PESA को ठेंगा रैंकिनी मंदिर में 19 करोड़ का खेल ग्राम सभा से पूछा तक नहीं
ठेकेदार-वन विभाग की मिलीभगत से रकिणी मंदिर में 19 करोड़ का बंदर बाट PESA कानून को ताक पर रखकर शुरू हुआ निर्माण
राष्ट्र संवाद संवाददाता
ग्रामसभा नहीं होने से ग्रामीण नाराज राष्ट्र संवाद संवाददाता जादूगोड़ा
*जादूगोड़ा।* आस्था का प्रतीक और पर्यटकों की पहली पसंद _रकिणी मंदिर_ आज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। यहां 19 करोड़ रुपये की विकास योजनाओं को ग्रामसभा की अनुमति के बिना शुरू कर दिया गया है। आरोप है कि ठेकेदार की मनमानी और वन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी धन का बंदरबाट किया जा रहा है।
मामला इतना गंभीर हो गया है कि बुधवार को _पोटका प्रखंड कल्याण पदाधिकारी रोहिणी बेड़ा_ और _BDO इसराइल_ को खुद गांव पहुंचकर ग्रामीणों का गुस्सा शांत करना पड़ा।


*PESA कानून की धज्जियां, ग्रामसभा को अंधेरे में रखा*
रकिणी मंदिर परिसर पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आता है। संविधान के अनुसार यहां किसी भी विकास कार्य से पहले ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य है। लेकिन यहां उल्टा हुआ।
ग्रामीणों के अनुसार मंदिर में _धूमकुड़िया भवन, दृष्ट्या पहाड़ पर व्यू प्वाइंट, विशाल पार्किंग, धार्मिक ट्रस्ट गठन और अन्य निर्माण_ बिना किसी सूचना के शुरू कर दिए गए।
ग्राम के माझी-बाबा _राजा सोरेन_ के नेतृत्व में ग्रामीण पहले ही पूर्वी सिंहभूम के डीसी को लिखित शिकायत दे चुके हैं। ग्रामीण महिला _सावित्री हांसदा, सुनीता सोरेन और थानो सोरेन_ का कहना है, “हम विकास के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन हमारी जमीन, जंगल और आस्था से खिलवाड़ नहीं होने देंगे।”
*ठेकेदार की लापरवाही + वन विभाग की चुप्पी = बड़ा घोटाला*
ग्रामीणों ने ठेकेदार और वन विभाग पर सीधे मिलीभगत का आरोप लगाया है।
*1. घटिया निर्माण, सरकारी पैसा बर्बाद*
निर्माण में मानक को ताक पर रख दिया गया है। सीमेंट, बालू, ईंट सब घटिया क्वालिटी के लगाए जा रहे हैं। मंदिर की चोटी तक जाने वाली सीढ़ियां इतनी पतली बना दी गई हैं कि कोई भी हादसा हो सकता है। जगह-जगह लगी लोहे की रेलिंग और पार्क के गेट में काम शुरू होते ही जंग लग गई। नींव भी तय मानक से कम गहरी डाली गई है।
*2. काम की गति कछुए जैसी*
19 करोड़ की योजना को शुरू हुए कई महीने बीत गए, लेकिन साइट पर मजदूर नदारद रहते हैं। पार्किंग स्थल पूरी तरह दलदल में तब्दील हो चुका है। चारों तरफ निर्माण सामग्री और गंदगी का अंबार लगा है। काम आधा-अधूरा पड़ा है।
*3. वन विभाग बना मूकदर्शक*
सबसे बड़ा सवाल वन विभाग पर है। मंदिर परिसर _किला प्रवाही रेंज_ के वन क्षेत्र से सटा हुआ है। नियम के अनुसार यहां बिना NOC एक ईंट भी नहीं लग सकती। लेकिन विभाग के अधिकारी सिर्फ कागजों पर खानापूर्ति कर रहे हैं। आरोप है कि ठेकेदार को बचाने के लिए फाइलें दबाई जा रही हैं।
*प्रशासन ने मानी गलती, जांच के आदेश*
ग्रामीणों की नाराजगी देखकर प्रशासन को झुकना पड़ा। प्रखंड कल्याण पदाधिकारी रोहिणी बेड़ा ने मौके पर कहा कि “पांचवी अनुसूची क्षेत्र में ग्रामसभा की सहमति के बिना एक भी योजना नहीं चल सकती। मामले की निष्पक्ष जांच होगी। गुणवत्ता और प्रगति दोनों की जांच कराई जाएगी। रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेजकर दोषियों पर कार्रवाई की सिफारिश की जाएगी।”
*ग्रामीणों ने रखीं 3 कड़ी मांगें*
1. 19 करोड़ की पूरी योजना की उच्च स्तरीय और SIT जांच हो।
2. ग्रामसभा की अनुमति के बिना सभी कामों पर तत्काल रोक लगे।
3. ठेकेदार की लापरवाही और वन विभाग के संलिप्त अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज हो।
*क्या कहते हैं जानकार*
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि “अगर आदिवासी बहुल इलाकों में इसी तरह बिना ग्रामसभा के काम होते रहे, तो विकास के नाम पर सिर्फ लूट होगी।” कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने भी जिला उपायुक्त से लिखित शिकायत कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। मंदिर कमेटी के सदस्य भी निर्माण की गुणवत्ता से नाराज हैं।
रकिणी मंदिर का मामला अब सिर्फ निर्माण का नहीं रहा। यह आदिवासी अधिकार, PESA कानून और सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला बन गया है। अब देखना होगा कि प्रशासन जांच के नाम पर लीपापोती करता है या वाकई दोषियों पर गाज गिरती है।

