत्मनिरीक्षण के लिए प्रेरित करेंगे। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक केंद्रीयकृत मंदिर प्रबंधन ढांचा विकसित करना चाहिए जो प्रौद्योगिकी का लाभ उठाते हुए हर लेनदेन को जनता के सामने पारदर्शी बनाए। संस्कृति मंत्रालय जैसी संस्थाएं इस दिशा में दिशानिर्देश जारी कर सकती हैं। केवल कानूनी सख्ती ही नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी का बोध भी इस पवित्र कार्य में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा। आइए, हम सब मिलकर मांग करें कि आस्था के प्रतीक इन मंदिरों का खजाना जनता के भरोसे का खजाना बना रहे।

